Tuesday, December 13, 2022

न काहू से दोस्ती न काहू से बैर

'ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर' मानसिकता वाले सबसे खतरनाक होते है। ये ग़लत के ख़िलाफ़ मौन साधते हैं। सबकी हाँ में हाँ मिलाना जानते हैं। वरना अन्याय के विरुद्ध उठने वाली आवाज़ों की दुश्मनी और दोस्ती दोनों जमकर होती है।

Friday, November 11, 2022

धनतेरस

ना ना... धनतेरस धन के लिए नहीं बल्कि उत्तम स्वास्थ्य के लिए मनाते हैं। स्वास्थ ही सबसे बड़ा धन है। मान्यता है कि इस दिन धन्वंतरि समुद्र मंथन से आज पीतल के कलश में अमृत लिए प्रकट हुए थे। यह अमृत ही उत्तम स्वास्थ्य को दर्शाता है। 
ऋतु परिवर्तन के दौरान स्वास्थ का ध्यान अति आवश्यक है। अगले महीने से नई फ़सल आएगी उसी को संजोने के लिए बर्तन खरीदने तथा गांव में कोठिला (धान को सुरक्षित रखने के लिए मिट्टी का तैयार बिना दरवाज़े का घर) पारने की परम्परा रही थी जो बाद में धनतेरस को बर्तन खरीदने तथा घर मे घरकुंडा निर्माण से विस्तार पाया।
 ये कब सोने चांदी की खरीदारी में बदल गया पता नही और दीवाली धन ऐश्वर्य का प्रतीक बनती चली गयी।
धन्वंतरि आपको उत्तम स्वास्थ्य दें , लक्ष्मी धन संपदा दें और गणेश सदैव सद्बुद्धि दें।
शुभकामनाएं।
-रश्मि

Friday, August 5, 2022

बेरोजगारी बनाम रोज़गार

कौन कहता है के बेरोजगारी का दौर है?
 इधर हमारे युवा लोगों को सोशल मीडिया ने इत्ता रोजगार दिया है कि वे हज़ार पोस्ट और कमेंट इसी बात पर लिख देंगे कि 'हर हर शंभू' फरमानी नाज़ का है या अभिलिप्सा पांडा का है। वे अपनी एनर्जी इसमें खर्च करेंगे तिरंगे की डीपी किस एंगल से लगाएं के ज़्यादा पॉपुलर हों।
उनकी एनर्जी इस बात पर भी हाई होगी कि प्रियंका गांधी काले कपड़ो में बैठी हैं तो उसपर कौन सा गाना डालकर मीम बनाया जाए। वे गला फाड़ेंगे कि राहुल गांधी के कौन से डायलाग पर वे पप्पू प्रूव हुए। 
उनकी ऊर्जा मोदी की बढ़ती दाढ़ी पर भी खर्च होगी। वे शशि थरूर की कोई नई फ़ोटो खोज कर 3 दिन टाइम पास कर लेंगे। मगर वे टेक्नोलॉजी, विज्ञान, ज्ञान, विकास और शिक्षा की बात नहीं करेंगे (यह सरकार, प्रशासन आदि का काम है)।
वे दिन भर कमियां निकालने, कोसने या मज़ाक उड़ाने में बिजी हैं, और यही इनका क्रिएटेड रोजगार है। और आप कहते हैं कि आज बेरोजगारी समस्या है!

Wednesday, September 1, 2021

जन्माष्टमी

जय श्री कृष्ण!
शुभकामनाएं जन्माष्टमी की ज़रा हट के...

आज तो सबने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की ढेरों और सार्थक पोस्ट लिखी हैं। मैं भी खूब लिखती हूँ उनको जब भी मौका मिलता है। आज मैं उनके योगी-भोगी, योद्धा-नर्तक, प्रेमी-निर्मोही वाले गुणगान से थोड़ा अलग बात करती हूँ। जहाँ वे सिर्फ नन्हें बालक हैं और मैया यशोदा हैं। अगर उनकी बाल लीलाओं (चमत्कार वाले) को छोड़कर बात करें तो यशोदा दुनिया की बेस्ट मॉम दिखती हैं। और बेस्ट पेरेंटिंग टिप वही दे सकती हैं।
माँ का सर्वप्रथम गुण उसके वात्सल्य के अलावे धैर्यवान होना होता है। यशोदा ने जिस तरह बालक कृष्ण की शरारतों और गांव वासियों की शिकायतों के बीच बैलेंस बना कर रखा है वो हम सब के लिए अनुकरणीय है। इतना लाड़ प्यार और वात्सल्य के बाद कहीं कहीं सज़ाओं का ज़िक्र भी है जैसे 'माखन टाइमआउट' हो, या ओखली से बांधना, या रूठ कर बात न करना, गोपियों की शिकायतों से झल्लाना, उसके बाद ख़ुद दुःखी होना। ये बातें 'प्राइज एंड पनिशमेंट' की भी थ्योरी बताती है। 
यशोदा एक समृद्ध और संपन्न घर से दिखती हैं, उनके पति नन्द जी नगर प्रमुख हैं। घर मे चाकरों की कमी नहीं दिखती। फिर भी यशोदा का ज़िक्र आता है कृष्ण को नहलाते हुए, खिलाते-खेलते हुए, उन्हें सजाते हुए, मनाते हुए, सुलाते हुए ,लोरी सुनाते हुए। यानी ख़ुद से पालन पोषण करते हुए। ये मत कहियेगा आप कि वे हाउसवाइफ थीं। यशोदा और उनकी टीम पूरे नगर के लिए दही, माखन, घी निकालने का काम करती थीं।
मैं कहना चाहूँगी कि माताएँ जो वर्किंग हों या हाउसवाइफ, जॉइंट फैमिली में हों या न्यूक्लियर , बच्चे जब छोटे होते हैं तब आप उनकी मैक्सिमम ज़िम्मेदारियाँ उठाइये। हाँजी आपके आसपास जो हों उनकी हेल्प भी लीजिये पर गुड पेरेंटिंग के लिए क्वालिटी टाइम ज़रूर दीजिये। हां डैड भी! 
एक सार्थक जन्मोत्सव तभी होगा जब जिसे हमने जन्म दिया है उसका पालन पोषण भी उत्सव समान हो। हंसी-खुशी, समय और पूरी एनर्जी के साथ। 
बधाई के साथ मेरी एक रिक्वेस्ट सुनते जाइये , अपने आसपास की एक बेस्ट माँ और उनके बेटे या बेटी की तस्वीर शेयर कीजिये। उनके लिए कॉम्प्लीमेंट के तौर पर। चाहें तो मेरे कमेंट बॉक्स में भी डाल सकते हैं।

Friday, November 9, 2018

गोधन

दीपावली के दो दिन बाद यम द्वितीय/ भाई दूज/गोधन कूटने की परंपरा है। बिहार झारखंड उत्तर प्रदेश में प्रमुख रूप से मनाए जाने वाले इस त्योहार में बहनें अपने मुख्य द्वार पर गोधन बना भाइयों के दुश्मनों को प्रतीकात्मक रूप में दण्ड, मूसल आदि से कूटती हैं। लोकगीतों की झंकार  में इसकी झलक आप देख सकते हैं। वहीं घर में खीर पूड़ी पीठा पकवान आदि बनते हैं। मज़ेदार बात बताती हूँ। पीठा बनाने के दौरान उसमें चावल के आटे की छोटी छोटी चिड़िया नुमा आकृति बना कर डालने की प्रथा है। पीठा-पूरी खाने के पहले भाई लोग उस चिड़िया को पैर से तोड़ते हैं फिर टीका लगवा बजड़ी खाते हैं। यानी घर मे होने वाले अपशकुन आदि को नष्ट कर के ही चैन का निवाला डालते हैं।

एक बात बताओ भाई लोग? ई बहनें तो ताल ठोंक कर तुम्हारे दुश्मनों की छाती पर चढ़ ईंट पत्थरों और कांटों के बीच दंड मूसल से छिन्न भिन्न करती आयीं हैं और तुमलोग घर मे खाने से पहले 'चिड़ी मार' बन बैठते हो?
मतलब भाइयों  रक्षाबन्धन वाले तुम्हारी रक्षा से ज़्यादा तगड़ी सुरक्षा बहने देती आयी हैं। है ना?

Friday, October 12, 2018

Me too

देखा जाए तो 'मी टू'  के फेर में 99% महिलाएं आ जाएंगी और 90% पुरुष लपेट में।
बाकी 10%पुरुष ऐसे होते हैं जो कैरियर,  परिवार , समाज के लिए जज़्बा रखे होते हैं। वे क्रिएटिव हैं, इनोवेटिव हैं उन्हें फ़ालतू चीजों को न तूल देने ज़रूरत होती है ना वक़्त होता है। सही मायनों में यही पुरुष हैं। इन्हें सलाम!

रही बात महिलाओं की आंकड़ा शायद 99% से 100% भी हो सकता है।
महिलाओं की इच्छा अनिच्छा अभी भी पुरुषों से एक स्टेप नीचे है। भले ही स्त्री अपने बोल्ड, बेबाक होने का दावा कर ले। माहौल बदला है, रहन सहन, शिक्षा दीक्षा बदली है। थोड़ा बराबर आने दिया गया है। पर अभी भी बहुत गहरी खाई बची है बंधू! ज़रा पांव फिसला नहीं कि अस्तिव की किरचियाँ बिखर जाती हैं। (थोड़ा कहा, ज़्यादा समझना) अच्छी बात है मौका मिला तो कहने का साहस जुटा रहीं स्त्रियां। अब इसमें कितने जेन्युइन केस आएंगे और कितने बस बदले की भावना लिए हुए। ज़ाहिर है अधिकतर मामले ऐसे होंगे जहाँ पहले स्वेच्छा से अच्छे संबंध के बाद कारणवश अलगाव की स्थितियों के बाद खार खाए हुए रिश्ते। (100%He Too वाले केस, Me Too की तर्ज़ पर)

ज़रा सी आवाज़ क्या उठायी महिलाओं ने के समाज सकते में आ गया।

'महिला हों या पुरुष समाज के बनाए निषिद्ध दरवाज़ों के पार जाने का दुस्साहस दोनों दिखाते हैं, और उनकी चौखटों में सिर सिर्फ़ महिलाओं के ठुकते नज़र आते हैं।'

इंसान हैं सब... देवता नहीं। परफेक्शन किसी मे नहीं लेकिन उंगलियां उठाने का मौका समाज का कोई तबका नहीं छोड़ सकता। परतें उधेड़ने पे लोग आ जायें तो एक इंसान न बचे फिर। सब के सब कीचड़ से सने मिलेंगे लेकिन सोशल मीडिया पर गर्दभ राग अलापने में अपना पचहत्तर बिगहा का मुँह ज़रूर फाड़ेंगे!

"महफ़िल में बैठ कर न करो तंज हमपर तुम,
मुमकिन है कोई तुमपर भी कीचड़ उछाल दे...."

Saturday, July 21, 2018

पॉजिटिव टीचिंग

बचपन की तीन घटनाएं शेयर करना चाहूंगी।
छठी कक्षा में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था।  किसी दूसरे स्कूल में परफॉर्मेंस था। असुविधाजनक कॉस्ट्यूम और भारी मेकअप मैनेज करना ज़रा मुश्किल था। मैंने ड्रेस पिनअप के लिए टीचर को कहा। मैडम ने बायीं गाल पर एक थप्पड़ लगाते हुए  कहा, "10 मिनट के बाद स्टेज पर जाना है और अभी तक ड्रेस नही संभाल पा रही तो परफॉर्म क्या करोगी.."
-उसी क्षण मुझे उन टीचर के प्रति  रेस्पेक्ट जाता रहा....!
प्रतियोगिताओं में भागीदारी कम हो गयी खासकर जहां वे होती थीं।

क्लास 7th, सर ने एक टफ क्वेश्चन बोर्ड पर लिख सॉल्व करने को कहा। मैंने जल्दी कर के हाथ उठाया। सर हंसे और बोले , "अभी तो अलाने और फलाने (दो स्टूडेंट्स के नाम) बना ही पाए तुमसे कैसे हो गया..?" अन्ततः अलाने-फलाने ने भी गलत जवाब लिखा। मैंने सही solution के बाद भी कॉपी बन्द कर बैग में रख दिया।
उस सब्जेक्ट से मेरा इंटरेस्ट ख़त्म हुआ। और सर के प्रति रेस्पेक्ट जाता रहा...!

क्लास 9th, उन दिनों स्कूल अंडर कंस्ट्रक्शन था। वाशरूम कम थे। इमरजेंसी में स्टूडेंट्स स्टाफ टॉयलेट यूज़ करते थे। मैं उस दिन टीचर्स वाशरूम से निकली ही थी कि दरवाज़े पर मैडम खड़ी थीं। मुझे स्टाफरूम में आने का इशारा किया। मैं गयी तो मैम ने कहा, "टीचर्स वाशरूम क्यूं गयी?"
-"मैम वहां भीड़ थी।"
-"भीड़ थी तो क्या, थोड़ा वेट करना सीखो.. और आज के बाद कोई भी स्टूडेंट टीचर्स टॉयलेट में नही आएगा। ये मैं नोटिस बोर्ड पर लिखवा रही अभी.."
इसके बाद वहाँ बैठे दो- एक सर और मैम ने बेशर्म भाव से ठहाके लगा दिए।
मुझे इंसल्ट और गुस्से की फीलिंग आयी, शायद उनलोगों ने भी नोटिस किया। मैं हट गई और फिर एक दो लोगों के प्रति सम्मान ख़त्म हुआ.....!

ये कहानी मेरी नही किसी की भी हो सकती है। शिक्षकों केलिए हरेक विद्यार्थी एक समान होने चाहिएं। और सब पर अपनी संतान सा स्नेह भी होना चाहिए एक ज़िम्मेदार अभिवावक की तरह क्योंकि टीचर्स स्कूल में पेरेंट्स का रोल अदा करते हैं। चाहें तो अनगढ़ मिट्टी को खूबसूरत आकर दे सकते हैं चाहे तो रौंद सकते हैं।
वे चाहें तो हमे कॉन्फिडेंस से लबरेज़ कर सकते हैं चाहें तो दब्बू बना दें। शिक्षक का पक्षपाती रवैया बहुत विद्यार्थियों को हीन भावना और कई डिसऑर्डर से भर देता है। नतीजतन पढ़ाई और अन्य गतिविधियों से इंटरेस्ट ख़त्म हो जाता है। कुछ लोग उबर जाते हैं, कइयों का भविष्य डावांडोल हो जाता है।

एक अच्छा, समझदार और पॉजिटिव टीचर स्टूडेंट्स की रीढ़ होता है। और मज़बूत रीढ़ पर ही पूरा स्ट्रक्चर टिका होता है।

Monday, January 15, 2018

नाम में क्या रखा है...!

नाम में क्या रखा है...?
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कई नाम समय सापेक्ष होते हैं अस्थाई। आगे चल कर बस ध्वस्त हो जाते हैं साहेब,  जैसे "सुंदरी.... मोहिनी,  शोभा, गुडिया, बेबी, डौली, सुन्दर,  मोहन, गुड्डू, सोनू आदि..।" ये सब नाम ऐसे ही श्रेणी में आते हैं, बस ज़ुबान पर चढ जाते हैं अपनी पूरी निरर्थकता के बावजूद। एक समय के बाद जब नाम वालियां/वाले  सूखने लगती हैं किसी बगिया की तरह, फिर ना मेक-अप मदद करता है ना फैशन। पहले  त्वचा मुरझाती है, फिर आँखे, फिर बाल, अंत में एक एक अवयव सिकुड कर कूच करता जाता है। फिर इस बुढापे में ना आप मोहिनी रहेंगे ना मोहित, ना गुडिया, ना गुड्डू।

फिर भी नाम में क्या रखा है....!

" हमने तो शादी भी कर डाली साहेब नाम के चक्कर में। नाम ही पसंद आ गया कि बिना देखे-सुने-गुने पढ़ाई लिखाई छोड़ ब्याह  ही कर लिया....।"😊

फिर भी..... नाम मे क्या रखा है!
अरे....
-नाम क्या है...?
-यही ज़ालिम तो सबकुछ है....!!

मकर संक्रांति

पिता के घर मे पुत्र तो अक्सर रहते ही हैं। मज़े की बात ये के गर्व से पिता जाए पुत्र के घर में रहने और पिछले एक महीने के सारे पेंडिंग शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाये। इससे शुभ क्या होगा भला..?
जी हाँ! सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मकर में आज रहने जाएंगे और खरमास से बंद पड़े शादी विवाह सहित अनेक शुभ कार्यों की शुरुआत कल से हो जाएगी। ये है मकर संक्रांति का महत्व, बिल्कुल प्रैक्टिकल सा..!
ये संक्रांति सब के लिए शुभ हो और जीवन में  खुशहाली, स्वास्थ, प्रेम और समृद्धि की बढ़ोत्तरी हो!
बड़ो को आदर, छोटों को स्नेह के साथ मकर संक्रांति की शुभकामनाएं!

Tuesday, October 10, 2017

पटाखे

मैं 5 साल की थी उस दीवाली में। अन्य बच्चों के साथ फुलझड़ी और चरखी का मज़ा लेते हुए चहक रही थी। बड़े बच्चे 'बीड़ी बम', 'मिर्ची बम' आदि फोड़ रहे थे। चाचा को बम का पैकेट पास करते हुए मेरे हाथ की फुलझड़ी लगी और एक बम हाथ मे फट गया। मेरी हथेली देखने लायक नही बची थी। दूसरे साल मेरे भाई ने अधजले पटाखे को हाथ लगाया ही था फट पड़ा। फिर वो दीवाली भी गयी।उस दिन से आज तक मैंने दीवाली में फुलझड़ी तक को हाथ न लगाया। पटाखों की आवाज़ से ही डरती हूँ। मैं आसपास नही फटकती। रॉकेट अनार इत्यादि भी नही देख पाती। लोग मुझे डरपोक कहते हैं, कहते रहें। मैंने झेला है, मैं जानती हूँ! पटाखों पर बैन कभी कभी सुकून देता है।
ये फेसबुक पर जो पटाखों को लेकर '***रोना' चल रहा न, उन्हें एक ऑफर देना चाहती हूँ। कम्पनी की तरफ से और एक दोस्त की तरफ़ से पटाखों के दो तीन बड़े बड़े गिफ्ट पैक मिले हैं। और यहां के पटाखे तो फेमस हैं ही। जिन्हें चाहिए मैं उन्हें शुभकामनाओं के साथ भेज दूंगी। वरना हर साल मैं पानी में डाल देती हूँ।

हैप्पी दीवाली इन एडवांस!!

Wednesday, October 4, 2017

नागपंचमी

कहते हैं रावण ने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए नागों को परास्त किया था जिनमे तक्षक और वासुकि भी थे। बाद में नागवंश की स्थापना हुई जो उस समय केरल , तमिल नाडु और श्रीलंका तक थी। ये वंश भी चार उपवंशों में है। जहां अलग अलग नागों की पूजा होती है। और इसी के बाद श्रावण शुक्ल पक्ष पंचमी को नाग पूजा का प्रचलन शुरू हुआ।
हनुमानजी ने लंका जाने की जो उड़ान भरी थी वो नागप्रदेश से होकर ही था। वहां उनकी मुलाकात नागमाता सुरसा से हुई थी। नाग को कुल देवता बना पूजने वाले नागवंशी वैसे तो पूरे भारत मे हैं पर सबसे ज़्यादा केरल, कर्नाटकके कुछ भाग और तमिल नाडू में हैं।
आप दक्षिणभारत में कहीं भी घूम लीजिये, पीपल के नीचे नाग नागिन की मूर्तियां ज़रूर दिखेंगी। ये वस्तुतः कालसर्प दोष निवारण के लिए ये मूर्तियां स्थापित कराई जाती हैं। दक्षिण भारतीय सामान्यतः सांप नही मारते। आज कई जगह नाग पंचमी पूजा देखने का अवसर मिला। कई मंदिरों में सांप की बाम्बी तथा मैदान बगीचों में सांप की बांबी के पास पूजन हुए थे। भोग प्रसाद में अधिकतर दूध, अंडे, लावा, और लड्डू थे।

एक दिलचस्प वाक़या मैं बताती हूँ। सोमवार को कहीं जा रही थी रास्ते में बहुत से लोग लाठी डंडे के साथ हो हल्ला करते दिखे। मैं आगे जाकर एक आदमी से पूछी कि क्या हुआ तो उसने एक सर्प को दिखाया जो किसी गाड़ी के नीचे आ कर मर गया था और वे लोग उसकी बॉडी लेने के लिए झगड़ रहे थे। ये नागवंश से जुड़ी हुई जाति थी और इनका मानना है कि श्रावण में मरे सर्प का अंतिम संस्कार करना पुण्यदायी होता है और वहभी सोमवार को और कालसर्प दोष हो या अकाल मृत्यु इनसब से उबर जाते हैं।
ख़ैर अपनी मान्यताएं और अपना महोत्सव!
उत्सवों और शुभकामनाओं के लिए जितने भी दिन हों कम हैं।

Wednesday, May 17, 2017

अंग्रेज़ियत

हॉस्पिटल कैंटीन में दो जूनियर डॉक्टर्स बड़ी मासूम टाइप एक सीरियस टॉपिक पे बतिया रहे थे। उनका कहना ये था के फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलने वाली लड़कियां स्मार्ट लगती हैं लेकिन एक्सेंट इंडियन न हो तब। अपने स्टेट्स और रीजनल भाषा बोलने वाली इम्प्रेस नहीं कर पातीं। और अंग्रेज़ी बोलने के बाद जवाब अगर उनकी लोकल लैंग्वेज में आए तो वे महा गंवार लगती हैं।
मुझसे रहा नही गया और मैंने इंटरप्ट करने की सोची। मैं पास जाकर बोली, " एक्सक्यूज़ मी, कैन आई आस्क यू समथिंग...?"
उसने कहा, " यस मैम, हाऊ कैन आई हेल्प यू..?"
तभी उसके एप्रन पर मेरी नज़र गयी। उसका नाम था बी. के. झा। मेरे दिमाग मे आया 'झा' सरनेम मतलब बिहारी!
मैं थोड़ा करीब गयी और धीरे से कहा, " हई दुवार से बाएं जाइब त बहरी निकल जाइब न बाबू.."
उनका चेहरा  सरप्राइज़्ड था, मुँह खुला। मैं तेज़ी से आगे बढ़ गयी। दरवाज़े के पास जाकर पलटी, वे दोनों मुझे ही झेंपकर देख रहे थे। मैं बहुत ज़ोर से हंसी और कहा, ' कल मिलती हूँ इसी जगह इसी टाइम पे...' 😊
अबकी हंसी में दोनों डॉक्टर्स भी शामिल थे।

Monday, April 10, 2017

दादी

बचपन को याद करें तो अक्सर  हमारे घर में मीठी चीज़ें बनायीं जाती थीं..... जिनमे गुड के पुए भी बनते थे भोग लगाने को, दादी बनाती या बनवातीं थीं. आज के दिन हम जब भी घर से बाहर रहे दादी को खूब याद किया है बल्कि इन दिनों हफ्ते भर से दादी याद रही सोते जागते... :(

एक वाकया बताते हैं बचपन का, जो कई दिनो से शेयर करना चाहते थे... Daltonganj  में दादी हमे  लेकर छे-मुहान वाला काली मंदिर जाया करती थीं रोज़ शाम की आरती में.... वो पूजा पाठ करतीं हम खेलते रहते .. नारियल और पेडे खाते.....  उस दिन भी शाम की आरती में गए, दादी व्यस्त रहीं पूजा में , बहुत देर भी हो रही थी मंदिर में कम लोग बचे थे .. पूजा समाप्ति पर दादी जैसे ही माथा टेकने झुकीं हम उनके ऊपर बैठ गए, हाथ में छड़ी थी उठा के चिल्लाये "मैं बारूद के गोले पे बैठ कर आग लगा लुंगी, मगर अपने जीते जी अपनी झाँसी छोड़ कर नहीं जाउंगी...." ..
उसके बाद न पूछिए क्या हुआ, दादी झटके से उठीं और उस वक़्त साक्षात काली का अवतार लग रही थीं... बहुत पिटाई हुई.... बहुत!
छेमुहान से जेलहाता कुटाते पिटाते पहुंचे थे.... आज भी इस घटना को याद करने में पीठ में दर्द  होता है.. आंसू आते हैं हंसी आती है... अच्छा लगता है .. फिर से वो दर्द महसूस करना चाहते हैं.. बुजुर्गों का प्यार याद आता है.. ...!
"फिर से बीते वक़्त में जाने की इच्छा है.... दादी आज हमारे बीच नहीं हैं... जी करता है २-४  घंटे के लिए ही सही.. एक बार आतीं तो फिर से जीते... प्लीज़ दादी ... प्लीज़... मिस यू...."

11 अप्रैल 2013

Sunday, April 2, 2017

BPMA

यही कोई हम आठ -नौ साल के रहे होंगे उस वक़्त. हमारे  बुआ-चाचा सब कॉलेज जाते थे और हम स्कूल . उनकी कलरफुल कापियां /किताबें हमे खूब अट्रैक्ट करती थीं क्यूँकि हमारी कॉपियां स्कूल की छपी होती थीं सब एक जैसी भूरे रंग की और DAV public school लिखा होता था.
हमे याद है बुआ की एक ऐसी ही कॉपी थी जिसके पीछे बड़े बड़े अक्षरों में BPMA लिखा हुआ था., जिसका फुल फॉर्म था 'बिहार पेपर मिल्स असोसिएशन '. हमने वहीँ रंगीन अक्षरों में BPMA का नया फुल फॉर्म लिख डाला ' बीडी पीये मज़ा आवे' :D. कॉलेज में उनकी साइकोलोजी की लेक्चरार ने देखा तो पूरी क्लास के सामने ही उनकी  बैंड बजाई थी . ;)
शाम को जब हम खेल कर घर  वापिस आये  तब मेन गेट से ही खतरे का आभास हुआ, दादा-दादी, मम्मी- पापा ,चाचा बुआ सब वहीँ थे और एक साथ सबने  क्लास लगा दी :) . कौन पहले बोला और कौन  बाद तक याद नहीं, पर मेरी जो आरती उतारी गयी थी उसकी रौशनी अब तक रौशन है और धूप अगरबत्ती की खुशबू, आहा -' वो कभी भुलाई न जा सकेगी.....' !
;) :P

Saturday, March 18, 2017

मोदी दादा- मोदी नाना

हम्मर मतारी बड़का वाला मोदी फैन हैं। सौ काम पेंडिंग छोड़ कर घंटों मोदी भाषण सुनने को तैयार। फ़ोन करो तो 'मोदीआइल' रहती है। सब सीरियल और शो छोड़ कर सिर्फ मोदी रिलेटेड न्यूज़ देखती हैं, यहाँ तक कि सारा अख़बार तक चाट डालती हैं। 'मन की बात' सुनने के लिए दिमागे में अलार्म सेट है। इनसे भी चार हाथ आगे हमार पतिदेव हैं। मोदी के इंच इंच डेग का खबर इनके पास मिलता है। मजाल है कि कोई इंटरनेट न्यूज़ इनके आँख के आगे से बिन देखे गुजर जाए। बुझा रहा दुनो सास दामाद कोई रिसर्च करिए के छोड़ेंगे।
घर में सबसे नालायक, निकम्मे, टेढ़- ऐंठाइल, मुर्ख, मुँहफट हम हैं, कारण मोदी जी हमको फुटलो आँखि नहीं सोहाते....। 😂😂अब निमन नही लगते तो नहीं लगते।
सबसे मज़ेदार बात भी सुन लीजिये। हमार बेटा जो अभी पैदा हो के ज़मीन पे खड़ा ही हुआ है सो कल पूछ रहा, ' मम्मी नरेंद्र मोदी नाना लगेंगे कि दादा लगेंगे...?'
बताइये का जवाब दें....?

Thursday, March 2, 2017

क्या करना रंग गोरा जो पिया न रिझाए

फेयरनेस क्रीम और एंटी एजिंग क्रीम का बहिष्कार कीजिये सखियों।
गोरापन सुंदरता का पैमाना नहीं, और ना ही बढ़ती उम्र कोई अभिशाप!
कुदरत ने जो रूप रंग बख्शा है उसे स्वीकारिये और गर्व कीजिए। आपकी पर्सनालिटी और पॉजिटिव attitude ही आपकी ख़ूबसूरती है। सलोना रंग और चन्द झुर्रियां कोई दाग नहीं। हर उम्र अपने आप में ख़ूबसूरत है। एकाध वर्ष पीछे दिखने के चक्कर में इनर ब्यूटी भी कभी कभी पीछे चली जाती है। सो बढ़ने दीजिये उम्र को नैचुरली, खिलखिलाते हुए आप भी बढ़िए और खूब बढ़िए...!

Monday, January 30, 2017

दुश्मनों को माफ़ करने वाला attitude ही उन्ही उनकी औक़ात में रखता है।
जवाब देने, react करने से वे अपने आपको आपके बराबर या फिर खुद को बड़ा समझने लगते हैं।

Tuesday, January 10, 2017

मेरा शहर

बिना मेरी हाँ-हूँ सुने उसने अपनी बात जारी रखी, "यार रश्मि,  कुछ दिनों पहले ऐसा लग रहा था मानो शहर की सारी  खूबसूरत लड़कियों की शादी हो गयी.... सब की सब आई ए एस अफसरों, इंजिनीअर्स   और डॉक्टर्स  की बीवियां हो गयीं हैं........... रह गयी सिर्फ सरफिरी चंद  शोध छात्राएं और 'धैर्य-कुमारियाँ'!
सारे सपने ब्लैक एंड वाइट हो गए थे । शहर धीरे -धीरे मरता जा रहा था ,नौकरी विकास और 'प्रेम; की गुंजाईश कम हो गयीं  थीं... मुझे शहर छोड़ जाना पडा फिर भटकता ही रहा। काफी दिनों बाद जब मेरा थक हार के  खाली हाथ लौटना हुआ यहाँ तो स्टेशन पर पांव  रखते ही अपने शहर  की बत्तियां  दिखी तो लगा सारा  शहर बाहों में आ गया,टिम -टिम , दिप -दिप  जैसे जादुई चिराग, जैसे चूल्हे की आग जैसे गर्म अलाव, फिर बत्तियां अपनेपन के गर्मी से भर गयीं दिल में सच ....आई मिस्ड माय टाउन , रियली!"

-फिर मुझे भी अच्छा लगा उस से बतियाना!

तुम्हारा होना ..मुझे मेरे होने का अहसास करवाता है |
संवाद रोटी नहीं है ...कि तुम भी रोज़ खाओ ,मैं भी रोज़ खाऊं |बस इतना जाना भर काफी से अधिक है...कि तुम हो ,...मेरे लिए हो !!!!

Monday, January 9, 2017

क्राइम

क्रिमिनल सुल्तान हैं,
कानून मेहरबान हैं
जनता को सिर्फ सुनना है...
वादों को निगलना, नारों को उगलना है!
कहीं पे दर्द रहता है
मन अकेले में रोता है
नेताओं के भाषणों से कानों को बचाओ
चाहो तो एक और क्राइम कर के सुर्ख़ियों में आओ