Friday, March 30, 2012

रश्मि मिश्रा के अनमोल वचन.....!
"दोस्तों , किसी लड़के /लड़की को प्रपोज करना है तो इस रविवार का समय उत्तम है... वो क्या है कि इस दिन मूर्ख दिवस कहते हैं .. यानि कि 'फूल डे'...(१ अप्रैल)!!
तो इस दिन अगर आप प्रस्ताव रखते हैं तो सेफ हैं! वो ऐसे कि अगर एक्सेप्ट कर लिए जाते हैं तो बढ़िया.. नहीं तो कह दीजियेगा कि ,'यूँ ही मजाक कर रहा था /रही थी .. आप तो बुरा मान गए .. तारीख क्या है आज?' 
जनाब देर न करियेगा इस दिन जूते/सैंडिल न पड़ेंगे पक्का..! काम बना तो ठीक वरना भाई/बहन बना लीजियेगा! चलता है यार"!!!!

Monday, March 26, 2012

"इक हम हैं जो बैठे ही हैं मुसीबतें झेलने को...
और जो तुम हो कि , बैठे हो सिर्फ आफतें ढाने को...!!" 

Saturday, March 24, 2012

एक आदमी किसी अपरिचित नगर में पहुँचता है.. जहाँ की न तो भाषा आती है उसे, न चाल चलन की जानकारी..! भूखे प्यासे भटकते हुए एक  महल के द्वार पे पहुचता है.. जहाँ संभवत: कोई भोज चल रहा है सोच दाखिल होता है... सभी बैठें है भोजन पर सो उसने भी बैठ के तरह तरह के पकवान खाए... वो एक होटल था.. !खाने के बाद जब बैरा बिल ले के आया तो उसने सोचा कि शायेद इस महल के राजा ने धन्यवाद पत्र भिजवाया है.. बिल को जेब में रख वह प्रत्युत्तर में झुक झुक के आभार प्रकट करता है कि 'मुझ जैसे अजनबी का सम्राट ने इतना स्वागत किया.. अपने देश जा के खूब प्रशंसा करुंगा ..!' बैरा कुछ न समझा तो उसे पकड़ के मैनेजर के पास ले गया... आदमी और प्रसन्न कि लगता है प्रतिनिधि मेरे धन्यवाद से  खुश हो  बड़े अधिकारी के पास ले आया. खूब खरी खोटी सुनने के बाद भी वह धन्यवाद दिये जा रहा है.
अब उसे अदालत में ला खड़ा किया गया तो उसकी खुशी  और बढ  गयी उसने सोचा कि अब वह सम्राट के पास आया गया है.. और वहाँ भी उसने देश कि प्रशंसा  में कसीदे काढे... कि वह अभिभूत है यहाँ आ के.. उसकी खुशी का ठिकाना नहीं...!  जज ने इसे चालबाज ठहरा के गधे पर उल्टा बिठा नगर घूमाने का आदेश दिया...!
साथ में एक  तकथी भी लटका दी गयी कि"ये आदमी चालबाज़ है...जिसके सामने से ये गुज़रे इसे भरपूर गालियाँ दो"..
अब तो उस आदमी के पैर न थे ज़मीन पर उसे लगा कि उसकी शोभा यात्रा निकाली जा रही है एवं लोग इसकी प्रशंसा में गीत गा रहे हैं..! वह गदगद सपने बुनने में  व्यस्त कि देश जाके अपनी कहानी सुनाएगा.. अगर कोई देखनेवाला भी रहता तो बड़ा मज़ा आता...!
अचानक उसके देश का एक परिचित दीखता है वह चिल्लाता है." देख! मेरा कितना स्वागत हो रहा है.."
वह आदमी भाग जाता है कि उसे पता है क्या हो रहा है... और ये मूर्ख यही कहता है..."उफ्फ्फ कैसे मुझसे जल के भागा वह अभागा.."!!!

(अहंकार में डूबे लोग ऐसे ही भ्रांतियों  के शिकार होते हैं. जिनका न जीवन के तथ्य से सम्बन्ध है न जीवन की भाषा मालूम... कोई ताल मेल नहीं जीने और जिंदा रहने का ....!)

Tuesday, March 20, 2012

आज देखना एक दिये को ध्यान से... देखना उसकी लौ..उसकी रौशनी,.. उसकी बाती, उसका तेल.... और उसकी जलन!!!!!!
देखना कैसे बाती.. तेल को जलाती है... सारे तेल को जला खुद जल जाती है...! बाती को लपट जलाती है.. और भभक के  अंत में बुझ जाती है... सारी  आग सारी जलन खतम... खेल खतम!!!

ह्म्म्म.....!!!
 पहली बात:  ये तर्क को दिखा रही है.. तर्क के कैसे इनकार होते हैं.. एक पर एक चीज़ इनकार  भरी.. 'ये नहीं..ये भी नहीं.. ये भी नहीं.. वो भी नहीं...' अंतत: सारे इनकार के बाद तर्क खुद मर जाता है.. अब कुछ नहीं इनकार को!!

दूसरी बात:  विश्वास को दिखाती है..!! यहाँ स्वीकारोक्ति सी दिखती है...विश्वास कि स्वीकृति .. ' ये सही.. हाँ, ये भी सही... ये भी और वो भी...'  सब स्वीकार है..! अब विश्वास की भी ज़रूरत नहीं...!

अब सोचिये जहाँ तर्क और विश्वास दोनों गिर गए तब क्या बचा?????
.
.
.
.क्या यहाँ प्रेम है?????

Saturday, March 17, 2012

देखो तनिक न दुखइयो मोरी कलईया
श्याम तनिक न दुखइयो , मोरी कलईया  रे...
सुघड़ गोरी मोरी बहियाँ...!

सब सखियाँ मिलि घेर के बैठीं
बीच भये बनवारी....
आपन  आपन देत कलाइयाँ
सखियाँ बारी बारी...
हंस हंस बात  करे सबसे
वृंदा-विपिन -बसईया रे...
चित्त ले गया सावरा कृष्ण कन्हैया रे...!

सब में मोरी पहचान कलाई
धरे कन्हाई कस के..
छोटी सी चूड़ी पहनावे
बांह दबावे कस के!
मैं तो रोवन लागी कह के मईया मईया रे...
चित्त ले गया सावरा कृष्ण कन्हैया रे...!
सुघड़ गोरी मोरी बहियाँ... !

टूट के चूड़ी  हाथ  में गड़ गयी..
डरन  लागे बनवारी...
झट से मोरी छोड़ कलईया
भाग गए बनवारी!
इधर मैं भई दीवानी
उधर श्याम  दीवाना ....
मोसे ऐसे बात करन को
ढूढे रोज बहाना...
सब जन प्रेम की तोरी
करन लगे कवितईया रे ..!
जो चित्त ले गयो साँवरा कृष्ण कन्हैया रे...!सुघड़ गोरी मोरी बहियाँ... !

Monday, March 12, 2012

सबकुछ वही तो है पहले जैसा... सिर्फ रूप.. रंग.. ढंग... शैलियाँ बदल गयीं प्रेम की ... ! पर है तो शाश्वत ही.. जैसे आत्मा ने वस्त्र बदले..! जैसे नदी सागर में गयी... सागर किरणों से चढ़ कर मेघ बना...मेघ फिर बरसा नदी में और नदी सागर में!!
एक बूँद भी न खोयी ... जल उतना ही रहा जितना  सदा था ..!
मेरा प्रेम भी वैसा ही  रहा न..! कल तुम्हारे साथ मैं ही तो नाची थी वृन्दावन में ललिता के रूप में ...! मेरी वीणा में राग तो तुम्हारा ही बजा था जब मैं मीरा थी...! याद तो है न...???
"देखो, कृष्ण! प्रेम की न कोई विधि है न विधान"....! 
"तनिक सी दूरी से काहे घबराए जाते हो"...?
"अरे! मैं तो वही हूँ जिसने 'पांच हज़ार साल के फासले' से प्रेम किया था"......!!!!

Friday, March 9, 2012

जिन्होंने न देखी  है सूरत को मेरी
देखेंगे वो आज नंगे  बदन को...!
पति मेरे हारे हैं जुए में बाजी..
महलों की  रानी लुटी जा रही. है..!
खिंच न सका चीर , दुश्शासन जो हारा ..
सभा बीच भगवन है तेरा सहारा......!
साड़ी के धागों में तुम जा छुपे हो...
इसी से ये साड़ी बढ़ी जा रही है.........!!!

Monday, March 5, 2012

न जाने कहाँ तक फैली है तेरे हुस्न की वुसअत ...
....और, न जाने मेरे इश्क की परवाज़ क्या है....!

Friday, March 2, 2012


अजब रंग उनकी अदा के, हम तो बस परेशान रहे,
दिन में दिख रहे जो चाँद से, हर रात वे  आफताब रहे...!

पढ़ा भी बहुत लेकिन उन्हें पढ़ने में नाकाम रहे,
हर पन्ना रोज बदला जिसकी ऐसी वे किताब रहे..!

अब  मुकाम उनको मिल गया, क्यूँ छानते हम ख़ाक रहे,
है जवाब हर सवाल का.. पर वे तो  लाजवाब रहे..!!
जागती रही आँख इधर.. देखते वे ख्वाब रहे...........!!!!!

Thursday, March 1, 2012

चलो अँधेरी रात में सहर ढूंढते हैं..
नदी  की  रेत पर कोई लहर ढूंढते हैं..!

हर तरफ खड़ा है जो  ज़हर का हिमालय,
ज़हर काटने को चलो, ज़हर ढूंढते हैं...!

ओज़ोन का दरकना ठीक नहीं  है शायेद,
बचाने को चलो, कोई डगर ढूंढते हैं...!

क्या खबर होगी  कल के सूरज की ,
आज की खबर में चलो, खबर ढूंढते हैं..!

Sunday, February 19, 2012

जैसे रोज़ नज़र आये वैसे नहीं हैं हम,
जैसे तुमने देखा वैसे भी नहीं हैं हम...!
कुछ तो छिपाया है हमने भी खुद से,
है तुम्हे पता भी कि कैसे हैं हम........?

बहुत गुमां है तुम्हे जो खुद पर..
कभी न कभी तो सोचा भी होगा...!
जो इतने लोग हैं तुम्हारे ठुकराए हुए...
हो जाएँ जो एक तो फिर क्या होगा........?

Thursday, February 16, 2012


न मरने की तमन्ना है अभी, न रही जीने की कोई आस..
................हे राम! ये किस शख्स से उलझा दिया हमे...!!!

Wednesday, February 15, 2012

बस ,इसी अय्याशी में हम दोनों ही जी रहे हैं....
.....तुम हमे खा रहे हो , हम तुम्हे पी रहे हैं.....!!
दिल खोल के आज वो बाँट रहा है 'सबके' प्यालों में शराब...
......मैं साथ रही चल उसके, जाने कब मेरी बारी है....!!!

Thursday, February 9, 2012


तुम्हारा प्रेम, लबालब!
एक मौसमी 'नाले' की तरह...
जो उफनता है बरसात आने पर..!

मेरा प्रेम, इक 'नदी' की  तरह
हर मौसम में एक सा बहाव
एक सी दिशा...!

प्रचंड गर्मियों में जब सूखता है जल पृथ्वी से...
तब मुझमे नदी की लकीर ,
और निश्छल चमकीली रेत ही दिखती है..

और  तुम्हारे भीतर दिखती है गंदगी
और सड़ी हुई मिटटी
वासना की!!

Wednesday, February 8, 2012

अफ़सोस! अब कहाँ से लाऊं मैं वो दिल तेरा...
...जो धडकता था दिन- रात बस मेरे लिए.....!!

Tuesday, February 7, 2012

बचपन में माँ बहुत कहानियां सुनाया करतीं थीं... बहुत सारे कभी कभी तो एक ही कई कई बार...! १० साल पहले एक राजस्थान की लोक कथा सुनाई थी उन्होंने . ठीक ठीक याद नहीं पर कहानी कुछ यूँ थी....
" एक राजा का दिल खूबसूरत सी पनिहारिन पे आ जाता है,जो उस से उम्र में काफी छोटी थी. राजा उसे घर ले आता है. और रानियों कि तुलना में उसका ज्यादा ध्यान रखता है.(ख्याल रहे ,पहले रानियों की 'संख्या'को 'स्टेटस सिम्बल' से जोड़ा जाता था).
फिर भी उसे हमेशा ये डर लगा रहता था कि कहीं ये उसे छोड़ के भाग न जाए..! तो एक मित्र की सलाह से उसने सुनार बुलवा के एक जड़ाऊ भारी सी "झांझ' उसके पैरों में डलवा दी ताकि कहीं भी आने जाने से उसकी आवाज़ कान में पड़ती रहे. पनिहारिन भी खुश कि राजा मुझे इतना प्यार करते हैं कि इतनी कीमती चीज़ मुझ गरीब को दी है... इसलिए चलने में कठिनाई होने पर भी वो कुछ न कहती..!
समय बीतता गया अब राजा को यकीन हो गया कि पनिहारिन उससे बड़ा प्रेम करती है. इतने भारी जेवर से लडखडाती भी है तो उफ़ तक नहीं करती, अब ये उसे छोड़ कर न जायेगी.... सो उसने वापस सुनार को बुलवा के झांझ उतरवा दिया...!!
दूसरे दिन पनिहारिन राजमहल से गायब!! भाग गयी...!!!
... कुछ दिनों बाद एक बांदी ने उसे गांव में देखा अपनी सहेली से वो कह रही थी..." अरी! राजा ने तो बड़ा प्रेम किया मुझसे...इतनी कीमती झांझ जाते ही दी,.... बड़ा भरोसा था.. और एक दिन उसका भरोसा कैसे खत्म हुआ री, कि मेरी पाजेब उतरवा ली??"
"क्या यही प्रेम था सखी?"
"......." ................ कहानी खत्म...!!!!!!

किसी को यकीन हुआ.... किसी का भरोसा टूटा!!!!!!
आपको????

Monday, February 6, 2012

राज़ की बात मैं तुमसे कह रही हूँ
सुन सकोगे? मैं तो कबसे सह रही हूँ...
एक मुक्कमल सी ईमारत दिख रही हूँ..
पर कहीं भीतर ही भीतर ढह रही हूँ..
है हवाओं की ज़मीन, बादल की छत है..
मुद्दतों से जिस मकाँ में रह रही हूँ ...!!
जिस किले में क़ैद हूँ मैं उस किले की
न कोई प्राचीर है, न कोई दर है..!
न कोई पहरा न कोई पहरेदार!
न दिखे  कतरा हुआ, कोई मेरा पर है!
फिर भी पंछी से नन्ही परवाज़ मेरी....
घुट के रह जाती है क्यूँ आवाज़ मेरी...!
है ये कैसी क़ैद कि इस क़ैद में भी..
है नज़रबंदी पर मुझ पर न नज़र है....!!!
बीते वक्त में जा कर जब यादों के धागे उलझते हैं, तब बहुत सी बातें जेहन में उतरती हैं...!
अल्हड मन रिश्तों के फलसफे समझने की कोशिश में है..!!.एक तरफ जीवन मृत्यु के जुड़े मसले.. दूसरी तरफ तुम्हारी यादें..और मेरे ख्वाब!!
रेत की तरह फिसल रही मेरे खवाबों की ताबीर...!! दिल कहता है एक बार जी ही लूँ इन लम्हों को... शायद वक्त मिले न मिले...!
खुदा ने चाहा तो बदल ही देगा मेरी तकदीर!!!!
एक कहानी तो हम सब ने सुनी ही है.. जब कृष्ण ने माटी खायी और यशोदा ने उनका मुख खुलवाया तो मुख में सारा ब्रह्माण्ड.. ग्रह नक्षत्र आदि दिखे. और प्रतिक्रिया में यशोदा मूर्छित हो गिर पड़ीं. मैं क्या प्रतिक्रिया दिखाती.. सोच में हूँ..!
हुआ यूँ कि आज मेरे बेटे ने कुछ खाया.. मैंने उसके होठों पे काली भूरी कोई चीज़ लगी देखी तो पूछा "क्या खा रहा है.. मूह खोल"... थोड़ी देर आनाकानी के बाद उसने मूह खोल कर दिखाया और चिल्लाया ..."आ आ...आ...."गूगल"!!!

दरअसल मूह में थी तो चाकलेट, पर मैं सोच में पड़ गयी कि क्या सचमुच आज "गूगल" पर्याय हो गया है "ब्रह्माण्ड" का?

Friday, January 27, 2012


आज फिर ...

आज फिर मेसेज मिला उसका
ठीक वैसा ही लिखा था उसने...बरसों बाद भी...
"चलो देखते हैं चाँद को हम-तुम
आज फिर उसी तरह, एक साथ!
ऐसे ही तो देखते थे... पहले भी..!
फिर मीलों दूर बैठ के भी तो देख सकते हैं..
एक साथ!"
"तुम मुझे देखना उसकी नज़रों से.. मैं तुम्हे.."

तीन घंटे बालकनी से आसमान निहार.. झुंझलाकर ये भीतर चली आई...
वो रात भर बैठा रहा छत पे
जले अधजले सिगरेट के टुकड़ों
और बुझी हुई तीलियों के साथ...!
न दिखा चाँद दोनों को....
"आज फिर अमावस की रात थी.......!"

Wednesday, January 25, 2012

सुनो, जहाँ से रिवाजों के बंधन टूटते हैं वहाँ से मेरी दास्ताँ शुरू होती है! जब भी निगाहों के पहरे कसते हैं जज्बातों की गिरफ्त ढीली पड़ती जाती है.. जब पूरे चाँद की रात धरती को भिगोती है...तब आँखों कि सीप में तुम्हारा चेहरा मोती की तरह क़ैद हो जाता है...कभी न आज़ाद होने के लिए.. !!
ये इश्क है इसे तुमने कभी समझा नहीं...लेकिन चाहत के परिंदों को रोकना तुम्हारे वश में न था... न होगा! तुम्हे अपनी ताकत का गुमान है तो हमे अपनी चाहत की कसम है.. ये आँखे अब देखेंगी तो तुम्हारा चेहरा..! चाहे अपनी इज्ज़त का वास्ता दो या जान की कसम.. ये मंजिल की और बढे कदम हैं.. न रुकेंगे न पीछे लौटेंगे...!
हम शहेंशाह हैं प्यार की जागीर के
प्यार इबादत है प्यार खुदा है...
ये आशिक की मजार है..
इक चिराग इश्क का जला दो...
कुछ फूल चढा दो प्यार के...!
आमीन...!!!!
ख्वाबों की वादियाँ हैं , चाहत की आबादी भी...
जिंदगी कि रंगीनियाँ हैं और लम्हों की आजादी भी...
टूटकर यहीं बिखर जाएँ...
आ हम तुझमे सिमट जाएँ....!!!

Friday, January 20, 2012

अजीब उपद्रवी हो भीतर से तुम!
तुम्हारी सारी व्यवस्था ...तार तम्य.. भीतरी संगीत.. स्वर... मेलोडी सब अस्त व्यस्त से हैं...!!!! दिखावा...! छलावा!!
तुम्हारे भीतर आग  जलती है और  सर्दी दिखाते हो... क्रोध उबलता है तो मुस्कुराते हो...भीतर वासना पड़ी है और दिखा रहे हो की सन्यासी हो?
भेडिये कहीं के....!!!!!

गवां दिए वो अवसर तुने जहाँ मैं महा- संगीत पैदा कर रही थी...!!!!
मिथ्या रोगी....!

Wednesday, January 18, 2012

...कभी काठ की चिता पर तो कभी कलंक की...... अग्नि तो अपने ही देते हैं.. प्राय:..!
......और सुलगती है स्त्री..... धू - धू करते हुए अपने अस्तित्व को देख रही है ... आँचल की ओट से!
पृथ्वी की सारी कवितायेँ.. कविताओं के बिम्ब!....गुलाबों के गुच्छे .. हरी घास.!. रौशनी.. !चेहरे पे फैली हँसी, पसरा हुआ विषाद..!.शिशु का क्रंदन .. !सौंदर्य और माधुर्य.. ! खंडहरों के अँधेरे ...विश्वास के टूटे नीवं और अपने सड़े- गले -गंधाते अस्तित्व का अनंत काल से भोग करती आ रही हैं स्त्रियाँ!!

खंड चित्त

तुमसे जो तरंगें निकलती थीं और सारी प्रकृति से उन तरंगों का जो तालमेल था वह टूट सा गया है....जो इनर हार्मोनी थीं वह भी टूट गयीं है... तुमने अपने हाथों से ही सब तालमेल तोड़ डाले हैं.. और अकेली खड़ी हो गयी हो आज -दुश्मन की तरह! तुम्हारा हठ ये कहता है की भावपूर्ण होना मूर्खता है...जबकि तुम ये जानती हो की भावहीन होना मूर्खता है..!!
न बादलों से दोस्ती न नदियों से प्रेम......!

"खंड खंड चित्त, स्व-विरोध में बंटा व्यक्तित्व ..डिस इंटिग्रेटेड व्यक्तित्व ...."
"कल तेरे वीणा के तार बहुत ढीले थे.... संगीत पैदा ही न हुआ ..." ' आज तूने तार बहुत कस लिए हैं.. टूट गया... और संगीत मर गया'!

"मूढ़"!!!!!!!!!!

उठो... जागो!! चौंको... और सजग हो जाओ! नए प्रेम की शुरुआत करो जो शाश्वत हो...!
देह से प्रेम तो बहुत किया .. अदेही से करो.. मृत्यु न होगी तेरे प्रेम की!!!

Wednesday, January 11, 2012

मुझे परतंत्रता में जिलाने की तुम्हारी कोशिश ऐसे ही है जैसे:
"तुम आकाश को  डिब्बों में बंद करना चाहो...
....किरणों को  संदूकों में भरना चाहो...
...........खुशबू को मुट्ठियों में भीचो...."
"यह नहीं हो सकता....."
अस्वाभाविक है....!!! .. मगर..
तुम ऐसा ही करते हो....
और प्रेम के नाम पर जंजीरें रह जाती हैं.... बोझिल!!!!
मुह में तिक्त और कड़वा   स्वाद रह जाता है...................!!!

Tuesday, January 10, 2012

दो  छोटे बच्चे एक ५ साल का एक तीन का.. बातें कर रहे थे धीरे धीरे..छोटे ने पूछा "भैया पढाई से बचने केलिए क्या करूँ" नया स्कूल शुरू हुआ था ...
बड़े भई ने कहा उसके कान में.."देख, तू ' सी ए टी 'कैट  से बचना बस. क्यूंकि अगर तुने इसे सीखा तो बहुत कुछ सीखना पड़ेगा..."! "तू अड़ जाना इसी पे...न सीखना मुझे...इसके  बाद बड़े बड़े शब्द आते हैं... सब सीखना होगा फिर.. मैं फंस गया तू मत फंसना "!!!!!!!

सच है न एक चीज़ को  पकड़ो  तो पकड़ शुरू होती है... फिर दूसरी को पकड़ना पड़े... तीसरी को.. सिलसिला  शुरू!!!
एक श्रंखला है....!!!!
 जीना गुजरना अनुभव से... पकड़ना अनुभव थोड़ी है...!!! और हमेशा अनुभव की संभावना क्यूँ....?? जल्दी क्या है ..किसे है पकड़ने की...? और पुनरुक्ति...आकांक्षा  ही मत करो..!!
क्यूंकि इस अभीप्सा के पीछे यही समझ विकसित होती है की हम बंधन में हैं....!!!
मुझे बंधन पसंद नहीं!!!!!!!!!!!!!!! न...... ना... नहीं!!!

Monday, January 2, 2012

आज अर्जुन की बात....  मैंने आज इसका खोजा/पढ़ा... बड़ा अर्थपूर्ण है "अर्जुन"!!!
ये शब्द है "ऋजु"... जिसका अर्थ होता है सीधा सादा...(straight ).. और  अ-ऋजु का मतलन- टेढ़ा मेढ़ा!!! डावांडोल...!!! इसका शाब्दिक अर्थ है डोलता हुआ...!!!
हमारा चित्त है ये अर्जुन की भांति है,..  डोलता हुआ.. कभी निश्चय नहीं कर पाता.. सारे कार्य अनिश्चय में होते हैं... हाँ सबके भीतर है अर्जुन!!
वही जो हमारे मन का प्रतीक है...!!!मन का एक ढंग है कि आप कितनी निश्चित बात करें वह उसमे से अनिश्चित निकाल ही लेता है.. जैन फिर इसका क्या होगा.. उसका क्या होगा....?
बातें निश्चित नहीं होतीं.. चित्त निश्चित होते हैं!!!सिद्धांत निश्चित नहीं होते, चेतना निश्चित होती है!
बड़ी कृपा अर्जुन की वरना गीता पैदा नहीं होती.. न वे उठाते प्रश्न न कृष्ण उत्तर देते.. न लिखी जाती गीता!!! कृष्ण जैसे लोग लिखते नहीं सिर्फ responce करते हैं..!! लिखते तो वे लोग हैं जो किसी पे कुछ थोपना चाहते हैं.... कृष्ण तो सिर्फ उत्तर देते हैं.. पुकारने पे आते हैं!!!कोई कुछ न पूछे तो कृष्ण शुन्य और मौन रह जायेंगे..!!!
कृष्ण से कुछ लिया न जा सकता है सिर्फ बुलवाया जा सकता है...प्रतिसंवेदित कर सकते  हैं! अर्जुन ने बुलवाने का काम किया है...उनकी जिज्ञासा उनके प्रश्न कृष्ण के भीतर से तब जन्म पाते हैं..!!!

Saturday, December 31, 2011

नश्तरे जुबां हमे वो इस खूबी से  चुभा गए,
ता उम्र  उसकी दवा को हम ढूंढते रहें या रोते रहें...

चादर हमारे ख्वाब की वो फटेहाल बना गए...
धागे  उनके ख्याल के हम पिरोते रहें या सीते रहें.....!!

नवयुग में युग धर्म का यह नूतन आकार
सरस्वती को अपमानित कर, लक्ष्मी का सत्कार
भय लज्जा को त्याग निरंकुश , खुलकर अत्याचार
चाहे जिस बल कौशल से, सत्ता पर अधिकार
सिर्फ युग-धर्म दुहाई देकर , लोक विरुद्ध सुधार
हरिभक्तों को फांसी देकर हरिजन का उद्धार
किया निरिक्षण इस युग का, यही रहा मेरा शोध..
नव युग है "भ्रष्टों" का युग , हुआ यही आत्मबोध!

Tuesday, December 27, 2011

जानते है आप प्रेम कोई सम्बन्ध (relationship) नहीं, मन की अवस्था (state of mind) है. जब हम सोचते हैं ऐसा कि हम फलां से प्रेम करते हैं तो वह गलत है होता यूँ हैं कि हम प्रेमपूर्ण होते हैं! मैं तो इसे अवस्था ही मानती हूँ, क्यूंकि प्रेम से भरे हुए चित्त से प्रेम ही झरता है रौशनी की तरह सुगंध कि तरह...और जो भी पास आता है अगर वो लेने में समर्थ है तो मिल ही जाता है अगर नहीं तो वो उसकी बात!!!
प्रेम मुक्ति है! वह किसी को बाँधने का प्रश्न ही नहीं उठता.जो पास है उसे मिलता है जो दूर गया... वह गया..!!जैसे दर्पण के सामने कोई रहता है तोउसकी तस्वीर बनती है हटने पर तस्वीर मिटी.. दर्पण फिर खाली! फिर किसी की तस्वीर बनाने को तैयार.!किसी की प्रतीक्षा बनी रहेगी फिर कोइलेने को तैयार!
अगर कोई बंधन है ,कोई रोक है, तो वो आसक्ति है.. न कि प्रेम! आसक्ति रोकती हैकि रुको! नहीं तो फिर  मैं किसे  प्रेम दूंगी ? आसक्ति कहती हैकि तुम ऐसा ऐसा करना तो ही मैं प्रेम करूँ.. तो ये कारागृह में डालना हुआ..  प्रेम तो बे शर्त दान(un conditional giving) है!! प्रेम स्वतंत्र करता है एक व्यक्ति को व्यक्ति बनने देता है वस्तु  नहीं!
आसक्ति प्रेमके मार्ग में एक झूठा सिक्का (hippocracy)है .. तब आदमी सिर्फ संबंधो में जीता है.. जिस दिन पता चले कि मैं प्रेमपूर्ण हूँ ..उस दिन हम आप्तकाम (self fulfilled)होंगे .. और आनंद को उपलब्ध होंगे!!

Wednesday, December 14, 2011

मन का खेल है सब... मन कभी लहर तो कभी सागर बनता जाता है. जब विचार उठें तो लहर... जब निर्विचार  हों तो सागर!!!    शायेद यही ध्यान है...
कभी तो यूँ लगता है कि हम हज़ार छिद्र वाले बाल्टी बन गए हैं... जब कुवें में डाले जाते हैं तो  बड़ा शोर होता है... हलचल होती है!
पर जब तक पानी में हैं तभी भरे हुए से प्रतीत हो रहे है... जैसे ऊपर उठते जायेंगे खाली होना शुरू... और वही शोर!! इसी में तो हम खुश हैं...खाली  होने के शोर में...   


हाँ यही हजारों छेद.. हमारे हजारों विचार है...इसी से हमारी उर्जा भी तो कम होती जा रही है. जिस समय निर्विचार  हुए , उर्जा खोने का मार्ग बंद हो जायेगा!
वही उर्जा वापिस  हममे गिरेगी.      मन से खोया है मन से मिलेगा... मन से भटके हैं, मन से पहुचेंगे.. मन ह् रुग्ण है स्वस्थ हो जाए तो मिल जाए जो खोया है...!!...

 फिर क्या, हम ब्रह्म!.. हम परम!! हम सागर....      सत्ता हमारी...!! पर यहाँ हमारे छिद्र, हमारे रंध्र ..हमे खो रहे हैं... चुका रहे हैं...!!!         

Tuesday, December 13, 2011

एक दिन कृष्ण ने राधा के नथ (नाक की मोती) से पूछा :-

'ओ री मोती सीप की तू कौन तपस्या कीन,
सुबरन के ढिग बैठ के.. अधरन को रस लीन'!

(सीप के मोती तुने ऐसी कौन सी तपस्या की है जो सोने के साथ मिल के राधा के अधरों का रसपान कर रहा)

इसपे मोती ने कहा...

"छेड़ छिदो परहित कियों, तजि कुटुंब की लाज...
ओते दुःख मैंने सहे इन अधरन के काज!!"

Monday, December 12, 2011

एक चुटकी नमक

वो रोज पूछते हैं कि कितनी अहमियत रखते हैं मेरी जिन्दगी में.... खैर उनकी बात रहने दीजिए, आदत जो है उनकी....!! अपनी बात करते हैं...

आज डिनर में मैंने अपने पसंद कि सब्जी बनायीं.... बहुत अच्छी रंगत,, बहुत अच्छी खुशबू,,.. मज़ा आया गया देख के... खाया तो उसमे नमक नहीं था.... बाकी सबकुछ बेहतरीन!!

हाँ याद आया!!! उनकी अहमियत तो वही नमक जैसी है.. जो मिसिंग थी !!
हुंह... क्या एक चुटकी नमक की भी कोई अहमियत होती है?

Thursday, December 8, 2011

बड़ी प्रतीक्षा की होगी तुमने, शहनाई बजती होगी... द्वार पे अतिथि आये होंगे.. सहेलियों ने सजाया होगा तुम्हे!...
..फिर नहीं आया दूल्हा... न आवाज़ आयीं घोड़े की टापों की...  फिर खबर आई कि भाग गया है दूल्हा.. लापता हो गया!!  तो तेरे तो सारे सपने धुल धूसरित हो गए होंगे... अहंकार को चोट लगी होगी!!!! बहुत दर्द हुआ होगा.. है न..?. लेकिन.....??
... लेकिन....दर्द से ही कोई जागता है.. पीड़ा चुनौती बनती  है!!

इसे एक अवसर समझो एक नयी यात्रा का... एक नए  सृजन का ... !!!

कसम लो कि हो गयी बात! एक खेल से छुटकारा मिला! समय रहते तुम बच गए...

नाचो क्यूंकि वह समय लापता हो गया है.. बाद में ऐसे व्यक्ति के साथ रहने में पछतावा ही होता...!!
मत लेना सांत्वना किसी की... सांत्वना लेना और देना...सिर्फ मरहम पट्टी है.... भरोसा रखो सर्जरी में..!!!!

Wednesday, December 7, 2011

इधर ख़ामोशी, उधर ख़ामोशी, गुफ्तगू फिर भी हो रही  है,
वो सुन रहे हैं ब-चश्म-ए खंदा, बचश्मे- नम हम सुना रहे हैं!
जो मुस्कराहट से उनकी उठती है नगमाए बेखुदी कि मौजें,
वही तो बनते हैं शेर मेरे जिन्हें वो खुद गुनगुना रहे हैं!!!!!

Tuesday, December 6, 2011

वही तो है आशकी सरुरे निशाते रहती हो जिसमे हरदम
हो गम का अहसास जिसमे पैदा, वह आशकी आशकी नहीं है...!!

वही तो है बंदगी फक़त जो तेरी खुशी के  लिए अदा हो...
तलब कि जिसमे हो लाग कुछ भी वो बंदगी बंदगी नहीं है....!!!

Wednesday, November 30, 2011

बख्शी है मुसलसल एक तड़प तो इतना एहसां और करो,
हम पर भी नज़र वो जाये, जो दोनों जहाँ गरमाती है...!!
ये हार हमारी हार है वो...
जो तेरी जीत को भी शरमाती है ...!!!!

Tuesday, November 29, 2011

मेरे भक्त वत्सल गोपाल !!
क्या तुमने समझा है इस 'वात्सल्य' को? जाना है अर्थ इसका? हाँ ये ऐसा प्रेम है जैसा माँ का छोटे बच्चे से. बच्चे में कोई योग्यता नहीं है.. न वो तुम्हे कुछ कमा के दे रहा है.. न यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडल है उसके पास! पर माँ उस से अथाह प्रेम करती है... ये प्रेम किसी योग्यता के कारण नहीं है! बच्चा तो अपात्र , अबोध, असहाय है. उस से कुछ उत्तर भी तो नहीं मिलता! इसलिए इस प्रेम में सौदा ही नहीं सिर्फ देना है.. एक बेशर्त दान... वो तो धन्यवाद भी नहीं कहता....!!
और जब मैं कहती हूँ "हरि मोरे जीवन प्राण अधार, और आसरो नहीं तुम बिन, तीनो लोक मझार".. तो ये कह रही हूँ तुमसे कि मैं अपात्र हूँ; असहाय हूँ; कोई योग्यता भी नहीं ;प्रत्युत्तर में देने को मेरे पास तो कुछ भी नहीं है उसी बच्चे कि भांति... फिर भी.... हाँ फिर भी तुम देते हो!!!
जय श्री कृष्ण...!

Friday, November 25, 2011

तुम जानते हो......? तुम्हारा स्वर मेरे स्वर से मिल गया है. तुम्हारे बावजूद तुम समस्वर हो आते हो मेरे साथ.. कभी कभार....!! हो सकता है कभी कभार.... क्यूंकि ये मिलन तभी सम्भव है जब तुम स्वयं को भूलते हो... और उस क्षण तुम पाते हो कि तुम्हारा स्थान खाली है... भले ही क्षणिक हो ये पर तुमने सत्य देख लिया है... जैसे बांस कि खोखली बांसुरी और उसके भीतर से बह रहे संगीत का चमत्कार देख लिया है...! 
ये आकाश कि भांति एक एहसास है समस्वर होने के बाद भी लगता है वह नहीं है.. तुम भयभीत होते हो घबराते हो.. होता है ऐसा...!!! 

एक बात और.. अब मेरी उपस्थिति भी अनुपस्थित हो रही है..मैं हूँ भी नहीं भी...!!!
तुम जितने सजग हो रहे हो.. समर्थ हो रहे हो.. सफल हो रहे हो.. मैं शुन्य हो रही!!
बस एक स्वाद एक आभास हूँ.....!!

Thursday, November 10, 2011

ज़िन्दगी तेरी इबादत के तरफदार रहे
लाजिमी था कि मेरी राह दुश्वार रहे.

रो सके आप से लिपट कर न गले मिल पाए
ऐसे तलवार सा खिच जाना तो बेकार रहे.

अब मेरे शहर कि रस्मो का तकाजा है ये
दिल हो नाशाद पर मुस्कान असरदार रहे.

बस इसी जुर्म पे छीनी गयीं मेरी नींदें,
क्यूँ अंधेरों में मेरे ख्वाब चमकदार रहे.

है तेरी याद कि पुरवाई मयस्सर मुझको,
और होंगे जो  बहारों के तलबगार रहे.

Saturday, November 5, 2011

सारे जहाँ को रौशन कर सकते थे जिस शमां से हम..
झुलसा दिया गुलशन को , और खुद भी झुलस गए...!!!!
मुस्कान के इरादे अश्कों में ढल गए
आये बहार बन के खिज़ा बन के ढल गए.

हकीकत न जान पाए गम और खुशी कि हम,
थे गुल गले लगाये काँटों में छल गए.

डूबे कभी यादों में खोये कभी ख्वाबों में,

दो कलों में आज के बर्बाद पल गए.

नज़रें तो टिकीं हुईं थी चाँद और तारों पे,
खुद अपनी आँगन के ज़मीन पे फिसल गए.

दूर दूर तक खोजा करती हैं जिन्हें निगाहें
अफ़सोस बहुत पास से मेरे वो निकल गए.

मालूम न चल सका कब मौत आ गयी,
यूँ हौले हौले हाथों से बरसों नकल गए.

Wednesday, November 2, 2011



‎"क़त्ल" करके आये हो
और कहते हो तरन्नुम चाहिए
चलो.... बने रहो गरम तार बदमिजाज.. झाड झंखार
खेलते रहो -
मेरे कदमो से.. मेरी आहटों से..
मेरी कृतियों से , मेरी कनपटियों से...
समाई है मुझमे तेरी भी पत्नी.. तेरी माँ... तेरी बहन भी...
पर कभी न कभी.."सामा- चकेवा" खेलती औरतें..
रौन्देंगी तुम्हे..
उन ढेलों कि तरह...
फिर करवट लूंगी मैं...
गवाही मांगूंगी..
तेरी लाश से... तेरी कुकृति की !!!!

Sunday, October 30, 2011


जैसे हवा में अपने को खोल दिया इन फूलों ने,
आकाश और किरणों और झोकों को सौंप दिया है अपना रूप.
और उन्होंने जैसे अपने में भर कर भी इसे छुआ तक नहीं है..
ऐसा नहीं हो सकता क्या तुमसे मेरे प्रति?
नहीं हो सकता शायद ....
और इसी का रोना है..
या ऐसा भी किसी दिन होना है?
तुम्हारे वातावरण में मैंने डाल दी है कई बार अपनी आत्मा!
तुमने या तो उसे अपने अंक में ही नहीं लिया या..
इतना अधिक भींच लिया है,
जितना तुम्हे न पा सकने पर जीवन को छाती तक खींच लिया है.....
क्यूँ नहीं रह सकते हम परस्पर
फूल और आकाश की तरह?
यह नहीं हो सकता शायद, और इसी का रोना है...
या ऐसा भी किस दिन होना है?

Wednesday, October 19, 2011


सुना है गणित और तर्क शास्त्र के अध्यापक थोड़े झक्की और सनकी होते हैं... खास कर अवकाश प्राप्त हों तब..अपने परिचित १ प्राध्यापक हैं... ऐसे ही पर क्या सचमुच.....??
मैं गयी थी उनके घर देखा कि फूलों को पानी दे रहे हैं..एक टीन का फव्वारा था हाथ में..लेकिन पानी उसमे से गिर ही नहीं रहा था...वे खड़े हैं मूर्तिवत!! जब गौर से देखा तो उस फव्वारे में पेंदी भी नहीं थी... मैंने कहा कि 'आपको ख्याल नहीं रहा .. इसमें पेंदी नहीं है".. उन्होंने अजीब सा घूर और कहा.. "ख्याल तू रख देख फूलों को.. ये भी प्लास्टिक के हैं"!!
वाह रे पल्स्टिक के फूल.. न खिलना न मुरझाना... शाश्वत दीखता है.. सनातनी है...
वैसे ही जैसे मंदिर में भगवन कि मूर्तियां... न जन्मती हैं न मरती हैं...सनातन है.. और आप उसके सामने घुटने टेकते हैं...
कितना आसान है..झूट कि पूजा करना और जीवंत कि अवहेलना... आप इतने मुर्दा हो गए हैं कि मरे हुए को ही पूजते हैं,...
मूर्ती के सामने झुकने से हमारा अहंकार चोटिल नहीं होता है....क्यूंकि इसके मालिक हम हैं.. बाज़ार से लाया है.. जहाँ बिठाने का मन बिठा दिया.. मन हुआ भोग लगाने को लगा दिया.. देवता सो जाते हैं जब हमारा मन होता है.. पट बंद... भगवन के रूप में खिलौना मिला है हमे..!!
हाँ किसी व्यक्ति के सामने झुकते हैं तो हमारे अहंकार को चोट लगती है.. ध्यान रहे.. यही अहंकार श्रद्धा कि बाधा बन जाती है... यहाँ तर्क बाधा नहीं बनती जितना अहंकार!!
तर्क तो तरकीब है अहंकार को छुपाने कि... कि हम कह देते हैं कि कैसे झुकें..जहाँ दिल झुका है वहीँ सर झुकेगा, ऐसा भी कहा है हमने...
तब मुश्किल और बढ़ेगी जब ऐसा आदमी न मिले कि आप झुको... क्यूंकि आपका तर्क सदा कुछ खोज लेगा...!!

मिलिए इक जटिल आदमी से...अजीब आदमी से.. वही जो सारथि बना बैठा था अर्जुन के! उस से ज्यादा क्लिष्ट आदमी मैंने नहीं देखा... रथ पे जब बैठा तो कहा अर्जुन को,..( सार है.).' आत्मा अमर है! और जीवन का परम लक्ष्य- प्राप्ति है मुक्ति की'!!! बिलकुल महावीर जैसी बातें!!
मार्क्स जैसी बात कहते तो अर्जुन काट देता  वैसे ही मजे से जैसे स्टेलिन ने १ करोड लोग काट डाले. मार्क्स भी मिलता  अर्जुन को तो दिक्कत न थी.. वह युद्ध में उतर जाता.. महावीर मिलते तो भी वो तलवार छोड़ जंगल में चला जाता.. पर यहाँ मिले कृष्ण!!! अड़चन में डाल दिया... इन्होने कहा कि व्यवहार तो तू ऐसे कर जैसे दुनिया में कोई आत्मा नहीं है.. "काट!... अर्जुन काट"!!!.. और भली भांति जान ले कि जिसे तू काट रहा है काटा नहीं जा सकता!!
यह दो अतियों के बीच कि बात थी.. मुश्किल.. पता नहीं अर्जुन कैसे  अपने संतुलन को उपलब्ध कर पाया!!!
पर भारत अभी तक नहीं कर पाया है.. यहाँ कृष्ण कि बात तो खूब चलती है.. गीता पढ़ी जाती  है घर घर!लेकिन लोगों को गीता से सम्बन्ध नहीं है.. उन्हें छू भी नहीं सकी गीता.....यहाँ या तो वे अति वाले लोग हैं जो हिंसा को मानते हैं या तो वे हैं जो अहिंसा को!
अर्जुन जैसा व्यक्तित्व आज तक पैदा नहीं हुआ..!!!
सैनिक और सन्यासी एक साथ!! इससे ज्यादा कठिन बात दुनिया में संभव नहीं... शायद इस से ज्यादा नाज़ुक मार्ग कोई नहीं है..!! कृष्ण ने अर्जुन को यहाँ समुराई बना दिया... सैनिक और सन्यासी १ साथ! मैंने लाओत्से को जब पढ़ा आज तो बिलकुल कृष्ण जैसा ही पाया..उसने भी यही कहा,' वो युद्ध तो करता  है, लेकिन हिंसा से प्रेम नहीं करता!!!
मिलिए इक जटिल आदमी से...अजीब आदमी से.. वही जो सारथि बना बैठा था अर्जुन के! उस से ज्यादा क्लिष्ट आदमी मैंने नहीं देखा... रथ पे जब बैठा तो कहा अर्जुन को,..( सार है.).' आत्मा अमर है! और जीवन का परम लक्ष्य- प्राप्ति है मुक्ति की'!!! बिलकुल महावीर जैसी बातें!!
मार्क्स जैसी बात कहते तो अर्जुन काट देता  वैसे ही मजे से जैसे स्टेलिन ने १ करोड लोग काट डाले. मार्क्स भी मिलता  अर्जुन को तो दिक्कत न थी.. वह युद्ध में उतर जाता.. महावीर मिलते तो भी वो तलवार छोड़ जंगल में चला जाता.. पर यहाँ मिले कृष्ण!!! अड़चन में डाल दिया... इन्होने कहा कि व्यवहार तो तू ऐसे कर जैसे दुनिया में कोई आत्मा नहीं है.. "काट!... अर्जुन काट"!!!.. और भली भांति जान ले कि जिसे तू काट रहा है काटा नहीं जा सकता!!
यह दो अतियों के बीच कि बात थी.. मुश्किल.. पता नहीं अर्जुन कैसे  अपने संतुलन को उपलब्ध कर पाया!!!
पर भारत अभी तक नहीं कर पाया है.. यहाँ कृष्ण कि बात तो खूब चलती है.. गीता पढ़ी जाती  है घर घर!लेकिन लोगों को गीता से सम्बन्ध नहीं है.. उन्हें छू भी नहीं सकी गीता.....यहाँ या तो वे अति वाले लोग हैं जो हिंसा को मानते हैं या तो वे हैं जो अहिंसा को!
अर्जुन जैसा व्यक्तित्व आज तक पैदा नहीं हुआ..!!!
सैनिक और सन्यासी एक साथ!! इससे ज्यादा कठिन बात दुनिया में संभव नहीं... शायद इस से ज्यादा नाज़ुक मार्ग कोई नहीं है..!! कृष्ण ने अर्जुन को यहाँ समुराई बना दिया... सैनिक और सन्यासी १ साथ! मैंने लाओत्से को जब पढ़ा आज तो बिलकुल कृष्ण जैसा ही पाया..उसने भी यही कहा,' वो युद्ध तो करता  है, लेकिन हिंसा से प्रेम नहीं करता!!!

Friday, October 14, 2011

आज एक कहानी छोटी सी, एक मनोविज्ञान के प्रोफेसर हैं. उनका इकलौता बेटा भोजन नहीं कर रहा. पति पत्नी बड़े परेशान.. डांटा.. फुसलाया... सब उपाए किये पर कुछ नहीं. प्रोफेसर साहेब ने कहा, ठहर, मनोविज्ञान का उपयोग करना चाहिए. तो उन्होंने लड़के से कहा कि देख, अपना कोट पहेन, टोपी लगा, छड़ी हाथ में ले.. बाहर जा .. तू समझ कि तू हमारा मेहमान है.. अतिथि!!!
लड़का प्रसन्न .. बच्चे हमेशा अभिनय में बड़ा रस लेते हैं.. जल्द ही भेस बदला..बड़ी तेज़ी से बहार. पिता ने कहा, घंटी बजाना हम स्वागत करेंगे.. तू मेहमान..
लड़का गया.. थोड़ी देर में उसके नन्हे जूतों कि आवाज़ सीढ़ियों में सुनाई पड़ी.. घंटी बजाई,, दरवाज़ा खुला.. पिता ने स्वागत किया, आइये आप मेहमान हैं हमारे.. वक़्त पे आये.. भोजन तैयार है...लगाऊ?
लड़का टेबल पे बैठा, टोपी उतारी छड़ी रखी... पिता ने कहा जो रुखा सुखा है.. स्वीकार करें.. अतिथि!
लड़के ने कहा , "क्षमा करिए मैं अभी अभी भोजन कर के आया हूँ."

(जब अभिनय ही था... तो पूरा ही उसने किया..... आप क्या कहते हैं...?)
एक  मित्र मेरे देर रात घर लौट रहे थे.. वर्षा के दिन धीमी धीमी फुहार. रस्ते में वहां के विधायक महोदय मिले, कहा जनाब बिना छाते के...!
वो कहना नहीं चाहते थे कि छाता नहीं है .. न ही अभी खरीद सकते हैं.. सो उन्होंने कहा " ये एक अधय्त्मिक अभ्यास है ध्यान  है.. प्रयोग है..! परमात्मा वर्षा कर रहा है और तुम छाता लगाये  खड़े हो?बंद करो छाता.. ज़रा देखो बड़ा इल्हाम होगा. रिविलेशन होगा.. उद्घाटन होगा.. परमात्मा दे रहा है चखो"!!
विधायक जी को भरोसा न आया पा सोचा हर्ज क्या है...! दुसरे दिन क्रोधित लौटा...कहा.."मजाक की सीमा होती है . घर पहुच  कर मैंने ये प्रयोग किया ... ठण्ड लगने लगी .. शरीर कांपने लगा..मुझे लगा क्या मूर्खता कर रहा हूँ.. मैं पागल हूँ"?

मित्र ने कहा..              ये क्या कोई कम है पहले अभ्यास में इतनी अनुभूति...!!! ये उपलब्धि है... किये जाओ.. और भी आगे... अनुभव होगा परमात्मा का!!!!

(जो आप जगत में देख रहे हैं... वह जगत में नहीं है... वह आपका डाला हुआ है..!! पद लोलुप जो पद में देखता है.. पागल होकर लोग दौड़ते रहते हैं...!!!
कुछ पल्ले पडा......??)

Monday, July 11, 2011

AAS!!

झलक भर क्या देखा उनको
अल्फाज़ खुद ब खुद ग़ज़ल बन गए,
इस कदर बहते चले गए हम उनकी रौ में,
न खुद की खबर रही 
न फिक्र ज़माने की.
अब तो आलम ये है की,
इक झलक उनकी देख लेने की
आस बाकी है.
वो आयें न आयें-
उनके आने की आस बाकी है!

Tuesday, June 14, 2011

पहले प्रेम स्पर्श होता है, तदनंतर चिंतन भी,
प्रणय प्रथम मिटटी कठोर है, तब वायव्य गगन भी!!!
कभी कभी मन करता है बहुत दूर चली जाऊं...
जहाँ एक पक्षी एक पत्ता  तक न जानता हो मुझे,
जहाँ बस तुम्हारी यादों से भीगी हवाएं हों,
पैरों के नीचे तुम्हारी यादों का नर्म हरीयाल गलीचा....
और सर पर, आकाश के लाखों 
 सितारों कि आँखों से तुम मुझे देखते रहो......!!!

राजनीति..

राजनीति सम्प्रदाए मुक्त हो तो यह शुभ है.  पर धर्म शुन्य हो तो शुभ नहीं. धर्म जीवन का प्राण है. राजनीति जीवन कि परिधि से ज्यादा नहीं. और परिधि जैसे केंद्र को खोकर नहीं हो सकती है, वैसे ही राजनीति धर्म को खोकर राजनीति नहीं रह जाती.. "राज - अनीति"  बन जाती है. और यह धर्म के अभाव में भी संभव है. और आज राजनीति वही हो के रह गयी है,...
 हमने सुना कि एक सफल राजनीतिज्ञ, एक  सफल चोर, और एक सफल वकील एक साथ स्वर्ग पहुंचे. वैसे भी तीनो मित्र थे.. हैं... इसलिए मृत्यु में साथ आये...तो  कोई आश्चर्य  नहीं.. स्वर्ग के देवता ने पूछा, " सच सच कहना कितनी बार झूठ बोला है?"
"३ बार महाराज" ... चोर ने कहा.. भगवन ने उसे दंड के तौर पे स्वर्ग के ३ चक्कर काटने को कहे. वकील ने कहा, "३०० बार ". वकील को भी तीन सौ चक्कर लगाकर स्वर्ग में घुसने कि आज्ञा मिल गयी. 
लेकिन जब भगवन राजनीतिज्ञ कि और मुड़े तो राजनीतिज्ञ नदारद!!!
पास खड़े द्वारपाल से पूछा तो उसने कहा," महाराज वे अपनी साइकिल लेने गए हैं......". 

Thursday, June 9, 2011


कुछ बिखरे हुए से सपने थे..
कुछ टूटी हुई सी यादें थीं ....
एक छोटा सा आसमान था, उम्मीदों कि एक ज़मीन थी.
ज़िन्दगी के तस्सवुर में यूँ था तो बहुत कुछ,
फिर भी हसरतों के जहाँ में कुछ कमी थी....
चंद लम्हे मिले तो एक वक़्त बना,
कुछ सुर सजे तो गीत बना,
और आपकी यादों में में ज़िन्दगी यूँ कैद हो गयी कि....
शब् - ए- गम के इक इक पल में भी मुहब्बत का निशान बन गया....
आइये अपने ख्वाबों को यूँ सजाएँ कि,
चाहत के रंग प्यार कि खुशबू , रिश्तों कि महक से खिल उठे ज़िन्दगी हमारी !!
आज फिर ...
हर सांस में मेरी, तुम्हारा नाम जी रहा है,
हर बात ने तेरी, मेरी आँखों को नूर बख्शा है .....
झुकी झुकी सी पलकों ने इश्क को सलाम भेजा है...
धुआं धुआं सी वादियों ने हमे पयाम भेजा है,
रिश्तों के शहर से बाहर तो आइये ,
आवाज़ दी है मुहब्बत ने आज फिर!

Friday, June 3, 2011

दिल के आईने में उभरा प्रतिबिम्ब....


"दिल सोचने को बारहा मजबूर हुआ है, भीड़ का हर चेहरा क्यूँ मुझसे दूर हुआ है"
एक समय से सुबह उठने पर ये ख्याल आता है की चिर निद्रा क्यूँ नहीं आई? मेरे बाद शायद दुनिया ही सुधर जाए.

मैं तो अनामे ढंग से दुनिया के जंगल में उग आई,. तपती धुप से बचने के लिए लोगों ने मेरी छाओं के तले विश्राम किया और दो चार कुल्हाड़िया भी मार के चले गए. मैं कल रहूँ या न रहूँ, मेरी आवाज़ ही पहचान है गर याद रहे....अब तो तन और मन दोनों ही थक गए हैं, मन की थकन ज्यादा खतरनाक होती है.
मैं तो सबके लिए एक खाज की तरह फालतू और निरर्थक व्यक्ति नहीं वस्तु हूँ. बाहर से जो भी मेरा सम्मान हो.... लेकिन सूर्य की जिन बाल किरणों का स्पर्श पा कर कमल खिलता है और सूर्य के डूबते ही जो मुंद जाता है , वे ही उसे झुलसा डालती हैं....जब..... जब कीचड में उसकी जड़ें कट जाती हैं. यह राम चरित मानस में कहीं तुलसीदास ने लिखा है, "सो जड़ विहीन मैं".....

ज़िन्दगी आंसुओं में बह गयी,कोई किनारा न मिला....
कह सकूँ जिसे अपना, वो सहारा न मिला....

Wednesday, May 11, 2011

कहते हो नफरत है तहरीर से मेरे ....
फिर क्यूँ सजा रखे हैं तुमने ,
किताबों  की तरह..........
....................खतों को मेरे??? 

Friday, May 6, 2011



 बह रहा है पूर्वजो का रक्त मुझमे वास्तव में,
मानती थी मैं
स्वयं औरों को मनाने के लिए जाती समय पर.
मैं पृथक हूँ सभी से!

रे! उन्होंने तो लखा संकीर्ण स्वार्थी दृष्टि से
और सब हो गया उल्टा!
उनके निकट कुछ भी-
धन मान  योवन नहीं रक्षित! 

आज मैं जब हो रही कुछ कुछ व्यवस्थित
उन्ही के स्थान पर, और ह्रदय प्रेरणा देती लुभाती , कंपकंपाती
वृत्तियाँ निज देखती हूँ
तब प्रतिक्षण प्रश्न बस यह उठता 
क्या प्रीथक हूँ सभी से ?
पूर्णतः और सत्य ही! 

चल रही क्या नहीं मैं भी उन्ही के चरण चिन्हों पे?
प्रश्न उठते ही निरंतर जागता है 
गहन विश्वास!
खोखले मम - प्रश्न को
प्रतिध्वनित करती
चल रही नहीं  क्या मैं भी चरण चिन्हों पे उन्ही के!
बह रहा है रक्त आज भी पूर्वजो का मेरे, मुझमे!

Wednesday, April 13, 2011

NAARI...

हाड मांस की मैं हूँ नारी, नहीं बनी पत्थर की मूरत,
नहीं प्रदर्शन की वस्तु मैं, क्यों तकते हो मेरी सूरत?
प्रतिपल व्यूह रचा करते हो, छल छद्म के रहे हैं घेरे,
हर पल द्वन्द मचा करता है,दुश्प्रपंच के लगते फेरे.
तरुनाई में सूख गयी मैं, अरुणाई की आभा भूली,
कितने स्वप्न दिखे थे मुझको , कितने झूलों में मैं झूली!
नहीं अलगनी तेरे घर की, नहीं दीवारों की हूँ खूंटी,
जो तुमने वादे कर डाले, क्या वादे थे तेरे झूठी ?
अब तो हाल यही हैमेरा प्रश्न चिन्ह बन गया है फेरा....
दुःख कष्टों ने तन मन को, अब संग तेरे है कैसा घेरा....