Thursday, April 19, 2012

मेरी बेखुदी ने बचाया मुझे गुमराह होने से...
और लगजिशों ने मेरी, हर क़दम तुझ तक पहुँचाया मौला......!!!

(बेखुदी= बेहोशी, लगजिश = लडखडाहट)

Tuesday, April 17, 2012


बचा ले बकाए हयाते-खिरद से, और बेखुद बना...
बस यही आरजू, तेरे क़दमों में दे दूँ अब जां मेरे मौला

Monday, April 16, 2012

सोचूं, पी ही लूँ अब समंदर सारा..
मेरी तिश्नगी तू इतनी ही बढ़ा दे मौला...!

Friday, April 13, 2012


देखो उन्हें जो, जिगर के ज़ख्मो को सी रहे..
और उन्हें भी, जो खूने दिल हैं पी रहे...!
तुम तो रोते हो मरनेवालों पर..
हम रोये उन्हें देख, जो ऐसे जी रहे....!!

तू चाहे तो कर सकता है कत-ए-तअल्लुकात कभी भी...
.......मैं न रहूँ तो जिंदगी में तेरे कोई बखेडा ही न रहे.....!

Thursday, April 12, 2012

छोटी सी पुतली के पट पर, किस किस का प्रतिबिम्ब उतारूँ 
भीड़ खड़ी है सन्मुख मेरे, किसे छोड दूँ किसे पुकारूं...!

Tuesday, April 10, 2012

है हिम्मत! तो ये दो चीज़ें ले , तभी मुझसे मिल...
इक फूटी हुई तकदीर, और एक टूटा हुआ दिल......!

चीथड़े किये ख्वाब  के कल , फटेहाल किया ये  दिल...
हो गया आज शीशा ज़ालिम, इस दिल को आकर अब सिल..........!

Thursday, April 5, 2012

सखियों, आज ज़रा पुरुषों को याद करिए.. अपने दादा-नाना, पिता, पति भाइयों बेटों को, गुरुजनों के चेहरे, मित्रों के.... पड़ोसियों और राहगीरों के..... खोमचे वालों के मजदूरों  के.... संघर्षों  में जूझते लोगों के....!
हारते लोगों के जीतते लोगों के.....!
नहीं लगे न सारे चेहरे क्रूर.... कुछ तो छल कपट से परे... निष्पाप से लगे होंगे न... ?
ये बुरे तभी लगते हैं जब आपकी छाती पे खड़े होते... छलते हैं.... इज्ज़त लूटते  हैं... धोखा देते हैं... पर सब तो ऐसे नहीं न...? गौर करिए उन पर भी... जो तिल तिल मर रहे हैं ... घुट रहे हैं.. विपरीत हालत से जूझ रहे हैं...और हर माँ- बेटी- बहन को सम्मान देते  हैं..!
कभी देखिये पुरुषों से छ ली महिलाओं को कितनी महिलाए सहारा देतीं हैं? या की उन्हें मिलता है तिरस्कार?
ये संवेदनहीनता है..... स्त्रियों की भरमार के बावजूद स्त्री आगे बढ़ के हाथ  नहीं थामती, अकेली रह जाती हैं..(प्राय:)!
पुरूषों की कविताओं में वर्णन  नख से शिख तक आपके सौंदर्य का मिलेगा, हमारी कविताओं में उनके भेड़िये और जानवर होने के सन्देश मिलेंगे...!(है न?)

'स्त्री ही स्त्री की पीड़ा समझती है'... बचपन में सुना था....' आज नहीं मानती मैं....!'
'स्त्री-स्त्री की दुश्मन होती है'.. जब भी सुना करती थी विरोध करती थी, चीखती थी और भाषण दे डालती थी.." आज चुप हूँ!"
(जानती हूँ ऐसा कह स्त्रियों से बैर मोलना है)
:
:
:
तो आज आप मूल्यांकन करिए अन्य स्त्री के साथ अपना व्यवहार.... मन झूट न बोलेगा!

"अनुपम कृति है इश्वर की स्त्री... मानती तो हैं न... तो बस अब ज़हर न निकालिए .. उसे अमृत करिए, इतनी शक्ति है आपमें, जानती तो हैं न..!!!"

Wednesday, April 4, 2012

गिरा होता तो उठा भी लेते
मगर वो शख्स नज़रों से उतर गया....!
उसके जाने का नहीं,
गम तो इस बात है कि 
वो गया तो सारा शहर गया!
रूह मिलती है उसकी हर मोड पर ..
जो तलाश में जिया , तलाश में मर गया...!
कल फिर जनाजा उठेगा बस्ती से,
अभी कोई ले के ज़हर गया...!!

Tuesday, April 3, 2012

एक बार राधा जी ने बहुत सारे तोते पाले और उन्हें 'हरे कृष्ण- हरे कृष्ण' जपना सिखाया ...!अब दिनभर तोते हरे कृष्ण कहते.. सखियाँ भी वही कहतीं.. स्वयं राधिका  भी कृष्ण कृष्ण ही जपती..पूरा ब्रज कृष्णमय हो गया..!
.. सांझ के वक़्त राधा रानी नदी  किनारे कृष्ण की प्रतीक्षा में  सखियों के साथ विचर रही थीं.... साथ में प्रिये सखी मणिमंजरी जी भी थीं...!
श्यामसुंदर जी मंद गति से चले आ रहे हैं.. कुछ मलिन मुख लिए.. कुछ ढूंढते हुए से..! राधिके दौड़  पड़ीं... इतने में नारद जी कृष्ण के समक्ष दिखे... राधा वृक्ष की ओट से उनकी बात सुनने लगी...!
नारद जी कहा,"प्रभु, पूरे ब्रज में सिर्फ कृष्ण ही सुनाई देता है... यहाँ तक कि आपस में सारे सखा सारी सखियाँ भी कृष्ण ही संबोधित करते हैं... !"
हरि बोले "......... परन्तु, मुझे तो सिर्फ 'राधा' नाम ही प्रिये है...!"
इतना सुनते हैं राधा के नयन बरसने लगे.. दौड़ के महल में आकर उन्होंने तोतों को  "राधे -राधे "जपना सिखाया.. और समस्त सखियों को भी यही हिदायत  दी...

मणिमंजरी ने कहा, "ये क्या राधिके? तुम्हे लोग तो अभिमानी कह रहे हैं...तुम पर आरोप लगा रहे है... क्या तुम अपने नाम की जय बुलवाना चाहतीहो?"
श्री जी ने कहा" मेरे प्रियतम को यही नाम पसंद है... लोग यही नाम लेंगे.. अब चाहे जो आरोप दो, जो इलज़ाम दो.. कुछ भी कहो सखी...!!!"

(इलज़ाम लगाने वालों ने इलजाम लगाये खूब मगर
तेरी सौगात समझ कर के हम सर उठाये जाते हैं..!)

Monday, April 2, 2012

एक कली मांगी थी तुमसे....

मैंने कहा.. "कृष्ण ने मुझे एक पुष्प दिया था कल.."
वह बोली," बस इक पुष्प? मुझे अपना हार दे दिया उतार के."

और प्रतिस्पर्धा शुरू हो गयी......!! गोपनीय रहा न कुछ!! एक बात .....
"जैसे हम अपना धन छुपा के रखते हैं उसी प्रकार .. अपनी साधना.. अपनीभक्ति अपना प्रेम छुपाना चाहिए... बस मैं जानूं.. तुम जानो...."!

"प्रकट करने से... बस अहंकार और राग-द्वेष का पोषण ही किया..." यदि वो बखान ही कर रही थी तो मुझे धैर्य धारण कर , उसके सौभाग्य की प्रशंसा कर.. प्रणाम ही करना चाहिए था...!

"और उन्हें सार्वजनिक नहीं करना चाहिए था..."!!!!

Friday, March 30, 2012

ताजगी तो वही है जो दौड़े मौजे-निशां बन रगों में तुम्हारे..
.....सिर्फ आरजो-लब को रंगे वो ताजगी, ताजगी कहाँ......!

हो वही रौशनी भी जिस से हो दिलो- दिमागे बेशर दरकशा..
सिर्फ दरों दीवार ही रौशन हो, वो रौशनी, रौशनी कहाँ....!

...और जिंदगी भी वही जिसमे हो जिंदाबाद इश्क तेरा.....
जहाँ तेरी नामौजूदगी का खौफ, वो जिंदगी, जिंदगी कहाँ.....!!!
रश्मि मिश्रा के अनमोल वचन.....!
"दोस्तों , किसी लड़के /लड़की को प्रपोज करना है तो इस रविवार का समय उत्तम है... वो क्या है कि इस दिन मूर्ख दिवस कहते हैं .. यानि कि 'फूल डे'...(१ अप्रैल)!!
तो इस दिन अगर आप प्रस्ताव रखते हैं तो सेफ हैं! वो ऐसे कि अगर एक्सेप्ट कर लिए जाते हैं तो बढ़िया.. नहीं तो कह दीजियेगा कि ,'यूँ ही मजाक कर रहा था /रही थी .. आप तो बुरा मान गए .. तारीख क्या है आज?' 
जनाब देर न करियेगा इस दिन जूते/सैंडिल न पड़ेंगे पक्का..! काम बना तो ठीक वरना भाई/बहन बना लीजियेगा! चलता है यार"!!!!

Monday, March 26, 2012

"इक हम हैं जो बैठे ही हैं मुसीबतें झेलने को...
और जो तुम हो कि , बैठे हो सिर्फ आफतें ढाने को...!!" 

Saturday, March 24, 2012

एक आदमी किसी अपरिचित नगर में पहुँचता है.. जहाँ की न तो भाषा आती है उसे, न चाल चलन की जानकारी..! भूखे प्यासे भटकते हुए एक  महल के द्वार पे पहुचता है.. जहाँ संभवत: कोई भोज चल रहा है सोच दाखिल होता है... सभी बैठें है भोजन पर सो उसने भी बैठ के तरह तरह के पकवान खाए... वो एक होटल था.. !खाने के बाद जब बैरा बिल ले के आया तो उसने सोचा कि शायेद इस महल के राजा ने धन्यवाद पत्र भिजवाया है.. बिल को जेब में रख वह प्रत्युत्तर में झुक झुक के आभार प्रकट करता है कि 'मुझ जैसे अजनबी का सम्राट ने इतना स्वागत किया.. अपने देश जा के खूब प्रशंसा करुंगा ..!' बैरा कुछ न समझा तो उसे पकड़ के मैनेजर के पास ले गया... आदमी और प्रसन्न कि लगता है प्रतिनिधि मेरे धन्यवाद से  खुश हो  बड़े अधिकारी के पास ले आया. खूब खरी खोटी सुनने के बाद भी वह धन्यवाद दिये जा रहा है.
अब उसे अदालत में ला खड़ा किया गया तो उसकी खुशी  और बढ  गयी उसने सोचा कि अब वह सम्राट के पास आया गया है.. और वहाँ भी उसने देश कि प्रशंसा  में कसीदे काढे... कि वह अभिभूत है यहाँ आ के.. उसकी खुशी का ठिकाना नहीं...!  जज ने इसे चालबाज ठहरा के गधे पर उल्टा बिठा नगर घूमाने का आदेश दिया...!
साथ में एक  तकथी भी लटका दी गयी कि"ये आदमी चालबाज़ है...जिसके सामने से ये गुज़रे इसे भरपूर गालियाँ दो"..
अब तो उस आदमी के पैर न थे ज़मीन पर उसे लगा कि उसकी शोभा यात्रा निकाली जा रही है एवं लोग इसकी प्रशंसा में गीत गा रहे हैं..! वह गदगद सपने बुनने में  व्यस्त कि देश जाके अपनी कहानी सुनाएगा.. अगर कोई देखनेवाला भी रहता तो बड़ा मज़ा आता...!
अचानक उसके देश का एक परिचित दीखता है वह चिल्लाता है." देख! मेरा कितना स्वागत हो रहा है.."
वह आदमी भाग जाता है कि उसे पता है क्या हो रहा है... और ये मूर्ख यही कहता है..."उफ्फ्फ कैसे मुझसे जल के भागा वह अभागा.."!!!

(अहंकार में डूबे लोग ऐसे ही भ्रांतियों  के शिकार होते हैं. जिनका न जीवन के तथ्य से सम्बन्ध है न जीवन की भाषा मालूम... कोई ताल मेल नहीं जीने और जिंदा रहने का ....!)

Tuesday, March 20, 2012

आज देखना एक दिये को ध्यान से... देखना उसकी लौ..उसकी रौशनी,.. उसकी बाती, उसका तेल.... और उसकी जलन!!!!!!
देखना कैसे बाती.. तेल को जलाती है... सारे तेल को जला खुद जल जाती है...! बाती को लपट जलाती है.. और भभक के  अंत में बुझ जाती है... सारी  आग सारी जलन खतम... खेल खतम!!!

ह्म्म्म.....!!!
 पहली बात:  ये तर्क को दिखा रही है.. तर्क के कैसे इनकार होते हैं.. एक पर एक चीज़ इनकार  भरी.. 'ये नहीं..ये भी नहीं.. ये भी नहीं.. वो भी नहीं...' अंतत: सारे इनकार के बाद तर्क खुद मर जाता है.. अब कुछ नहीं इनकार को!!

दूसरी बात:  विश्वास को दिखाती है..!! यहाँ स्वीकारोक्ति सी दिखती है...विश्वास कि स्वीकृति .. ' ये सही.. हाँ, ये भी सही... ये भी और वो भी...'  सब स्वीकार है..! अब विश्वास की भी ज़रूरत नहीं...!

अब सोचिये जहाँ तर्क और विश्वास दोनों गिर गए तब क्या बचा?????
.
.
.
.क्या यहाँ प्रेम है?????

Saturday, March 17, 2012

देखो तनिक न दुखइयो मोरी कलईया
श्याम तनिक न दुखइयो , मोरी कलईया  रे...
सुघड़ गोरी मोरी बहियाँ...!

सब सखियाँ मिलि घेर के बैठीं
बीच भये बनवारी....
आपन  आपन देत कलाइयाँ
सखियाँ बारी बारी...
हंस हंस बात  करे सबसे
वृंदा-विपिन -बसईया रे...
चित्त ले गया सावरा कृष्ण कन्हैया रे...!

सब में मोरी पहचान कलाई
धरे कन्हाई कस के..
छोटी सी चूड़ी पहनावे
बांह दबावे कस के!
मैं तो रोवन लागी कह के मईया मईया रे...
चित्त ले गया सावरा कृष्ण कन्हैया रे...!
सुघड़ गोरी मोरी बहियाँ... !

टूट के चूड़ी  हाथ  में गड़ गयी..
डरन  लागे बनवारी...
झट से मोरी छोड़ कलईया
भाग गए बनवारी!
इधर मैं भई दीवानी
उधर श्याम  दीवाना ....
मोसे ऐसे बात करन को
ढूढे रोज बहाना...
सब जन प्रेम की तोरी
करन लगे कवितईया रे ..!
जो चित्त ले गयो साँवरा कृष्ण कन्हैया रे...!सुघड़ गोरी मोरी बहियाँ... !

Monday, March 12, 2012

सबकुछ वही तो है पहले जैसा... सिर्फ रूप.. रंग.. ढंग... शैलियाँ बदल गयीं प्रेम की ... ! पर है तो शाश्वत ही.. जैसे आत्मा ने वस्त्र बदले..! जैसे नदी सागर में गयी... सागर किरणों से चढ़ कर मेघ बना...मेघ फिर बरसा नदी में और नदी सागर में!!
एक बूँद भी न खोयी ... जल उतना ही रहा जितना  सदा था ..!
मेरा प्रेम भी वैसा ही  रहा न..! कल तुम्हारे साथ मैं ही तो नाची थी वृन्दावन में ललिता के रूप में ...! मेरी वीणा में राग तो तुम्हारा ही बजा था जब मैं मीरा थी...! याद तो है न...???
"देखो, कृष्ण! प्रेम की न कोई विधि है न विधान"....! 
"तनिक सी दूरी से काहे घबराए जाते हो"...?
"अरे! मैं तो वही हूँ जिसने 'पांच हज़ार साल के फासले' से प्रेम किया था"......!!!!

Friday, March 9, 2012

जिन्होंने न देखी  है सूरत को मेरी
देखेंगे वो आज नंगे  बदन को...!
पति मेरे हारे हैं जुए में बाजी..
महलों की  रानी लुटी जा रही. है..!
खिंच न सका चीर , दुश्शासन जो हारा ..
सभा बीच भगवन है तेरा सहारा......!
साड़ी के धागों में तुम जा छुपे हो...
इसी से ये साड़ी बढ़ी जा रही है.........!!!

Monday, March 5, 2012

न जाने कहाँ तक फैली है तेरे हुस्न की वुसअत ...
....और, न जाने मेरे इश्क की परवाज़ क्या है....!

Friday, March 2, 2012


अजब रंग उनकी अदा के, हम तो बस परेशान रहे,
दिन में दिख रहे जो चाँद से, हर रात वे  आफताब रहे...!

पढ़ा भी बहुत लेकिन उन्हें पढ़ने में नाकाम रहे,
हर पन्ना रोज बदला जिसकी ऐसी वे किताब रहे..!

अब  मुकाम उनको मिल गया, क्यूँ छानते हम ख़ाक रहे,
है जवाब हर सवाल का.. पर वे तो  लाजवाब रहे..!!
जागती रही आँख इधर.. देखते वे ख्वाब रहे...........!!!!!

Thursday, March 1, 2012

चलो अँधेरी रात में सहर ढूंढते हैं..
नदी  की  रेत पर कोई लहर ढूंढते हैं..!

हर तरफ खड़ा है जो  ज़हर का हिमालय,
ज़हर काटने को चलो, ज़हर ढूंढते हैं...!

ओज़ोन का दरकना ठीक नहीं  है शायेद,
बचाने को चलो, कोई डगर ढूंढते हैं...!

क्या खबर होगी  कल के सूरज की ,
आज की खबर में चलो, खबर ढूंढते हैं..!

Sunday, February 19, 2012

जैसे रोज़ नज़र आये वैसे नहीं हैं हम,
जैसे तुमने देखा वैसे भी नहीं हैं हम...!
कुछ तो छिपाया है हमने भी खुद से,
है तुम्हे पता भी कि कैसे हैं हम........?

बहुत गुमां है तुम्हे जो खुद पर..
कभी न कभी तो सोचा भी होगा...!
जो इतने लोग हैं तुम्हारे ठुकराए हुए...
हो जाएँ जो एक तो फिर क्या होगा........?

Thursday, February 16, 2012


न मरने की तमन्ना है अभी, न रही जीने की कोई आस..
................हे राम! ये किस शख्स से उलझा दिया हमे...!!!

Wednesday, February 15, 2012

बस ,इसी अय्याशी में हम दोनों ही जी रहे हैं....
.....तुम हमे खा रहे हो , हम तुम्हे पी रहे हैं.....!!
दिल खोल के आज वो बाँट रहा है 'सबके' प्यालों में शराब...
......मैं साथ रही चल उसके, जाने कब मेरी बारी है....!!!

Thursday, February 9, 2012


तुम्हारा प्रेम, लबालब!
एक मौसमी 'नाले' की तरह...
जो उफनता है बरसात आने पर..!

मेरा प्रेम, इक 'नदी' की  तरह
हर मौसम में एक सा बहाव
एक सी दिशा...!

प्रचंड गर्मियों में जब सूखता है जल पृथ्वी से...
तब मुझमे नदी की लकीर ,
और निश्छल चमकीली रेत ही दिखती है..

और  तुम्हारे भीतर दिखती है गंदगी
और सड़ी हुई मिटटी
वासना की!!

Wednesday, February 8, 2012

अफ़सोस! अब कहाँ से लाऊं मैं वो दिल तेरा...
...जो धडकता था दिन- रात बस मेरे लिए.....!!

Tuesday, February 7, 2012

बचपन में माँ बहुत कहानियां सुनाया करतीं थीं... बहुत सारे कभी कभी तो एक ही कई कई बार...! १० साल पहले एक राजस्थान की लोक कथा सुनाई थी उन्होंने . ठीक ठीक याद नहीं पर कहानी कुछ यूँ थी....
" एक राजा का दिल खूबसूरत सी पनिहारिन पे आ जाता है,जो उस से उम्र में काफी छोटी थी. राजा उसे घर ले आता है. और रानियों कि तुलना में उसका ज्यादा ध्यान रखता है.(ख्याल रहे ,पहले रानियों की 'संख्या'को 'स्टेटस सिम्बल' से जोड़ा जाता था).
फिर भी उसे हमेशा ये डर लगा रहता था कि कहीं ये उसे छोड़ के भाग न जाए..! तो एक मित्र की सलाह से उसने सुनार बुलवा के एक जड़ाऊ भारी सी "झांझ' उसके पैरों में डलवा दी ताकि कहीं भी आने जाने से उसकी आवाज़ कान में पड़ती रहे. पनिहारिन भी खुश कि राजा मुझे इतना प्यार करते हैं कि इतनी कीमती चीज़ मुझ गरीब को दी है... इसलिए चलने में कठिनाई होने पर भी वो कुछ न कहती..!
समय बीतता गया अब राजा को यकीन हो गया कि पनिहारिन उससे बड़ा प्रेम करती है. इतने भारी जेवर से लडखडाती भी है तो उफ़ तक नहीं करती, अब ये उसे छोड़ कर न जायेगी.... सो उसने वापस सुनार को बुलवा के झांझ उतरवा दिया...!!
दूसरे दिन पनिहारिन राजमहल से गायब!! भाग गयी...!!!
... कुछ दिनों बाद एक बांदी ने उसे गांव में देखा अपनी सहेली से वो कह रही थी..." अरी! राजा ने तो बड़ा प्रेम किया मुझसे...इतनी कीमती झांझ जाते ही दी,.... बड़ा भरोसा था.. और एक दिन उसका भरोसा कैसे खत्म हुआ री, कि मेरी पाजेब उतरवा ली??"
"क्या यही प्रेम था सखी?"
"......." ................ कहानी खत्म...!!!!!!

किसी को यकीन हुआ.... किसी का भरोसा टूटा!!!!!!
आपको????

Monday, February 6, 2012

राज़ की बात मैं तुमसे कह रही हूँ
सुन सकोगे? मैं तो कबसे सह रही हूँ...
एक मुक्कमल सी ईमारत दिख रही हूँ..
पर कहीं भीतर ही भीतर ढह रही हूँ..
है हवाओं की ज़मीन, बादल की छत है..
मुद्दतों से जिस मकाँ में रह रही हूँ ...!!
जिस किले में क़ैद हूँ मैं उस किले की
न कोई प्राचीर है, न कोई दर है..!
न कोई पहरा न कोई पहरेदार!
न दिखे  कतरा हुआ, कोई मेरा पर है!
फिर भी पंछी से नन्ही परवाज़ मेरी....
घुट के रह जाती है क्यूँ आवाज़ मेरी...!
है ये कैसी क़ैद कि इस क़ैद में भी..
है नज़रबंदी पर मुझ पर न नज़र है....!!!
बीते वक्त में जा कर जब यादों के धागे उलझते हैं, तब बहुत सी बातें जेहन में उतरती हैं...!
अल्हड मन रिश्तों के फलसफे समझने की कोशिश में है..!!.एक तरफ जीवन मृत्यु के जुड़े मसले.. दूसरी तरफ तुम्हारी यादें..और मेरे ख्वाब!!
रेत की तरह फिसल रही मेरे खवाबों की ताबीर...!! दिल कहता है एक बार जी ही लूँ इन लम्हों को... शायद वक्त मिले न मिले...!
खुदा ने चाहा तो बदल ही देगा मेरी तकदीर!!!!
एक कहानी तो हम सब ने सुनी ही है.. जब कृष्ण ने माटी खायी और यशोदा ने उनका मुख खुलवाया तो मुख में सारा ब्रह्माण्ड.. ग्रह नक्षत्र आदि दिखे. और प्रतिक्रिया में यशोदा मूर्छित हो गिर पड़ीं. मैं क्या प्रतिक्रिया दिखाती.. सोच में हूँ..!
हुआ यूँ कि आज मेरे बेटे ने कुछ खाया.. मैंने उसके होठों पे काली भूरी कोई चीज़ लगी देखी तो पूछा "क्या खा रहा है.. मूह खोल"... थोड़ी देर आनाकानी के बाद उसने मूह खोल कर दिखाया और चिल्लाया ..."आ आ...आ...."गूगल"!!!

दरअसल मूह में थी तो चाकलेट, पर मैं सोच में पड़ गयी कि क्या सचमुच आज "गूगल" पर्याय हो गया है "ब्रह्माण्ड" का?

Friday, January 27, 2012


आज फिर ...

आज फिर मेसेज मिला उसका
ठीक वैसा ही लिखा था उसने...बरसों बाद भी...
"चलो देखते हैं चाँद को हम-तुम
आज फिर उसी तरह, एक साथ!
ऐसे ही तो देखते थे... पहले भी..!
फिर मीलों दूर बैठ के भी तो देख सकते हैं..
एक साथ!"
"तुम मुझे देखना उसकी नज़रों से.. मैं तुम्हे.."

तीन घंटे बालकनी से आसमान निहार.. झुंझलाकर ये भीतर चली आई...
वो रात भर बैठा रहा छत पे
जले अधजले सिगरेट के टुकड़ों
और बुझी हुई तीलियों के साथ...!
न दिखा चाँद दोनों को....
"आज फिर अमावस की रात थी.......!"

Wednesday, January 25, 2012

सुनो, जहाँ से रिवाजों के बंधन टूटते हैं वहाँ से मेरी दास्ताँ शुरू होती है! जब भी निगाहों के पहरे कसते हैं जज्बातों की गिरफ्त ढीली पड़ती जाती है.. जब पूरे चाँद की रात धरती को भिगोती है...तब आँखों कि सीप में तुम्हारा चेहरा मोती की तरह क़ैद हो जाता है...कभी न आज़ाद होने के लिए.. !!
ये इश्क है इसे तुमने कभी समझा नहीं...लेकिन चाहत के परिंदों को रोकना तुम्हारे वश में न था... न होगा! तुम्हे अपनी ताकत का गुमान है तो हमे अपनी चाहत की कसम है.. ये आँखे अब देखेंगी तो तुम्हारा चेहरा..! चाहे अपनी इज्ज़त का वास्ता दो या जान की कसम.. ये मंजिल की और बढे कदम हैं.. न रुकेंगे न पीछे लौटेंगे...!
हम शहेंशाह हैं प्यार की जागीर के
प्यार इबादत है प्यार खुदा है...
ये आशिक की मजार है..
इक चिराग इश्क का जला दो...
कुछ फूल चढा दो प्यार के...!
आमीन...!!!!
ख्वाबों की वादियाँ हैं , चाहत की आबादी भी...
जिंदगी कि रंगीनियाँ हैं और लम्हों की आजादी भी...
टूटकर यहीं बिखर जाएँ...
आ हम तुझमे सिमट जाएँ....!!!

Friday, January 20, 2012

अजीब उपद्रवी हो भीतर से तुम!
तुम्हारी सारी व्यवस्था ...तार तम्य.. भीतरी संगीत.. स्वर... मेलोडी सब अस्त व्यस्त से हैं...!!!! दिखावा...! छलावा!!
तुम्हारे भीतर आग  जलती है और  सर्दी दिखाते हो... क्रोध उबलता है तो मुस्कुराते हो...भीतर वासना पड़ी है और दिखा रहे हो की सन्यासी हो?
भेडिये कहीं के....!!!!!

गवां दिए वो अवसर तुने जहाँ मैं महा- संगीत पैदा कर रही थी...!!!!
मिथ्या रोगी....!

Wednesday, January 18, 2012

...कभी काठ की चिता पर तो कभी कलंक की...... अग्नि तो अपने ही देते हैं.. प्राय:..!
......और सुलगती है स्त्री..... धू - धू करते हुए अपने अस्तित्व को देख रही है ... आँचल की ओट से!
पृथ्वी की सारी कवितायेँ.. कविताओं के बिम्ब!....गुलाबों के गुच्छे .. हरी घास.!. रौशनी.. !चेहरे पे फैली हँसी, पसरा हुआ विषाद..!.शिशु का क्रंदन .. !सौंदर्य और माधुर्य.. ! खंडहरों के अँधेरे ...विश्वास के टूटे नीवं और अपने सड़े- गले -गंधाते अस्तित्व का अनंत काल से भोग करती आ रही हैं स्त्रियाँ!!

खंड चित्त

तुमसे जो तरंगें निकलती थीं और सारी प्रकृति से उन तरंगों का जो तालमेल था वह टूट सा गया है....जो इनर हार्मोनी थीं वह भी टूट गयीं है... तुमने अपने हाथों से ही सब तालमेल तोड़ डाले हैं.. और अकेली खड़ी हो गयी हो आज -दुश्मन की तरह! तुम्हारा हठ ये कहता है की भावपूर्ण होना मूर्खता है...जबकि तुम ये जानती हो की भावहीन होना मूर्खता है..!!
न बादलों से दोस्ती न नदियों से प्रेम......!

"खंड खंड चित्त, स्व-विरोध में बंटा व्यक्तित्व ..डिस इंटिग्रेटेड व्यक्तित्व ...."
"कल तेरे वीणा के तार बहुत ढीले थे.... संगीत पैदा ही न हुआ ..." ' आज तूने तार बहुत कस लिए हैं.. टूट गया... और संगीत मर गया'!

"मूढ़"!!!!!!!!!!

उठो... जागो!! चौंको... और सजग हो जाओ! नए प्रेम की शुरुआत करो जो शाश्वत हो...!
देह से प्रेम तो बहुत किया .. अदेही से करो.. मृत्यु न होगी तेरे प्रेम की!!!

Wednesday, January 11, 2012

मुझे परतंत्रता में जिलाने की तुम्हारी कोशिश ऐसे ही है जैसे:
"तुम आकाश को  डिब्बों में बंद करना चाहो...
....किरणों को  संदूकों में भरना चाहो...
...........खुशबू को मुट्ठियों में भीचो...."
"यह नहीं हो सकता....."
अस्वाभाविक है....!!! .. मगर..
तुम ऐसा ही करते हो....
और प्रेम के नाम पर जंजीरें रह जाती हैं.... बोझिल!!!!
मुह में तिक्त और कड़वा   स्वाद रह जाता है...................!!!

Tuesday, January 10, 2012

दो  छोटे बच्चे एक ५ साल का एक तीन का.. बातें कर रहे थे धीरे धीरे..छोटे ने पूछा "भैया पढाई से बचने केलिए क्या करूँ" नया स्कूल शुरू हुआ था ...
बड़े भई ने कहा उसके कान में.."देख, तू ' सी ए टी 'कैट  से बचना बस. क्यूंकि अगर तुने इसे सीखा तो बहुत कुछ सीखना पड़ेगा..."! "तू अड़ जाना इसी पे...न सीखना मुझे...इसके  बाद बड़े बड़े शब्द आते हैं... सब सीखना होगा फिर.. मैं फंस गया तू मत फंसना "!!!!!!!

सच है न एक चीज़ को  पकड़ो  तो पकड़ शुरू होती है... फिर दूसरी को पकड़ना पड़े... तीसरी को.. सिलसिला  शुरू!!!
एक श्रंखला है....!!!!
 जीना गुजरना अनुभव से... पकड़ना अनुभव थोड़ी है...!!! और हमेशा अनुभव की संभावना क्यूँ....?? जल्दी क्या है ..किसे है पकड़ने की...? और पुनरुक्ति...आकांक्षा  ही मत करो..!!
क्यूंकि इस अभीप्सा के पीछे यही समझ विकसित होती है की हम बंधन में हैं....!!!
मुझे बंधन पसंद नहीं!!!!!!!!!!!!!!! न...... ना... नहीं!!!

Monday, January 2, 2012

आज अर्जुन की बात....  मैंने आज इसका खोजा/पढ़ा... बड़ा अर्थपूर्ण है "अर्जुन"!!!
ये शब्द है "ऋजु"... जिसका अर्थ होता है सीधा सादा...(straight ).. और  अ-ऋजु का मतलन- टेढ़ा मेढ़ा!!! डावांडोल...!!! इसका शाब्दिक अर्थ है डोलता हुआ...!!!
हमारा चित्त है ये अर्जुन की भांति है,..  डोलता हुआ.. कभी निश्चय नहीं कर पाता.. सारे कार्य अनिश्चय में होते हैं... हाँ सबके भीतर है अर्जुन!!
वही जो हमारे मन का प्रतीक है...!!!मन का एक ढंग है कि आप कितनी निश्चित बात करें वह उसमे से अनिश्चित निकाल ही लेता है.. जैन फिर इसका क्या होगा.. उसका क्या होगा....?
बातें निश्चित नहीं होतीं.. चित्त निश्चित होते हैं!!!सिद्धांत निश्चित नहीं होते, चेतना निश्चित होती है!
बड़ी कृपा अर्जुन की वरना गीता पैदा नहीं होती.. न वे उठाते प्रश्न न कृष्ण उत्तर देते.. न लिखी जाती गीता!!! कृष्ण जैसे लोग लिखते नहीं सिर्फ responce करते हैं..!! लिखते तो वे लोग हैं जो किसी पे कुछ थोपना चाहते हैं.... कृष्ण तो सिर्फ उत्तर देते हैं.. पुकारने पे आते हैं!!!कोई कुछ न पूछे तो कृष्ण शुन्य और मौन रह जायेंगे..!!!
कृष्ण से कुछ लिया न जा सकता है सिर्फ बुलवाया जा सकता है...प्रतिसंवेदित कर सकते  हैं! अर्जुन ने बुलवाने का काम किया है...उनकी जिज्ञासा उनके प्रश्न कृष्ण के भीतर से तब जन्म पाते हैं..!!!

Saturday, December 31, 2011

नश्तरे जुबां हमे वो इस खूबी से  चुभा गए,
ता उम्र  उसकी दवा को हम ढूंढते रहें या रोते रहें...

चादर हमारे ख्वाब की वो फटेहाल बना गए...
धागे  उनके ख्याल के हम पिरोते रहें या सीते रहें.....!!

नवयुग में युग धर्म का यह नूतन आकार
सरस्वती को अपमानित कर, लक्ष्मी का सत्कार
भय लज्जा को त्याग निरंकुश , खुलकर अत्याचार
चाहे जिस बल कौशल से, सत्ता पर अधिकार
सिर्फ युग-धर्म दुहाई देकर , लोक विरुद्ध सुधार
हरिभक्तों को फांसी देकर हरिजन का उद्धार
किया निरिक्षण इस युग का, यही रहा मेरा शोध..
नव युग है "भ्रष्टों" का युग , हुआ यही आत्मबोध!

Tuesday, December 27, 2011

जानते है आप प्रेम कोई सम्बन्ध (relationship) नहीं, मन की अवस्था (state of mind) है. जब हम सोचते हैं ऐसा कि हम फलां से प्रेम करते हैं तो वह गलत है होता यूँ हैं कि हम प्रेमपूर्ण होते हैं! मैं तो इसे अवस्था ही मानती हूँ, क्यूंकि प्रेम से भरे हुए चित्त से प्रेम ही झरता है रौशनी की तरह सुगंध कि तरह...और जो भी पास आता है अगर वो लेने में समर्थ है तो मिल ही जाता है अगर नहीं तो वो उसकी बात!!!
प्रेम मुक्ति है! वह किसी को बाँधने का प्रश्न ही नहीं उठता.जो पास है उसे मिलता है जो दूर गया... वह गया..!!जैसे दर्पण के सामने कोई रहता है तोउसकी तस्वीर बनती है हटने पर तस्वीर मिटी.. दर्पण फिर खाली! फिर किसी की तस्वीर बनाने को तैयार.!किसी की प्रतीक्षा बनी रहेगी फिर कोइलेने को तैयार!
अगर कोई बंधन है ,कोई रोक है, तो वो आसक्ति है.. न कि प्रेम! आसक्ति रोकती हैकि रुको! नहीं तो फिर  मैं किसे  प्रेम दूंगी ? आसक्ति कहती हैकि तुम ऐसा ऐसा करना तो ही मैं प्रेम करूँ.. तो ये कारागृह में डालना हुआ..  प्रेम तो बे शर्त दान(un conditional giving) है!! प्रेम स्वतंत्र करता है एक व्यक्ति को व्यक्ति बनने देता है वस्तु  नहीं!
आसक्ति प्रेमके मार्ग में एक झूठा सिक्का (hippocracy)है .. तब आदमी सिर्फ संबंधो में जीता है.. जिस दिन पता चले कि मैं प्रेमपूर्ण हूँ ..उस दिन हम आप्तकाम (self fulfilled)होंगे .. और आनंद को उपलब्ध होंगे!!

Wednesday, December 14, 2011

मन का खेल है सब... मन कभी लहर तो कभी सागर बनता जाता है. जब विचार उठें तो लहर... जब निर्विचार  हों तो सागर!!!    शायेद यही ध्यान है...
कभी तो यूँ लगता है कि हम हज़ार छिद्र वाले बाल्टी बन गए हैं... जब कुवें में डाले जाते हैं तो  बड़ा शोर होता है... हलचल होती है!
पर जब तक पानी में हैं तभी भरे हुए से प्रतीत हो रहे है... जैसे ऊपर उठते जायेंगे खाली होना शुरू... और वही शोर!! इसी में तो हम खुश हैं...खाली  होने के शोर में...   


हाँ यही हजारों छेद.. हमारे हजारों विचार है...इसी से हमारी उर्जा भी तो कम होती जा रही है. जिस समय निर्विचार  हुए , उर्जा खोने का मार्ग बंद हो जायेगा!
वही उर्जा वापिस  हममे गिरेगी.      मन से खोया है मन से मिलेगा... मन से भटके हैं, मन से पहुचेंगे.. मन ह् रुग्ण है स्वस्थ हो जाए तो मिल जाए जो खोया है...!!...

 फिर क्या, हम ब्रह्म!.. हम परम!! हम सागर....      सत्ता हमारी...!! पर यहाँ हमारे छिद्र, हमारे रंध्र ..हमे खो रहे हैं... चुका रहे हैं...!!!         

Tuesday, December 13, 2011

एक दिन कृष्ण ने राधा के नथ (नाक की मोती) से पूछा :-

'ओ री मोती सीप की तू कौन तपस्या कीन,
सुबरन के ढिग बैठ के.. अधरन को रस लीन'!

(सीप के मोती तुने ऐसी कौन सी तपस्या की है जो सोने के साथ मिल के राधा के अधरों का रसपान कर रहा)

इसपे मोती ने कहा...

"छेड़ छिदो परहित कियों, तजि कुटुंब की लाज...
ओते दुःख मैंने सहे इन अधरन के काज!!"

Monday, December 12, 2011

एक चुटकी नमक

वो रोज पूछते हैं कि कितनी अहमियत रखते हैं मेरी जिन्दगी में.... खैर उनकी बात रहने दीजिए, आदत जो है उनकी....!! अपनी बात करते हैं...

आज डिनर में मैंने अपने पसंद कि सब्जी बनायीं.... बहुत अच्छी रंगत,, बहुत अच्छी खुशबू,,.. मज़ा आया गया देख के... खाया तो उसमे नमक नहीं था.... बाकी सबकुछ बेहतरीन!!

हाँ याद आया!!! उनकी अहमियत तो वही नमक जैसी है.. जो मिसिंग थी !!
हुंह... क्या एक चुटकी नमक की भी कोई अहमियत होती है?

Thursday, December 8, 2011

बड़ी प्रतीक्षा की होगी तुमने, शहनाई बजती होगी... द्वार पे अतिथि आये होंगे.. सहेलियों ने सजाया होगा तुम्हे!...
..फिर नहीं आया दूल्हा... न आवाज़ आयीं घोड़े की टापों की...  फिर खबर आई कि भाग गया है दूल्हा.. लापता हो गया!!  तो तेरे तो सारे सपने धुल धूसरित हो गए होंगे... अहंकार को चोट लगी होगी!!!! बहुत दर्द हुआ होगा.. है न..?. लेकिन.....??
... लेकिन....दर्द से ही कोई जागता है.. पीड़ा चुनौती बनती  है!!

इसे एक अवसर समझो एक नयी यात्रा का... एक नए  सृजन का ... !!!

कसम लो कि हो गयी बात! एक खेल से छुटकारा मिला! समय रहते तुम बच गए...

नाचो क्यूंकि वह समय लापता हो गया है.. बाद में ऐसे व्यक्ति के साथ रहने में पछतावा ही होता...!!
मत लेना सांत्वना किसी की... सांत्वना लेना और देना...सिर्फ मरहम पट्टी है.... भरोसा रखो सर्जरी में..!!!!

Wednesday, December 7, 2011

इधर ख़ामोशी, उधर ख़ामोशी, गुफ्तगू फिर भी हो रही  है,
वो सुन रहे हैं ब-चश्म-ए खंदा, बचश्मे- नम हम सुना रहे हैं!
जो मुस्कराहट से उनकी उठती है नगमाए बेखुदी कि मौजें,
वही तो बनते हैं शेर मेरे जिन्हें वो खुद गुनगुना रहे हैं!!!!!

Tuesday, December 6, 2011

वही तो है आशकी सरुरे निशाते रहती हो जिसमे हरदम
हो गम का अहसास जिसमे पैदा, वह आशकी आशकी नहीं है...!!

वही तो है बंदगी फक़त जो तेरी खुशी के  लिए अदा हो...
तलब कि जिसमे हो लाग कुछ भी वो बंदगी बंदगी नहीं है....!!!

Wednesday, November 30, 2011

बख्शी है मुसलसल एक तड़प तो इतना एहसां और करो,
हम पर भी नज़र वो जाये, जो दोनों जहाँ गरमाती है...!!
ये हार हमारी हार है वो...
जो तेरी जीत को भी शरमाती है ...!!!!

Tuesday, November 29, 2011

मेरे भक्त वत्सल गोपाल !!
क्या तुमने समझा है इस 'वात्सल्य' को? जाना है अर्थ इसका? हाँ ये ऐसा प्रेम है जैसा माँ का छोटे बच्चे से. बच्चे में कोई योग्यता नहीं है.. न वो तुम्हे कुछ कमा के दे रहा है.. न यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडल है उसके पास! पर माँ उस से अथाह प्रेम करती है... ये प्रेम किसी योग्यता के कारण नहीं है! बच्चा तो अपात्र , अबोध, असहाय है. उस से कुछ उत्तर भी तो नहीं मिलता! इसलिए इस प्रेम में सौदा ही नहीं सिर्फ देना है.. एक बेशर्त दान... वो तो धन्यवाद भी नहीं कहता....!!
और जब मैं कहती हूँ "हरि मोरे जीवन प्राण अधार, और आसरो नहीं तुम बिन, तीनो लोक मझार".. तो ये कह रही हूँ तुमसे कि मैं अपात्र हूँ; असहाय हूँ; कोई योग्यता भी नहीं ;प्रत्युत्तर में देने को मेरे पास तो कुछ भी नहीं है उसी बच्चे कि भांति... फिर भी.... हाँ फिर भी तुम देते हो!!!
जय श्री कृष्ण...!

Friday, November 25, 2011

तुम जानते हो......? तुम्हारा स्वर मेरे स्वर से मिल गया है. तुम्हारे बावजूद तुम समस्वर हो आते हो मेरे साथ.. कभी कभार....!! हो सकता है कभी कभार.... क्यूंकि ये मिलन तभी सम्भव है जब तुम स्वयं को भूलते हो... और उस क्षण तुम पाते हो कि तुम्हारा स्थान खाली है... भले ही क्षणिक हो ये पर तुमने सत्य देख लिया है... जैसे बांस कि खोखली बांसुरी और उसके भीतर से बह रहे संगीत का चमत्कार देख लिया है...! 
ये आकाश कि भांति एक एहसास है समस्वर होने के बाद भी लगता है वह नहीं है.. तुम भयभीत होते हो घबराते हो.. होता है ऐसा...!!! 

एक बात और.. अब मेरी उपस्थिति भी अनुपस्थित हो रही है..मैं हूँ भी नहीं भी...!!!
तुम जितने सजग हो रहे हो.. समर्थ हो रहे हो.. सफल हो रहे हो.. मैं शुन्य हो रही!!
बस एक स्वाद एक आभास हूँ.....!!

Thursday, November 10, 2011

ज़िन्दगी तेरी इबादत के तरफदार रहे
लाजिमी था कि मेरी राह दुश्वार रहे.

रो सके आप से लिपट कर न गले मिल पाए
ऐसे तलवार सा खिच जाना तो बेकार रहे.

अब मेरे शहर कि रस्मो का तकाजा है ये
दिल हो नाशाद पर मुस्कान असरदार रहे.

बस इसी जुर्म पे छीनी गयीं मेरी नींदें,
क्यूँ अंधेरों में मेरे ख्वाब चमकदार रहे.

है तेरी याद कि पुरवाई मयस्सर मुझको,
और होंगे जो  बहारों के तलबगार रहे.

Saturday, November 5, 2011

सारे जहाँ को रौशन कर सकते थे जिस शमां से हम..
झुलसा दिया गुलशन को , और खुद भी झुलस गए...!!!!
मुस्कान के इरादे अश्कों में ढल गए
आये बहार बन के खिज़ा बन के ढल गए.

हकीकत न जान पाए गम और खुशी कि हम,
थे गुल गले लगाये काँटों में छल गए.

डूबे कभी यादों में खोये कभी ख्वाबों में,

दो कलों में आज के बर्बाद पल गए.

नज़रें तो टिकीं हुईं थी चाँद और तारों पे,
खुद अपनी आँगन के ज़मीन पे फिसल गए.

दूर दूर तक खोजा करती हैं जिन्हें निगाहें
अफ़सोस बहुत पास से मेरे वो निकल गए.

मालूम न चल सका कब मौत आ गयी,
यूँ हौले हौले हाथों से बरसों नकल गए.

Wednesday, November 2, 2011



‎"क़त्ल" करके आये हो
और कहते हो तरन्नुम चाहिए
चलो.... बने रहो गरम तार बदमिजाज.. झाड झंखार
खेलते रहो -
मेरे कदमो से.. मेरी आहटों से..
मेरी कृतियों से , मेरी कनपटियों से...
समाई है मुझमे तेरी भी पत्नी.. तेरी माँ... तेरी बहन भी...
पर कभी न कभी.."सामा- चकेवा" खेलती औरतें..
रौन्देंगी तुम्हे..
उन ढेलों कि तरह...
फिर करवट लूंगी मैं...
गवाही मांगूंगी..
तेरी लाश से... तेरी कुकृति की !!!!