Sunday, July 8, 2012

आओ बच्चों, रश्मि दीदी फिर आ गयीं आपके लिए कुछ लेकर.....

"सोन चिरैया चूं-चूं-चूं...
मोती पिल्ला कुं-कुं-कुं...
सोनू तोता रटता है,
बन्दर खों-खों करता है .
बिल्ली बोलो म्याऊ-म्यायुं ,
ढूध पिलाओ तो मैं आऊ,
मेढक बोला टर्र-टर्र-टर्र,
नहीं किसी से मुझको डर.....!"

तो बच्चों, नहीं किसी से-
.
.
"मुझको डर............"

'ओ.के., शाबाश!'
बच्चे मन के सच्चे'.......... कभी पढ़ना बच्चों के चेहरे, उनकी मासूमियत... कितनी तरलता होती है उनके चेहरे में एक लिक्विडिटी...! हवा के झोंके के समान बदलता चेहरा...मासूमों के चेहरे कठोर नहीं होते... कठोर चेहरे मुर्दों के होते हैं.. जिंदा के नहीं.. या फिर पत्थर दिलों के... जिनके लिए सब फिक्स्ड हो गया है...तो चेहरा पथरीला हो गया...! मैं नहीं कहती कि चेहरे मत बदलो.. बदलो, खूब बदलो.. बच्चों के सामान लिक्विडिटी आने दो...पर, चेहरे को पत्थर ना बनने दो... असली चेहरे को रखो सामने...असली चेहरे में तरलता होगी , जो चांदनी रात में कुछ और होगा.. अँधेरी रात में कुछ और.. सुख में कुछ और दुःख में कुछ और...यही संवेदनशीलता है...! इर्ष्य राग- द्वेष रखनेवाले व्यक्ति संवेदनशील नहीं होते...!
"ह्म्म्म..... जिंदगी में एक परिवर्तन ही ऐसी चीज़ है जो परिवर्तित नहीं होती...!"

बच्चों आज एक क्लासिकल गाना सुनो.. शायेद हमने.. आपने.. हमारे माँ.. बाप ने भी इसे सुना हो..... बिलकुल बिहारी छाप लिए.... :)

"अटकन बटकन, दही -चटाकन
बार फूले बरेला फूले..
सावन मास करेला फूले.
जा बेटी गंगा
गंगा से कसैली ला
कच्चे कच्चे नेउर के, दे पक्के पक्के तू खा...."

(नेउर= नेवला)
:)

Thursday, July 5, 2012


(अब लौटने का कोई रास्ता ना रहा..
........जीवन... /भूलभुलैया../ चक्रव्यूह..........!)

ना कनीज़ रास्ता दिखा रही थी कोई
ना कोई ख्वाजासरा बिछा रहा था कालीन
ना दरवाज़े खुल रहे थे अपने आप
ना मुस्कुराते बंदे खड़े थे सर झुकाए....

काठ के घोड़े पर चढ के उड़ तो रहा था वह
बादलों पर...
पर.. नीचे उतरने की कला भूल गया .
और 'खुल जा सिम सिम 'का मंत्र भी भूल गया वह
......अचानक!!!!!!

"चक्रव्यूह की बात सुनते सुनते
तुम बीच में क्यूँ सो गयीं थीं सुभद्रा?"

Tuesday, July 3, 2012

मैं लौट रही थी...
अपनी सधी हुई लडखडाहटों  के  साथ...
चुप- चाप, निशब्द ..!
खंदकों को पार करती हुई 
ऊँचे नीचे पत्थरों के ढोकों पे पांव रखती हुई ..
न हर्ष न विषाद न शोक न क्रोध...!
कुछ वैसे ही जैसे..
शिव लौट रहे थे सती का शव काँधे पे डाले.
मेरे कंधे पर भी इक लाश थी...
हाँ ....ये मेरी ही लाश थी!!!

Friday, June 29, 2012

वो आज भी बैठी थी अपनी उलझी लटें बिखराए
गोद में नन्हे को बिठाये ,खोयी हुई..
घर-बार दरोबाम से उकताई हुई...
देख मुझे चौंक पड़ी....
आ.. अ.. आप...?
किसलिए आये हैं....?
क .. कैसे मुझे ढूँढा..?
ज .. जाइए जाइये...
आते होंगे वो ऑफिस से...
अजनबी को देख घबराएंगे 
जाने क्या सोचेंगे... मुझपे झुंझलाएंगे !

मैं चकित..
कुछ विस्मित...
अपना सर झुकाए हुए
सोचा , मैं तो बस अतीत का साया..
रुका झिझका कुछ सकुचाया..कि
वक्त ने सवाल पूछ ही लिया
-क्या तेरे शौक की वाराफ्ता मिजाजी है वही.. पहले सी..?
..............
..........
वक्त दम साधे देख रहा था मुझे कि,
रिसते छालों को एक बार और देखा मैंने...
मुस्कुराया...
और खुद को धकियाते हुए कहा...
'चल, आगे बढ़...'
!!!!

Thursday, June 28, 2012


इनायत , कि तुमने दर्दे दिल दिया है
तुम्ही को देते जायेंगे दुआएं...
भूल जातें है हर इक शै दुनिया की
बता, कि तेरी मुहब्बत कैसे भुलाएं....?


(उफ्फ्फ.. राह भी देखती रही थी आने का.. हज़ार शिकायतें लिए.. कि इस बार आओ तो ये कहूँ .. ये कहूँ.. वो कहूँ और वो कहूँ...! कितना रुलाया.. कितना सताया.. कितना जलाया... सोचा कि आओगे तो बोलूंगी भी नहीं..... !
तुम आ भी गए.. और मैं नाचने लगी.. भूल गयी सारी बातें.. शिकायतें... जो हुआ सो हुआ.. क्या छेड़ूँ उन बातों को इस मंगल घडी में....नाचने गाने कि घडी में...! रौशनी ज़रा सी मिली तुम्हारी मन रौशन हो गया....

.."होता है ऐसा..")

मुझे लौटा दो मेरा वो चेहरा खोया हुआ....
होठ रख मैं उन होंठों पे सो जाउंगी
जिनको चूमे हुए बरसो बीत गए!
रूह में सुर्खिये- लब घुल के उतर जायेगी
सुबह अनफास के निकहत में बस जायेगी
पांव उठेंगे उसी शहर की जानिब 
कि जहाँ मेरे दिल ने धडकना सीखा था...!
लौटा दो,
इसके पहले कि मिले वक्त को हुक्मे-रफ़्तार...
लौटा दो वो मेरा चेहरा खोया हुआ .....!

Wednesday, June 27, 2012

नहीं निकालती मैं चलते हुए तलवों से कांटे चुन चुन कर
.....मंज़ूर नहीं चलना अब यूँ बचकर, झुककर , रूककर...!

खाओगे जिस दिन सूखी  रोटी ही परिश्रम कर - थककर
तृप्ति देने आउंगी मैं ,बन तेरे लोटे का ठंडा जल....!

Saturday, June 2, 2012

आप जानते हैं भगवन शिव और विष्णु के पुत्र को? चौंक गए ना? हाँ हम भी ऐसे ही चौंके थे जब ये सुना ... बात ये है कि विष्णु ने जब मोहिनी का रूप धरा था तो शिव जी ने इनका वरण किया.. इनकी एक संतान भी हुई "अयप्पा स्वामी".. इन्हें हम हरी-हर पुत्र भी कहते हैं...!
हाँ... सिर्फ कुंती ने ही अपनी संतान कर्ण को प्रवाहित नहीं किया था... इन्होने भी( शिव जी- विष्णु जी) अपनी संतान अयप्पा को नदी में प्रवाहित कर दिया... ! राजशेखर नामक राजा को ये संतान मिली... जिनका पालनपोषण अपने पुत्र की तरह किया.. बाद में इनकी भी एक संतान हुई थी...! जब राजशेखर को अयप्पा मिले थे तब इनके गले में दिव्य मणि थी जिनकी वजह से इनका एक नाम "मणि-कंटन" भी है...!
शास्त्र- शस्त्र में पारंगत अयप्पा अपनी माता को प्रिये ना थे... राजतिलक के समय रानी ने इनके कठिन काम यानी शेरनी का दूध लाने हेतु वन में भेज दिया ताकि इनके पुत्र को राज मिले... (अकेली कैकेयी ही ना थीं ऐसी....) जहाँ उन्होंने महिषासुर कि बहन महिषी का वध किया और शिव कृपा से शेरनी का दुग्ध ला सौंप दिया.. छल की बात पता चलने से महल छोड़ वन में चले गए...!
राजशेखर के बुलाने पर भी वापिस ना आये... और स्वर्ग कि और रुख किया...
उनके नाम एक मंदिर का निर्माण हुआ केरेला के सबरीमाल में . जहाँ मूर्ती कि स्थापना स्वयं परशुराम ने किया.. सबरीमाल आज दक्षिण के प्रसिद्द तीर्थों में है...!
इन सब बातों में मज़े कि बात.. हम प्राय: अयप्पा स्वामी के मंदिर में जाते रहे हैं पिछले पांच वर्षों से.. और स्टोरी आज पता चली.. कि अयप्पा स्वामी कौन थे...!
बस मांगने को अपने हाथ फैलाते रहे
सिर्फ अपनों की खैरियत ही मनाते रहे
भरती गयीं जेबें, रीतते गए मन..!
फिर दुश्मन फायेदा उठाएगा
हमारी गनों का रेंज आधा रह जायेगा
हमारे जहाज पृथ्वी से उठने में देर लगाएंगे
हम पूरी ताकत से फिर कैसे लड़ पाएंगे?
जब शंखनाद होगा 'उस युद्ध 'का.......!

Friday, June 1, 2012


केशव,
तुम तो सारथी हो सदा के
और रहोगे भी
किन्तु सखा.!
ये नहीं भूलना .
मेरे लिए एक ही महाभारत बहुत हुआ...
अगली पारी में कोई और पार्थ लाना...!!

Thursday, May 31, 2012

हटवाओ जल्दी मेज से ये प्याले ये शराब...
आते ही होंगे इक बुज़ुर्ग कुछ पुराने ख़याल के...!

गालियां

एक सम्मानित नागरिक अधिकारों का जायज पात्र होता है. स्त्री भी उसी श्रेणी में है.फिर भी मन में कुछ तीखे तीखे सवाल रह जाते हैं कि इतनी योग्यता क्षमता गुण और कार्यकुशलता के बावजूद सिर्फ दो शब्दों में उसकी औकात बता दी जाती है...क्या आप जानते हैं ऐसा कौन से अमोघ अस्त्र है और शब्द सम्पदा में तेज नेजे कैसे उभरते हैं?
जाने किस सज्जन ने संबोधन की सहज भाषा गढ़ी है जो नाराज़गी अपमान और निंदा को व्यक्त करती है... आसान भाषा में हम इसे "गाली" कहेंगे...!
कितना कौशल है कि मर्द एक दूसरे को गालियाँ देते हैं और माँ-बहनों का शरीर क्षत विक्षत होता है...! यहाँ पर भी पुरुष अपनी कुंठा निकालने के लिए सिर्फ स्त्री देह का सहारा लेता है...! मर्दानी आदतें हैं भाई....!
वही मा -बहने एक और पूज्य कही जाती हैं तो दूसरे वार्तालाप में चीथड़े होते हैं उनके..!
क्या चाल है मर्दों के भी.. भई मर्द ही लड़ेंगे और अपमानित करने के लिए एक अभद्र और अश्लील गाली देंगे दूजे को.. जिनमे धूल चाटती एक स्त्री दिखेगी..!
एक तरह का शाब्दिक बलात्कार....!
जिस तरह दलितों के जातिगत शब्दों पर धाराएँ लगायीं गयीं है... गालियों के लिए क्यूँ नहीं?
क्या ये स्त्रियों की गुलामी का रूप नहीं...?क्या गालियों के कोई दंड विधान है...?

"... भाई साहब अबकी बार सोच के गालियों के लिए मुह खोलना....! नयी गालियों के इजाद करो वरना हम उपलब्ध कराते हैं "एक नया शब्दकोष"!!

"आपके शहर की तालीम अब कहाँ तक पहुंचीं...
गालियाँ भी बनायीं तो औरतों के जिस्म तक ही पहुंचीं..."
आज फिर महकी हुई रात में जलना होगा,
आज फिर सीने में उलझी हुई साँसे होंगी !
आज फिर जागते गुजरेगी रात ख्वाबों में तेरे,
आज फिर चाँद की पेशानी से उठेगा धुआं...!!
कहने को हम गुप्त, मगर जग जाहिर हैं...
घावों को शब्दों से भरने में माहिर हैं...!
हमारा इशारा भी कुछ ऐसा रुख रखता है..
ये भी हो सकता हैं, वो भी हो सकता है..!
खासियत अपनी शब्दों की हेराफेरी....
जी हाँ चित्त भी मेरी ... हाँ पट भी मेरी...!
साहेब जी,
आप तो बिना शहीद हुए मज़े ले हैं..!
अब दुम दबाकर वही करिये जो दूसरे 
मुर्गाने-चमन कर रहे हैं...
यानी कि.......
शाखो में बस इधर -उधर.
ख़ामोशी से पर समेटे बैठे रहिये...
कमर कस के तलवार भांजने के दिन 
अब लद गए आपके...!

Tuesday, May 22, 2012

कोई तो रात में छिपा ही होगा इस फुलवारी में...
और अपनी अत्याधिक सुगन्धित
और रगीन डिबियों में से
कुछ उडेला होगा फूलों पर...!
फिर पुलकित हुईं होंगी इन पंखुड़ियों की आत्माएं...!!
.. या फिर एक सुन्दर स्वप्न...
फिसलकर गिरा होगा निद्रा की गोद से....!

भय लगता है अब...कि,
गिरे गुए पुष्पों को भी चुनकर
आराध्य के चरणों में अर्पण करते हुए...
कि, जीवन तो दिखाई भी नहीं देता इन फूलों में....!

चटकना, खिलना, सुवासित होना, गिरना.....
और जीवन का अदृश्य होना...
यहीं नियम हैं प्रकृति के...!

हमारे नियम तो बदले भी जा सकते हैं
पर बदलेंगे नहीं प्रकृत्ति के नियम...
वे अजेय हैं....!!!

Monday, May 21, 2012


एक प्रतीक्षा ..
पांच द्वार..!
 'एक द्वार प्रकाश बिखेरने को..
एक नाद तरंग उठाने को...
एक स्पर्श-हर्ष  बरसाने को
एक गंध..
और एक स्वाद हेतु....
स्वागत में...'

पंच-द्वार खुले हैं पूरे...
श्रेष्ट पर्यक में झुलाने को...!
अंतरंग में इस भांति रंग रचाने को..
कि वह आएगा...!

प्रतीक्षा ..मेरी, तुम्हारी  या द्वार की ...?
कण-कण खोले खड़ी हूँ...
कि वह आएगा...
वह आएगा...!
क्या वह आएगा..

Friday, May 18, 2012


हाँ.. हाँ... कुफ्ले-अबजद की तरह ही बंद हैं हम...
... ज़रा नाम लो अपना, ये  दिल खुल जायेगा.....!


(कुफ्ले अबजद = वो ताला जो अक्षरों के मेल से खुलता है)

Wednesday, May 16, 2012

.... किन्तु जब अन्यायी सजा से बच जाता है,
तो वह घूम घूम कर तुम्हारी सत्ता को 
स्थापित करता है.....!
... और निर्दोष तुम्हारे नाम पर कभी...
तुम्हे ही पुकारते फांसी चढ जाता है...
.....तुम जो आते नहीं...!
हाँ, मरने वाले से तुम्हे क्या मिलेगा,
....जिंदा रहनेवाला, तुम्हारा नाम जो चलाता है...!!!!

Tuesday, May 8, 2012

".................मज़ा आया खूब ये सुनकर, कि
तेरी ही महफ़िल में कोई मेरा नाम लेता रहा...."
अरे! जाओ भी, क्या -क्या सुनाएँ तुम्हें...
ज़बां थक जाती है और, बातें रह जाती हैं....!
कल तो रो ही पड़े थे मरीज़-ए-गम का हाल सुनकर
.............तरस खाकर दुआ दे रहे हो आज शायद.....!

Thursday, May 3, 2012

हमे नहीं पता, ना एहसास खुद के हालात का
बस सुना किसी से है कि बहुत परेशान हैं हम.....!

Saturday, April 28, 2012


वो कहता है, "खफ़ा हो के हँसते हो?"
वो चाहता है, 'नाराज़ हूँ तो नाराज़ लगूं ...!'
.
.
.
...... "अजीब है.......!!!"

Friday, April 27, 2012


तुम लगाते सिर्फ चक्कर ही ...
हम मनाज़िर से दिल लगाते हैं...!
तुम्हारी नज़र सिर्फ लहरों पर होती है....
हम समंदर में डूब जाते हैं..!
तुम आते हो घर लौट के, बस हवा खा के ज़माने की....
हम ज़ख्म खा के भी देखो कैसे ठहाके लगाते हैं......!

Thursday, April 19, 2012

मेरी बेखुदी ने बचाया मुझे गुमराह होने से...
और लगजिशों ने मेरी, हर क़दम तुझ तक पहुँचाया मौला......!!!

(बेखुदी= बेहोशी, लगजिश = लडखडाहट)

Tuesday, April 17, 2012


बचा ले बकाए हयाते-खिरद से, और बेखुद बना...
बस यही आरजू, तेरे क़दमों में दे दूँ अब जां मेरे मौला

Monday, April 16, 2012

सोचूं, पी ही लूँ अब समंदर सारा..
मेरी तिश्नगी तू इतनी ही बढ़ा दे मौला...!

Friday, April 13, 2012


देखो उन्हें जो, जिगर के ज़ख्मो को सी रहे..
और उन्हें भी, जो खूने दिल हैं पी रहे...!
तुम तो रोते हो मरनेवालों पर..
हम रोये उन्हें देख, जो ऐसे जी रहे....!!

तू चाहे तो कर सकता है कत-ए-तअल्लुकात कभी भी...
.......मैं न रहूँ तो जिंदगी में तेरे कोई बखेडा ही न रहे.....!

Thursday, April 12, 2012

छोटी सी पुतली के पट पर, किस किस का प्रतिबिम्ब उतारूँ 
भीड़ खड़ी है सन्मुख मेरे, किसे छोड दूँ किसे पुकारूं...!

Tuesday, April 10, 2012

है हिम्मत! तो ये दो चीज़ें ले , तभी मुझसे मिल...
इक फूटी हुई तकदीर, और एक टूटा हुआ दिल......!

चीथड़े किये ख्वाब  के कल , फटेहाल किया ये  दिल...
हो गया आज शीशा ज़ालिम, इस दिल को आकर अब सिल..........!

Thursday, April 5, 2012

सखियों, आज ज़रा पुरुषों को याद करिए.. अपने दादा-नाना, पिता, पति भाइयों बेटों को, गुरुजनों के चेहरे, मित्रों के.... पड़ोसियों और राहगीरों के..... खोमचे वालों के मजदूरों  के.... संघर्षों  में जूझते लोगों के....!
हारते लोगों के जीतते लोगों के.....!
नहीं लगे न सारे चेहरे क्रूर.... कुछ तो छल कपट से परे... निष्पाप से लगे होंगे न... ?
ये बुरे तभी लगते हैं जब आपकी छाती पे खड़े होते... छलते हैं.... इज्ज़त लूटते  हैं... धोखा देते हैं... पर सब तो ऐसे नहीं न...? गौर करिए उन पर भी... जो तिल तिल मर रहे हैं ... घुट रहे हैं.. विपरीत हालत से जूझ रहे हैं...और हर माँ- बेटी- बहन को सम्मान देते  हैं..!
कभी देखिये पुरुषों से छ ली महिलाओं को कितनी महिलाए सहारा देतीं हैं? या की उन्हें मिलता है तिरस्कार?
ये संवेदनहीनता है..... स्त्रियों की भरमार के बावजूद स्त्री आगे बढ़ के हाथ  नहीं थामती, अकेली रह जाती हैं..(प्राय:)!
पुरूषों की कविताओं में वर्णन  नख से शिख तक आपके सौंदर्य का मिलेगा, हमारी कविताओं में उनके भेड़िये और जानवर होने के सन्देश मिलेंगे...!(है न?)

'स्त्री ही स्त्री की पीड़ा समझती है'... बचपन में सुना था....' आज नहीं मानती मैं....!'
'स्त्री-स्त्री की दुश्मन होती है'.. जब भी सुना करती थी विरोध करती थी, चीखती थी और भाषण दे डालती थी.." आज चुप हूँ!"
(जानती हूँ ऐसा कह स्त्रियों से बैर मोलना है)
:
:
:
तो आज आप मूल्यांकन करिए अन्य स्त्री के साथ अपना व्यवहार.... मन झूट न बोलेगा!

"अनुपम कृति है इश्वर की स्त्री... मानती तो हैं न... तो बस अब ज़हर न निकालिए .. उसे अमृत करिए, इतनी शक्ति है आपमें, जानती तो हैं न..!!!"

Wednesday, April 4, 2012

गिरा होता तो उठा भी लेते
मगर वो शख्स नज़रों से उतर गया....!
उसके जाने का नहीं,
गम तो इस बात है कि 
वो गया तो सारा शहर गया!
रूह मिलती है उसकी हर मोड पर ..
जो तलाश में जिया , तलाश में मर गया...!
कल फिर जनाजा उठेगा बस्ती से,
अभी कोई ले के ज़हर गया...!!

Tuesday, April 3, 2012

एक बार राधा जी ने बहुत सारे तोते पाले और उन्हें 'हरे कृष्ण- हरे कृष्ण' जपना सिखाया ...!अब दिनभर तोते हरे कृष्ण कहते.. सखियाँ भी वही कहतीं.. स्वयं राधिका  भी कृष्ण कृष्ण ही जपती..पूरा ब्रज कृष्णमय हो गया..!
.. सांझ के वक़्त राधा रानी नदी  किनारे कृष्ण की प्रतीक्षा में  सखियों के साथ विचर रही थीं.... साथ में प्रिये सखी मणिमंजरी जी भी थीं...!
श्यामसुंदर जी मंद गति से चले आ रहे हैं.. कुछ मलिन मुख लिए.. कुछ ढूंढते हुए से..! राधिके दौड़  पड़ीं... इतने में नारद जी कृष्ण के समक्ष दिखे... राधा वृक्ष की ओट से उनकी बात सुनने लगी...!
नारद जी कहा,"प्रभु, पूरे ब्रज में सिर्फ कृष्ण ही सुनाई देता है... यहाँ तक कि आपस में सारे सखा सारी सखियाँ भी कृष्ण ही संबोधित करते हैं... !"
हरि बोले "......... परन्तु, मुझे तो सिर्फ 'राधा' नाम ही प्रिये है...!"
इतना सुनते हैं राधा के नयन बरसने लगे.. दौड़ के महल में आकर उन्होंने तोतों को  "राधे -राधे "जपना सिखाया.. और समस्त सखियों को भी यही हिदायत  दी...

मणिमंजरी ने कहा, "ये क्या राधिके? तुम्हे लोग तो अभिमानी कह रहे हैं...तुम पर आरोप लगा रहे है... क्या तुम अपने नाम की जय बुलवाना चाहतीहो?"
श्री जी ने कहा" मेरे प्रियतम को यही नाम पसंद है... लोग यही नाम लेंगे.. अब चाहे जो आरोप दो, जो इलज़ाम दो.. कुछ भी कहो सखी...!!!"

(इलज़ाम लगाने वालों ने इलजाम लगाये खूब मगर
तेरी सौगात समझ कर के हम सर उठाये जाते हैं..!)

Monday, April 2, 2012

एक कली मांगी थी तुमसे....

मैंने कहा.. "कृष्ण ने मुझे एक पुष्प दिया था कल.."
वह बोली," बस इक पुष्प? मुझे अपना हार दे दिया उतार के."

और प्रतिस्पर्धा शुरू हो गयी......!! गोपनीय रहा न कुछ!! एक बात .....
"जैसे हम अपना धन छुपा के रखते हैं उसी प्रकार .. अपनी साधना.. अपनीभक्ति अपना प्रेम छुपाना चाहिए... बस मैं जानूं.. तुम जानो...."!

"प्रकट करने से... बस अहंकार और राग-द्वेष का पोषण ही किया..." यदि वो बखान ही कर रही थी तो मुझे धैर्य धारण कर , उसके सौभाग्य की प्रशंसा कर.. प्रणाम ही करना चाहिए था...!

"और उन्हें सार्वजनिक नहीं करना चाहिए था..."!!!!

Friday, March 30, 2012

ताजगी तो वही है जो दौड़े मौजे-निशां बन रगों में तुम्हारे..
.....सिर्फ आरजो-लब को रंगे वो ताजगी, ताजगी कहाँ......!

हो वही रौशनी भी जिस से हो दिलो- दिमागे बेशर दरकशा..
सिर्फ दरों दीवार ही रौशन हो, वो रौशनी, रौशनी कहाँ....!

...और जिंदगी भी वही जिसमे हो जिंदाबाद इश्क तेरा.....
जहाँ तेरी नामौजूदगी का खौफ, वो जिंदगी, जिंदगी कहाँ.....!!!
रश्मि मिश्रा के अनमोल वचन.....!
"दोस्तों , किसी लड़के /लड़की को प्रपोज करना है तो इस रविवार का समय उत्तम है... वो क्या है कि इस दिन मूर्ख दिवस कहते हैं .. यानि कि 'फूल डे'...(१ अप्रैल)!!
तो इस दिन अगर आप प्रस्ताव रखते हैं तो सेफ हैं! वो ऐसे कि अगर एक्सेप्ट कर लिए जाते हैं तो बढ़िया.. नहीं तो कह दीजियेगा कि ,'यूँ ही मजाक कर रहा था /रही थी .. आप तो बुरा मान गए .. तारीख क्या है आज?' 
जनाब देर न करियेगा इस दिन जूते/सैंडिल न पड़ेंगे पक्का..! काम बना तो ठीक वरना भाई/बहन बना लीजियेगा! चलता है यार"!!!!

Monday, March 26, 2012

"इक हम हैं जो बैठे ही हैं मुसीबतें झेलने को...
और जो तुम हो कि , बैठे हो सिर्फ आफतें ढाने को...!!" 

Saturday, March 24, 2012

एक आदमी किसी अपरिचित नगर में पहुँचता है.. जहाँ की न तो भाषा आती है उसे, न चाल चलन की जानकारी..! भूखे प्यासे भटकते हुए एक  महल के द्वार पे पहुचता है.. जहाँ संभवत: कोई भोज चल रहा है सोच दाखिल होता है... सभी बैठें है भोजन पर सो उसने भी बैठ के तरह तरह के पकवान खाए... वो एक होटल था.. !खाने के बाद जब बैरा बिल ले के आया तो उसने सोचा कि शायेद इस महल के राजा ने धन्यवाद पत्र भिजवाया है.. बिल को जेब में रख वह प्रत्युत्तर में झुक झुक के आभार प्रकट करता है कि 'मुझ जैसे अजनबी का सम्राट ने इतना स्वागत किया.. अपने देश जा के खूब प्रशंसा करुंगा ..!' बैरा कुछ न समझा तो उसे पकड़ के मैनेजर के पास ले गया... आदमी और प्रसन्न कि लगता है प्रतिनिधि मेरे धन्यवाद से  खुश हो  बड़े अधिकारी के पास ले आया. खूब खरी खोटी सुनने के बाद भी वह धन्यवाद दिये जा रहा है.
अब उसे अदालत में ला खड़ा किया गया तो उसकी खुशी  और बढ  गयी उसने सोचा कि अब वह सम्राट के पास आया गया है.. और वहाँ भी उसने देश कि प्रशंसा  में कसीदे काढे... कि वह अभिभूत है यहाँ आ के.. उसकी खुशी का ठिकाना नहीं...!  जज ने इसे चालबाज ठहरा के गधे पर उल्टा बिठा नगर घूमाने का आदेश दिया...!
साथ में एक  तकथी भी लटका दी गयी कि"ये आदमी चालबाज़ है...जिसके सामने से ये गुज़रे इसे भरपूर गालियाँ दो"..
अब तो उस आदमी के पैर न थे ज़मीन पर उसे लगा कि उसकी शोभा यात्रा निकाली जा रही है एवं लोग इसकी प्रशंसा में गीत गा रहे हैं..! वह गदगद सपने बुनने में  व्यस्त कि देश जाके अपनी कहानी सुनाएगा.. अगर कोई देखनेवाला भी रहता तो बड़ा मज़ा आता...!
अचानक उसके देश का एक परिचित दीखता है वह चिल्लाता है." देख! मेरा कितना स्वागत हो रहा है.."
वह आदमी भाग जाता है कि उसे पता है क्या हो रहा है... और ये मूर्ख यही कहता है..."उफ्फ्फ कैसे मुझसे जल के भागा वह अभागा.."!!!

(अहंकार में डूबे लोग ऐसे ही भ्रांतियों  के शिकार होते हैं. जिनका न जीवन के तथ्य से सम्बन्ध है न जीवन की भाषा मालूम... कोई ताल मेल नहीं जीने और जिंदा रहने का ....!)

Tuesday, March 20, 2012

आज देखना एक दिये को ध्यान से... देखना उसकी लौ..उसकी रौशनी,.. उसकी बाती, उसका तेल.... और उसकी जलन!!!!!!
देखना कैसे बाती.. तेल को जलाती है... सारे तेल को जला खुद जल जाती है...! बाती को लपट जलाती है.. और भभक के  अंत में बुझ जाती है... सारी  आग सारी जलन खतम... खेल खतम!!!

ह्म्म्म.....!!!
 पहली बात:  ये तर्क को दिखा रही है.. तर्क के कैसे इनकार होते हैं.. एक पर एक चीज़ इनकार  भरी.. 'ये नहीं..ये भी नहीं.. ये भी नहीं.. वो भी नहीं...' अंतत: सारे इनकार के बाद तर्क खुद मर जाता है.. अब कुछ नहीं इनकार को!!

दूसरी बात:  विश्वास को दिखाती है..!! यहाँ स्वीकारोक्ति सी दिखती है...विश्वास कि स्वीकृति .. ' ये सही.. हाँ, ये भी सही... ये भी और वो भी...'  सब स्वीकार है..! अब विश्वास की भी ज़रूरत नहीं...!

अब सोचिये जहाँ तर्क और विश्वास दोनों गिर गए तब क्या बचा?????
.
.
.
.क्या यहाँ प्रेम है?????

Saturday, March 17, 2012

देखो तनिक न दुखइयो मोरी कलईया
श्याम तनिक न दुखइयो , मोरी कलईया  रे...
सुघड़ गोरी मोरी बहियाँ...!

सब सखियाँ मिलि घेर के बैठीं
बीच भये बनवारी....
आपन  आपन देत कलाइयाँ
सखियाँ बारी बारी...
हंस हंस बात  करे सबसे
वृंदा-विपिन -बसईया रे...
चित्त ले गया सावरा कृष्ण कन्हैया रे...!

सब में मोरी पहचान कलाई
धरे कन्हाई कस के..
छोटी सी चूड़ी पहनावे
बांह दबावे कस के!
मैं तो रोवन लागी कह के मईया मईया रे...
चित्त ले गया सावरा कृष्ण कन्हैया रे...!
सुघड़ गोरी मोरी बहियाँ... !

टूट के चूड़ी  हाथ  में गड़ गयी..
डरन  लागे बनवारी...
झट से मोरी छोड़ कलईया
भाग गए बनवारी!
इधर मैं भई दीवानी
उधर श्याम  दीवाना ....
मोसे ऐसे बात करन को
ढूढे रोज बहाना...
सब जन प्रेम की तोरी
करन लगे कवितईया रे ..!
जो चित्त ले गयो साँवरा कृष्ण कन्हैया रे...!सुघड़ गोरी मोरी बहियाँ... !

Monday, March 12, 2012

सबकुछ वही तो है पहले जैसा... सिर्फ रूप.. रंग.. ढंग... शैलियाँ बदल गयीं प्रेम की ... ! पर है तो शाश्वत ही.. जैसे आत्मा ने वस्त्र बदले..! जैसे नदी सागर में गयी... सागर किरणों से चढ़ कर मेघ बना...मेघ फिर बरसा नदी में और नदी सागर में!!
एक बूँद भी न खोयी ... जल उतना ही रहा जितना  सदा था ..!
मेरा प्रेम भी वैसा ही  रहा न..! कल तुम्हारे साथ मैं ही तो नाची थी वृन्दावन में ललिता के रूप में ...! मेरी वीणा में राग तो तुम्हारा ही बजा था जब मैं मीरा थी...! याद तो है न...???
"देखो, कृष्ण! प्रेम की न कोई विधि है न विधान"....! 
"तनिक सी दूरी से काहे घबराए जाते हो"...?
"अरे! मैं तो वही हूँ जिसने 'पांच हज़ार साल के फासले' से प्रेम किया था"......!!!!

Friday, March 9, 2012

जिन्होंने न देखी  है सूरत को मेरी
देखेंगे वो आज नंगे  बदन को...!
पति मेरे हारे हैं जुए में बाजी..
महलों की  रानी लुटी जा रही. है..!
खिंच न सका चीर , दुश्शासन जो हारा ..
सभा बीच भगवन है तेरा सहारा......!
साड़ी के धागों में तुम जा छुपे हो...
इसी से ये साड़ी बढ़ी जा रही है.........!!!

Monday, March 5, 2012

न जाने कहाँ तक फैली है तेरे हुस्न की वुसअत ...
....और, न जाने मेरे इश्क की परवाज़ क्या है....!

Friday, March 2, 2012


अजब रंग उनकी अदा के, हम तो बस परेशान रहे,
दिन में दिख रहे जो चाँद से, हर रात वे  आफताब रहे...!

पढ़ा भी बहुत लेकिन उन्हें पढ़ने में नाकाम रहे,
हर पन्ना रोज बदला जिसकी ऐसी वे किताब रहे..!

अब  मुकाम उनको मिल गया, क्यूँ छानते हम ख़ाक रहे,
है जवाब हर सवाल का.. पर वे तो  लाजवाब रहे..!!
जागती रही आँख इधर.. देखते वे ख्वाब रहे...........!!!!!

Thursday, March 1, 2012

चलो अँधेरी रात में सहर ढूंढते हैं..
नदी  की  रेत पर कोई लहर ढूंढते हैं..!

हर तरफ खड़ा है जो  ज़हर का हिमालय,
ज़हर काटने को चलो, ज़हर ढूंढते हैं...!

ओज़ोन का दरकना ठीक नहीं  है शायेद,
बचाने को चलो, कोई डगर ढूंढते हैं...!

क्या खबर होगी  कल के सूरज की ,
आज की खबर में चलो, खबर ढूंढते हैं..!

Sunday, February 19, 2012

जैसे रोज़ नज़र आये वैसे नहीं हैं हम,
जैसे तुमने देखा वैसे भी नहीं हैं हम...!
कुछ तो छिपाया है हमने भी खुद से,
है तुम्हे पता भी कि कैसे हैं हम........?

बहुत गुमां है तुम्हे जो खुद पर..
कभी न कभी तो सोचा भी होगा...!
जो इतने लोग हैं तुम्हारे ठुकराए हुए...
हो जाएँ जो एक तो फिर क्या होगा........?

Thursday, February 16, 2012


न मरने की तमन्ना है अभी, न रही जीने की कोई आस..
................हे राम! ये किस शख्स से उलझा दिया हमे...!!!

Wednesday, February 15, 2012

बस ,इसी अय्याशी में हम दोनों ही जी रहे हैं....
.....तुम हमे खा रहे हो , हम तुम्हे पी रहे हैं.....!!
दिल खोल के आज वो बाँट रहा है 'सबके' प्यालों में शराब...
......मैं साथ रही चल उसके, जाने कब मेरी बारी है....!!!

Thursday, February 9, 2012


तुम्हारा प्रेम, लबालब!
एक मौसमी 'नाले' की तरह...
जो उफनता है बरसात आने पर..!

मेरा प्रेम, इक 'नदी' की  तरह
हर मौसम में एक सा बहाव
एक सी दिशा...!

प्रचंड गर्मियों में जब सूखता है जल पृथ्वी से...
तब मुझमे नदी की लकीर ,
और निश्छल चमकीली रेत ही दिखती है..

और  तुम्हारे भीतर दिखती है गंदगी
और सड़ी हुई मिटटी
वासना की!!

Wednesday, February 8, 2012

अफ़सोस! अब कहाँ से लाऊं मैं वो दिल तेरा...
...जो धडकता था दिन- रात बस मेरे लिए.....!!

Tuesday, February 7, 2012

बचपन में माँ बहुत कहानियां सुनाया करतीं थीं... बहुत सारे कभी कभी तो एक ही कई कई बार...! १० साल पहले एक राजस्थान की लोक कथा सुनाई थी उन्होंने . ठीक ठीक याद नहीं पर कहानी कुछ यूँ थी....
" एक राजा का दिल खूबसूरत सी पनिहारिन पे आ जाता है,जो उस से उम्र में काफी छोटी थी. राजा उसे घर ले आता है. और रानियों कि तुलना में उसका ज्यादा ध्यान रखता है.(ख्याल रहे ,पहले रानियों की 'संख्या'को 'स्टेटस सिम्बल' से जोड़ा जाता था).
फिर भी उसे हमेशा ये डर लगा रहता था कि कहीं ये उसे छोड़ के भाग न जाए..! तो एक मित्र की सलाह से उसने सुनार बुलवा के एक जड़ाऊ भारी सी "झांझ' उसके पैरों में डलवा दी ताकि कहीं भी आने जाने से उसकी आवाज़ कान में पड़ती रहे. पनिहारिन भी खुश कि राजा मुझे इतना प्यार करते हैं कि इतनी कीमती चीज़ मुझ गरीब को दी है... इसलिए चलने में कठिनाई होने पर भी वो कुछ न कहती..!
समय बीतता गया अब राजा को यकीन हो गया कि पनिहारिन उससे बड़ा प्रेम करती है. इतने भारी जेवर से लडखडाती भी है तो उफ़ तक नहीं करती, अब ये उसे छोड़ कर न जायेगी.... सो उसने वापस सुनार को बुलवा के झांझ उतरवा दिया...!!
दूसरे दिन पनिहारिन राजमहल से गायब!! भाग गयी...!!!
... कुछ दिनों बाद एक बांदी ने उसे गांव में देखा अपनी सहेली से वो कह रही थी..." अरी! राजा ने तो बड़ा प्रेम किया मुझसे...इतनी कीमती झांझ जाते ही दी,.... बड़ा भरोसा था.. और एक दिन उसका भरोसा कैसे खत्म हुआ री, कि मेरी पाजेब उतरवा ली??"
"क्या यही प्रेम था सखी?"
"......." ................ कहानी खत्म...!!!!!!

किसी को यकीन हुआ.... किसी का भरोसा टूटा!!!!!!
आपको????

Monday, February 6, 2012

राज़ की बात मैं तुमसे कह रही हूँ
सुन सकोगे? मैं तो कबसे सह रही हूँ...
एक मुक्कमल सी ईमारत दिख रही हूँ..
पर कहीं भीतर ही भीतर ढह रही हूँ..
है हवाओं की ज़मीन, बादल की छत है..
मुद्दतों से जिस मकाँ में रह रही हूँ ...!!
जिस किले में क़ैद हूँ मैं उस किले की
न कोई प्राचीर है, न कोई दर है..!
न कोई पहरा न कोई पहरेदार!
न दिखे  कतरा हुआ, कोई मेरा पर है!
फिर भी पंछी से नन्ही परवाज़ मेरी....
घुट के रह जाती है क्यूँ आवाज़ मेरी...!
है ये कैसी क़ैद कि इस क़ैद में भी..
है नज़रबंदी पर मुझ पर न नज़र है....!!!
बीते वक्त में जा कर जब यादों के धागे उलझते हैं, तब बहुत सी बातें जेहन में उतरती हैं...!
अल्हड मन रिश्तों के फलसफे समझने की कोशिश में है..!!.एक तरफ जीवन मृत्यु के जुड़े मसले.. दूसरी तरफ तुम्हारी यादें..और मेरे ख्वाब!!
रेत की तरह फिसल रही मेरे खवाबों की ताबीर...!! दिल कहता है एक बार जी ही लूँ इन लम्हों को... शायद वक्त मिले न मिले...!
खुदा ने चाहा तो बदल ही देगा मेरी तकदीर!!!!
एक कहानी तो हम सब ने सुनी ही है.. जब कृष्ण ने माटी खायी और यशोदा ने उनका मुख खुलवाया तो मुख में सारा ब्रह्माण्ड.. ग्रह नक्षत्र आदि दिखे. और प्रतिक्रिया में यशोदा मूर्छित हो गिर पड़ीं. मैं क्या प्रतिक्रिया दिखाती.. सोच में हूँ..!
हुआ यूँ कि आज मेरे बेटे ने कुछ खाया.. मैंने उसके होठों पे काली भूरी कोई चीज़ लगी देखी तो पूछा "क्या खा रहा है.. मूह खोल"... थोड़ी देर आनाकानी के बाद उसने मूह खोल कर दिखाया और चिल्लाया ..."आ आ...आ...."गूगल"!!!

दरअसल मूह में थी तो चाकलेट, पर मैं सोच में पड़ गयी कि क्या सचमुच आज "गूगल" पर्याय हो गया है "ब्रह्माण्ड" का?

Friday, January 27, 2012


आज फिर ...

आज फिर मेसेज मिला उसका
ठीक वैसा ही लिखा था उसने...बरसों बाद भी...
"चलो देखते हैं चाँद को हम-तुम
आज फिर उसी तरह, एक साथ!
ऐसे ही तो देखते थे... पहले भी..!
फिर मीलों दूर बैठ के भी तो देख सकते हैं..
एक साथ!"
"तुम मुझे देखना उसकी नज़रों से.. मैं तुम्हे.."

तीन घंटे बालकनी से आसमान निहार.. झुंझलाकर ये भीतर चली आई...
वो रात भर बैठा रहा छत पे
जले अधजले सिगरेट के टुकड़ों
और बुझी हुई तीलियों के साथ...!
न दिखा चाँद दोनों को....
"आज फिर अमावस की रात थी.......!"