Monday, October 19, 2015

दुर्गा के नौ रूप

देवी दुर्गा के नौ रूप… हर दिन एक अलग रूप की पूजा… हर रूप की अपनी एक अलग कहानी। हर रूप प्रेरणादायी… जीवन में ऊर्जा का संचार करने वाला… हर महिला में भी तो मां दुर्गा के विभिन्न रूप विद्यमान हैं। हां, यह जरूर है कि महिलाएं मां दुर्गा के इन रूपों को सही तरह से आत्मसात नहीं कर पाई हैं। अगर महिलाएं मां दुर्गा के इन अलग-अलग रूपों में मौजूद दिव्य गुणों को अपने जीवन में पूरी तरह से उतार लें तो जीवन में बड़ा बदलाव आ सकता है। नवरात्र के मौके पर जानते हैं मां दुर्गा के विभिन्न रूपों में मौजूद गुणों और उनसे मिलने वाली सीख के बारे में।
शैलपुत्री से सीखें दृढ़ता– मां दुर्गा का प्रथम रूप हैं-शैलपुत्री। कहते हैं, जब सती अपने पति भगवान शंकर का अपमान नहीं सहन कर सकीं तो खुद को जलाकर भस्म कर लिया। सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैल पुत्री कहलाईं। शैल पुत्री दृढ़ता का प्रतीक हैं। बदलाव- एक महिला को शैल पुत्री की तरह दृढ़ बनना होगा। महिलाओं को भी अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए सही बातों के लिए आगे आना होगा। शैल पुत्री के इस गुण को जीवन में उतार लिया तो फिर कोई भी महिला को दबा नहीं पाएगा।
ब्रह्मचारिणी से सीखें संघर्ष– मां दुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी मनवांछित फल पाने के लिए कठोर संघर्ष करने के लिए प्रेरित करता है। ब्रह्मचारिणी ने भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या के कारण उनका शरीर क्षीण हो गया, पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। बदलाव- तपस्या कैसी हो, जीवन के लिए उपयोगी होती है। अगर आपको खुद पर विश्वास है तो संघर्ष में जीत आपकी ही होगी। संघर्ष में जीतने के बाद मिली खुशी का कोई सानी नहीं। अगर आप मिसाल बनना चाहती हैं तो संघर्ष करना होगा।
चंद्रघंटा से सीखें वीरता– मां दुर्गा का तीसरा रूप है-चंद्रघंटा। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है। इनके घंटे की ध्वनि से दानव-दैत्य सब कांपते हैं। इनकी आराधना से मन में वीरता के साथ-साथ सौम्यता व विनम्रता का विकास होता है। यह युद्ध के लिए हमेशा तैयार रहती हैं। बदलाव- वीरता का प्रतीक है- देवी चंद्रघंटा। आज के दौर में महिलाओं के मन में अज्ञात भय समाया रहता है। महिला बिना भय के अपने हर काम पूरे करे, तभी वह जीवन में आगे बढ़ सकती है। उसे निर्भया बनकर मुश्किलों का खात्मा करना होगा।
कूष्माण्डा से सीखें रचनात्मकता– मां दुर्गा के चौथे रूप देवी कूष्माण्डा को आदि शक्ति कहा जाता है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा था, तब कूष्माण्डा ने ब्रह्मांड की रचना की। सूर्यलोक में रहने की क्षमता केवल इन्हीं में है। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है। बदलाव- जीवन में सफलता के लिए रचनात्मकता जरूरी है। हर महिला देवी कूष्माण्डा से रचनात्मकता का गुण सीख सकती है। रचनात्मकता से जीवन की मुश्किलों को कम किया जा सकता है और कार्यों को आसान बनाया जा सकता है।
स्कंदमाता से सीखें ज्ञान– स्कंदमाता मां दुर्गा का पांचवां रूप हैं। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। इनकी कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है। कहते हैं कि कालिदास रघुवंशम महाकाव्य और मेघदूत इन्हीं की कृपा से ही रच सके। इन्हें चेतना का निर्माण करने वाली देवी माना जाता है। बदलाव- महिलाएं अपनी बुद्धि, ज्ञान और विवेक के बल पर तेजी से तरक्की कर रही हैं। चाहे पढ़ाई-लिखाई की बात हो या अच्छे कॅरियर की, महिलाओं ने हर क्षेत्र में खुद को बेहतर साबित कर दिखाया है। महिलाएं स्कंदमाता से ज्ञान सीखकर जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में पहला कदम बढ़ा सकती हैं। जरूरी नहीं कि किताबी ज्ञान पर भी निर्भर रहा जाए, आप अपनी मां या सास से अच्छी चीजें सीख सकती हैं और उन्हें अपने जीवन में लागू कर सकती हैं। इससे आपकी स्किल्स में इजाफा होगा और आपको जीवन के हर क्षेत्र में फायदा मिलेगा।
कात्यायनी से सीखें शोध– मां दुर्गा का छठा रूप है- कात्यायनी। कात्य गोत्र में महर्षि कात्यायन ने कठिन तपस्या की और पुत्री की इच्छा की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ही मां भगवती ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसीलिए इन्हें कात्यायनी कहा जाता है। कात्यायनी का विशेष गुण शोधकार्य रहा। बदलाव- किसी भी काम में महारत हासिल करने के लिए जरूरी है कि उस काम या विषय में पूरा शोध किया जाए। अगर महिलाएं अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहती हैं तो उन्हें शोध को महत्व देना चाहिए। बिना जानकारी के कोई दवा बच्चे को देने या बिना पारंगत हुए कोई पकवान बनाने पर फेल होना तय है। इसलिए पूरी रिसर्च के बाद ही काम को पूरा करने का आत्मविश्वास पैदा हो सकता है। देवी कात्यायनी से यह बात सीखकर महिलाएं जीवन में खुद का एक अलग मुकाम बना सकती है।
कालरात्रि से सीखें अंधकार खत्म करना– मां दुर्गा का सातवां रूप है- कालरात्रि। इनका रूप भयानक है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। शरीर का रंग एकदम काला है। कालरात्रि अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति है। यह काल से भी रक्षा करती है। कालरात्रि को दुर्गा के बेहद शक्तिशाली रूपों में से एक माना जाता है। बदलाव- महिलाओं को अपनी अंधकारमय स्थितियों का नाश करने के लिए खुद ही पहल करनी होगी। उन्हें याद रखना होगा कि जो खुद की मदद करता है, ईश्वर भी उन्हीं की मदद करते हैं। कई बार महिलाएं परिवार के दूसरे सदस्यों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो जाती हैं। इसके कारण बाद में उन्हें काफी परेशान होना पड़ता है। यह स्थिति सुखदायी नहीं है। इसे बदलने के लिए महिलाओं को कोशिश करनी होगी। खुद को मजबूत बनाना होगा और अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा।
महागौरी से सीखें शांति– मां दुर्गा के आठवें रूप महागौरी ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसलिए उनका शरीर काला पड़ गया। बाद में भगवान शिव ने गंगा जल से धोकर उन्हें गौर वर्ण कर दिया। इनकी पूरी मुद्रा बहुत शांत है। बदलाव- महिलाएं जीवन में खुश रहना चाहती हैं तो उन्हें जीवन में चल रहे उतार-चढ़ावों के दौरान शांत रहना होगा। महागौरी की तरह शांत मुद्रा में रहकर काम करेंगी तो कोई तनाव नहीं होगा और परिवार में खुशियां आएंगी। शांत रहकर खुद के बारे में विचार करें। अपने सपनों और खुशियों के बारे में विचार करें। जीवन में सब कुछ पाने की लालसा रखने की बजाय संतोष को प्राथमिकता दें। संतोष रहेगा तो जीवन में शांति रहेगी।
सिद्धिदात्री से सीखें देना– सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव को अर्द्घनारीश्वर कहा जाता है। इन्हीं की कृपा से भगवान शिव ने तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। सिद्धिदात्री सबकी इच्छाएं पूरी करती है। बदलाव- महिलाओं को सिद्धिदात्री से सबको खुश रखने की कला सीखनी चाहिए। महिला होने के नाते आपकी भी दात्री की भूमिका होनी चाहिए। सिद्धिदात्री की तरह आपको सबकी इच्छाएं पूरी करके खुद प्रसन्न रहना चाहिए। घर, परिवार, ऑफिस में हर महिला इस काम को आसानी से कर सकती है। महिलाएं सबका खयाल रखें, सबकी इच्छाएं पूरी करें, इसके लिए जरूरी है कि वे खुद भी अपना खयाल करें।

(साभार फेसबुक)

Monday, October 12, 2015

नवरात्री की शुभकामनायें

नवरात्री की पूजा सर्वप्रथम भगवान श्रीराम ने समुद्र तट पर की थी। इसके बाद ही उन्होंने लंका की ओर प्रस्थान किया। रामलीलाओं में दशहरे के दिन राम ने रावण का वध किया और लंका पर विजय प्राप्त की। इसलिए इसे विजयादशमी भी कहते हैं।
दशहरे के दिन कई प्रान्तों में क्षत्रीय अपने अस्त्र शस्त्र की पूजा करते हैं। दक्षिण भारत में आयुध पूजा नवमी को मानते हैं। इसी दिन रामचन्द्र ने अपने छुपाये हुए शस्त्रों को बाहर निकाल पूजा था। कई स्थानों में  कायस्थ परिवारों में गोबर से दसहरा बना कर कलम दवात की पूजा की जाती है।
अरे हाँ, दश-हरा  मतलब दसमुखी रावण का हारना। ऐसा मुझे कर्नाटक में पता चला।
सबको यथोचित प्रणाम स्नेह और दशहरे की शुभकामनाएं।

11 अक्टूबर अमिताभ जी के जन्मदिन पर

बात उनके स्ट्रगल के दौर की थी। जी हाँ बच्चन साब की। बच्चन जी ने बताया कि एक बार उनकी उनके पिताजी से किसी बात पर ज़ोरदार बहस हुई। क्रोध में अमिताभ जी ने कह दिया कि, 'आपने मुझे पैदा ही क्यों किया था...?'
बाबूजी कुछ नहीं बोले। सुबह अमिताभ जी को अपने बिस्तर पर एक चिट्ठी मिली उसमे बाबूजी की एक कविता थी। कविता ठीक से याद नही पर उसका अर्थ कुछ यूँ था-
"बेटे, मुझे भी नहीं पता कि मेरे बाबूजी ने मुझे क्यों पैदा किया? मेरे पिता को दादा ने ऐसे ही पैदा किया होगा। दादा के पिता ने भी उनसे बिना पूछे ही उन्हें दुनिया में लाया। बेटा, तुम लीक पर मत चलना अपने बच्चे बिना उनकी अनुमति न पैदा करना....."
अमिताभ बच्चन इस घटना को बताते हुए ज़ोरदार ठहाका लगाते हैं।
-जन्मदिन की ढेरों बधाइयाँ बच्चन साब...!

Wednesday, October 23, 2013

इंडीसेंट रिप्रेजेंटेशन ऑफ वुमन प्रोहिबिशन एक्ट १९८६ में संशोधन कर महिलाओं की अश्लील फोटो वाले विज्ञापन और होर्डिंग्स लगानेवाले पर पचास हज़ार से पांच लाख जुर्माना और पांच वर्ष की कैद!
.........और साथ में महिलाओं के अश्लील मेसेज (SMS) भेजने और मेसेज जारी करने वाले को जेल की हवा खानी पड़ेगी.....! पहली बार दोषी पाए जाने पर तीन साल की कैद और पचास हज़ार जुर्माना.. तथा दूसरी बार दोषी पाए गए तो पांच साल की कैद और एक से पांच लाख रूपए जुर्माना हो सकता है...! (लेडीज़ अब आप इसका सदुपयोग करें.. निकटतम पुलिस स्टेशन में मेसेज दिखाएँ)

इसे कहते हैं हल्ला बोल.... अब तो ऑंखें खोल.... अधिकार के लिए बंद मुंह खोल.....!
वह कौन है जो सतत जवाबदेही की सूली पर टंगी है? सदियों से इसी तरह, इन्ही अदालतों के बीच उधड़ी खड़ी है? सभी प्रश्नों के जवाब उसे ही क्यूँ देने हैं?
और भी तो अभियुक्त रहे होंगे इस बहुपरती मुक़द्दमों के? कुछ और भी बयानात ज़रूरी होंगे इस घटते क्रम के? एक उसी के सर पे औंधा आकाश क्यूँ पड़ा है?

......................

"स्त्री होने की परिणति है अपने से ही लड़ना... जूझना! अपनी निष्ठा को साध्वी सिद्ध करने के लिए हर घडी पंजो पे खड़े रहना.... और कभी कभी अंधड के थम जाने की प्रतीक्षा करना या फिर.... एक कुंड से निकल कर दुसरे में लिथड़ने लगना....."
........ शाम के धुंधलके में , गली में मेरा हाथ पकड़ कर तुमने इक चाँद का टुकड़ा मेरी हथेलियों पे रख बंद कर दिया.... 
मैंने पूछा, "क्या है ये"?
तुमने कहा, "मुहब्बत........"!

और बहुत तेजी से तुम चले भी गए........... ये तो कल ही की बात थी !!
.....तीसरी मंजिल की वही खिड़की मैं खोल के रखती हूँ जहाँ से चाँद मेरे सिरहाने तक आता है....

सुनो, मैंने चाँद को आज कह दिया है कि जब तक तुम न आ जाओ वो यूँ हीं मेरी खिड़की से आया करे और तुम्हारी खुशबू मेरे कमरे में बिखेरता रहे......!
तुमने मुझे रहस्यों में क्यूँ खोजने की कोशिश की? तुम्हे पता भी न चला कि इस कदर तुम खो गए कि खुद रहस्य बनते गए.... और मैंने जब तुम्हे निकालने की कोशिश की, जगाने की कोशिश की तो नाराज़गी ही दिखाई तुमने.... जताया भी कि मैं कौन होती हूँ तुम्हे समझाने वाली....!
तुम्हारे तर्क ही आते गए बीच में.... तुम्हारी सोच, बुद्धि समझ ... मुहब्बत सब डूबते गए...
खुद अपने मन की चिता जलाई तुमने, और उस 'चिता' पर मुझे लिटा दिया.....!
क्यूँ.....??
क्या खोज नहीं सकते थे अपने ही भीतर कहीं मुझे?
कि तेरी ही महक थी मेरे अश्कों मे भी, जो
मेरे रोने पे दुश्मन ने कंधा दिया अपना...
तीन चीज़े परमात्मा हाथ मे हैं, जन्म- मृत्यु और प्रेम! परमात्मा यानी समग्र. बाकी आपनी 'आईडेनटीटी', 'जॉब', 'सैलेरी', 'रिश्ते- नाते' सब भरावा है जीवन के, 'फिलर्स' हैं ये सब.
और ज़रूरी नहीं कि जो लोग प्रेम-गीत गा रहे वो प्रेम मे ही आकंठ हों. शायेद जो जीवन मे नहीं मिलता गीत गाकर खुद को समझा लिया जाता है. 
कभी -कभी प्रेम करते मालूम लोगों ने 'इंतजाम' भर ही किया है, जहाँ सुगंध नहीं आती , उनके जीवन से 'घृणा' और वैमनस्य की दुर्गन्ध भर ही आती है.
एक क्षणिक घटना है प्रेम, मृत्यु जैसे. बस यहाँ अहंकार मरता है और आत्मा आविर्भूत होती है.
-प्रेम आकस्मिक है क्रांति जैसे, 'रिवोल्यूशन'!
-प्रेम विस्फोट है, खुद के भीतर 'ब्लास्ट'..!
-प्रेम कोई क्रम नहीं, सीढ़ी दर सीढ़ी भी चढ़ना नहीं... 'होमियोपैथी'का 'स्लो' इलाज भी नहीं है... क्षण मे क्रांति होती है और रूपांतरण होता है...!

(जो प्रेम के लिए तैयार है वह परमात्मा के लिए तैयार है. प्रेम एक ऐसी 'महामृत्यु' है जहाँ शरीर वही रहता है और मन बदल जाता है. कोई और ही उर्जा हमारे भीतर आविष्ट हो जाती है...)
....पत्थर की मूर्ति हो या ईश्वर , क्या फर्क पड़ता है.... बस यही हो कि थोड़ी पवित्रता आ जाए.... प्रेम करना आ जाए.... और झुकने की कला भी आ जाये...!

( तर्कों को नासमझों के लिए छोड़ दीजिए.... समय का सदुपयोग कीजिये और जीवन की गहराई मे उतरिये.... कोशिश करने मे क्या जाता है?)
मुद्दतों की तिश्नगी थी, और सामने था मयकदा ...
... .........प्यास तो बुझ गयी पर हमी ना रहे.......!

(जहाँ अपेक्षाएं रहेंगी वहाँ प्रार्थनाएं पूरी नहीं होंगी...)
छुप के झांकती थी चाँदनी मेरे छत से रोज़,
दीपक जो बुझा , तो 'ढीठ' उतर आई आँगन में....!

(.. अब पल-पल जलाती है मुझे...)
 
सुना, मुस्कुराते होंठ भी चखते हैं अश्कों की नमी..
आज मेरी नम आँखों को खुल कर हंस लेने दो....!

(-इक सांस ही बची है, वो भी न टूट जाए...)
शिक्षित होने के लिए सीखने के लिए खूब जतन किये हैं दुनिया ने... विद्यालय विश्वविद्यालय के निर्माण आदि. आगे बढ़ने के लिए विस्तार है... हम बढ़ भी रहे. 

पर क्या कोई ऐसी यूनिवर्सिटी है जो भुलाना सिखा दे? पीछे जाना सिखा दे...?
समझ , शिक्षा संस्कार जो मन के स्लेट पर लिखे हुए हैं , क्या कोई फिर से उस स्लेट को धो-पोंछ कर पहले जैसा बना सकता है? 
... एक बार फिर से वही आँखे दे सकते हो. जो बचपन मे मैं लेकर आई थी? हाँ, वही निर्दोष निर्विकार चित्त भी चाहिए ...
सारे प्रमाण पत्र, सारी शिक्षा जलाने की इच्छा है...सारी बुद्धि सारी समझ गवां देने का मन है
रीति- रस्म -संस्कारों को पोछना चाहती हूँ.... और एक बार फिर से उसी रहस्य के साथ सबकुछ देखना चाहती हूँ..वही आह्लाद वही विस्मय और वही विभोर चित्त मुझे फिर से चाहिए... दे सकोगे?
"मैं चीखना चाहती हूँ हाईएस्ट फ्रीक्वेंसी के साथ, चिल्लाना चाहती हूँ... बीते पलों मे एक बार फिर से जाना चाहती हूँ..."

ईश्वर, मेरी उम्र अब आगे मत बढ़ाना हो सके तो मुझे पीछे ही ले चलो...!!
जहाँ आग रहेगी ,धुंआ वहीँ उठेगा....!!
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-ना.. ना .. नहीं... धुंआ आग का हिस्सा नहीं है. अगर लकड़ी मे पानी ना हो तो धुंआ उठ ही नहीं सकता . धुँआ उठता है आर्द्रता के कारण , पानी के कारण, गीलेपन की वजह से. 
हाँ जब तक मन गीला है इच्छाओं से... कल्पनाओं से... तकलीफदेह धुँआ ही उठेगा.
और कब तक ऐसी धुन्धुआती जिंदगी चलेगी? आग भी हमी जलाते हैं रौशनी की तलाश मे, पर धुंआ अँधेरे से भी बदतर कर डालता है.. अपनी आँखे भी आंसुओं से भरती हैं और दूसरों की भी. रौशनी तो दिखती नहीं और आँख मिचमिचाने के सिवा रह क्या जाता हैं.

-मन के आपाधापी और इच्छा से जब हम मुक्त होंगे उसी दिन प्रज्ज्वलित और धूम्ररहित शिखा उठेगी.

(मुहूर्तं ज्वलितम श्रेय:
जी करता है एक पल मे ही भभककर जल जाऊं... जीवन को लम्बाने से बेहतर होगा उसे प्रज्ज्वलित करना.. हाँ क्षण मे...! )

Sunday, September 1, 2013

उम्र के इक मोड पर आपकी जिंदगी में सबकुछ बदल जाता है... सिर के बाल सफ़ेद होने लगते हैं.. रगें ढीली पड़ जाती है... वेस्ट -लाइन चौड़ी हो जाती है... आप पर औरों का और आपका अपने आप पर विश्वास घटने लगता है ..आप हार्ट अटैक से डरने लगते है और इस उम्र में एक ई. सी.जी. करवा ही लेते हैं... आपकी लड़की ने जवानी में कदम रख दिया है, और उसके कुवान्रेपन को लेकर आप सजग हो उठते हैं.. जीवन की जितनी अभिलाषाएं थीं और आप सोचते थे कि पूरी हो जाएँगी एकाएक आपको लगता है कि अब मुमकिन नहीं.. जैसे आपके जीवन में शाम शुरू हो गयी और अब रात का इन्तेज़ार है...

* (जिन्होंने इस उम्र को छुआ नहीं  वे इसकी भयानकता नहीं सोच सकते...)
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"हद है ... चच्चा जी.. इस उम्र में भी आपको आशिकी सूझ रही है वो भी 'टीन-एजर्स ' वाली..."

Monday, August 5, 2013

इंसान को प्रकृति का सबसे बड़ा उपहार है - दर्द! 
क्यूंकि दर्द ही व्यक्ति में स्नेह और करुणा को जाग्रत करता है... और यही स्नेह और करुणा मानवीय चेतना के द्वार खोलते हैं
चुप्पी, केवल शब्दों में नहीं, विचारों में भी ज़रूरी है...|
बाहर से शांत और भीतर 'जलते' रहने से कुछ भी हासिल नहीं....

'मौन' , अर्थात मौखिक और वैचारिक शांति.......!
सुबह हम जागते थे और, उसे हम याद करते थे ,
...............अकेले बैठ के वीरान दिल आबाद करते थे.....
अक्सर दिल प्यार में पड़ना चाहता है और दिमाग को इस बात का विश्वास दिला देता है कि वह प्यार में है... प्यार में पड़ने की अवधारणा इतनी लुभावनी होती है कि दिमाग भी दिल के आदेश को मानता है... पर अक्सर (सभी केसेज़ में नहीं) प्यार कुछ नहीं है बस 'दिमाग' की एक परिवर्तित स्थिति है, कारण सीधा है, जब दो लोग प्यार करते हैं ,घंटो बातें करते हैं ,साथ रहते है , सारी बातें शेयर करते हैं, लड़ते हैं झगड़ते है , तो धीरे धीरे दिमागी परिवर्तन फिर होता है और कभी -कभी तो ऐसा होता है कि उस व्यक्ति से नफरत सी हो जाती है..
अब सोचिये जिसके लिए दिल धडकता था उस व्यक्ति से घृणा कैसे हो सकती है? और केवल घृणा नहीं बल्कि व्यक्ति चाहता है कि 'उस' व्यक्ति को तरसता तडपता हुआ देखे.

उफ्फ्फ...... जो दिल प्रेम करता है उसके मन में दुर्भावनाओ का कोई स्थान नहीं होता...
समुद्र को जलाना संभव नहीं..... !
इसे जमा सकते हैं वाष्पीकृत कर सकते हैं, पानी का रूप बदल सकते हैं 'स्टेट' बदल सकते हैं... अस्तित्व नहीं मिटा सकते. प्यार करने वाले पे आप क्रोध कर सकते हैं पर घृणा नहीं...अप्रिय जगह के लिए कोई स्थान नहीं.

अक्सर प्यार दिमागी स्थिति है .. पर सच्चा प्रेम है तो आपको सिर्फ दिलो-दिमाग ही नहीं बल्कि प्रकृति की सारी शक्ति उसको पोषित करने में सहायता करती है...जहाँ प्रेम है वहाँ नकारात्मक भाव अपना ज़हर नहीं फैला सकते...!
बात-बेबात तेरी आँखें भर आती होंगी,
और तू अपना चेहरा बाजुओं में छुपाता होगा....
...........जब भी मेरा ज़िक्र कहीं आता होगा.......!

Sunday, July 7, 2013

अबके बरस भेज भईया को बाबुल

बीते रे जुग कोई चिट्ठिया ना  पाती
.............ना कोई नैहर से आये...!

इन दो सालों में हमे  पहली बार ऐसा लगा कि हमारा बचपन खो गया है..... संगी साथी , खेल-खिलोने सब बीते दिनों की बातें लगने लगीं... घर दूर दूर होता जा रहा है. दो सालों में हम डाल्टनगंज (मायका) सिर्फ शादी ब्याह में जा रहे हैं... वहाँ दस- पन्द्रह दिनों की मौज मस्ती होती है, नाच गाने , उत्सव-उत्सव-उत्सव... खूब काम होते हैं और  सब के सब बिजी.... ना तो अच्छे से माँ- चाची से बात-चीत हो पायी ना भाई बहनों के साथ गप-शप, ना सहेलियों दोस्तों का जमावड़ा रहा ना छत में धमाचौकड़ी हो पायी....  लड़ना झगडना , रूठना मनाना इन सब के बिना कुछ खाली खाली सा  लगा...
....बैरन जवानी ने छीने  खिलौने
और मेरी गुडिया चुराई.....

एक बार मन  हो रहा कि हम फुर्सत में घर जाएँ.. खूब बातें करें सबसे... अपनी पसंद की चीज़ें खाए... वहाँ की गलियों में  घूमे....  हमउम्र भाई- बहनों दोस्तों के साथ खेलें... अपने लगाये पौधों को सींचे... टायर के झूलों में झूलें, पड़ोस के बगीचे के अमरुद चुराए, उनके फूल तोड़ कर भाग जाएँ... अपने कमरे की सफाई करें... छुपाई चीज़ों को फिर से खोजें... सबको दिखाएँ.. पुराने ग्रीटिंग कार्ड और खतों को निकाल कर फिर से पढ़े... फिर से वही वही शरारतों को दुहरायें जिनसे खूब हमारी क्लास ली जाती थी... और फिर से मम्मी अपने हाथों से रोटियों के कौर मेरे मुह में डालती जब हम असाइनमेंट पूरा कर रहे होते...
घर जाना चाहते हैं....!

"अबके बरस भेज भईया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाये...."

Friday, June 28, 2013

आदमी के बदन पर दो गज कपडे की तरह है औरत...जिस दिन यह कपडा फटा आदमी क्या पूरा घर नंगा हो जाएगा...|
हर मोर्चे पे अकेले संघर्ष करती लडती औरत.... ! तकलीफ में भी होती हैं तो कभी चौराहे पे जा कर नहीं रोती... घर के उस कोने में जा के रोती है जहाँ कोई देख न पाए....!

.....औरत का छिप कर रोना, सिर्फ रोना नहीं , एक लोक गीत है जो ज़िन्दगी की तपिश, आवाज़ और लय से निकले आदमी को आदमी और घर को घर बनाये रखने का एक जज्बाती सलीका है.... हुनर है.... एक कला है.....!

Thursday, June 27, 2013



"रब दा की पाना....
एथों पुटिया ते एथे लाना...."
- बुल्लेशाह.

(परमात्मा को क्या पाना है? यहीं से उखाडना है यहीं लगाना है. मतलब, यहीं बैठा है यहीं लाना... रब नहीं खोया कहीं बस उसकी याद खो गयी है...इक बूँद की पहचान हो तो सब सागर की पहचान हो जाए.
क्या दुनिया...? क्या भीड़-भाड़..? बस प्यासों की कतारों पर कतारें....... यह संसार!!
अब झांको खुद में....)

Tuesday, June 25, 2013

मित्रत्व

रामकृष्ण की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी शारदा देवी से  विवेकानंद जी आज्ञा मांगन गए कि वे अमरीका  जाना चाहते हैं और उनसे आशीष मागने आये हैं. शारदा जी ग्रामीण महिला थीं, सो विवेकानंद जी ने सोचा भी नहीं कि आशीष/ आज्ञा देने में इतना सोच-विचार करेंगी.  शारदा जी ने उन्हें नीचे से ऊपर और से देखा और कहा, 'सोच के बताउंगी...' और खाना बनाने में तल्लीन हो गयीं.
"सिर्फ शुभाशीष चाहता हूँ, मंगलकामना तुम्हारी कि मैं जाऊं और सफल होऊ.." स्वामी जी बोले.
थोड़ी देर बाद शारदा जी ने उन्हें निरखा और कहा, "नरेन्द्र, वो छुरी देना......"
नरेंद्र छुरी उठा के शारदा के हाथ में पकडाते हैं,  शारदा प्रसन्न हो आशीष देती हैं और कहती हैं "हर क्षेत्र में सफल हो  नरेन्द्र.."

स्वामी जी अवाक, पूछते हैं कि," छुरी में और तुम्हारे आशीष में कोई सम्बन्ध था क्या?"
शारदा ने कहा ,"हाँ सम्बन्ध था , मैं देखना चाहती थी कि तुम छुरी कैसे पकडाते हो.. मूठ तुम पकड़ते हो या फलक पकड़ते हो? और जैसा मैंने सोचा तुमने फलक पकड़ के मूठ मुझे धराया , आमतौर पर लोग मूठ पकड़ते हैं. तुमने मेरी सुरक्षा की फिक्र करते हुए खुद को असुरक्षा में डाला. तुमने अपने चारों और के जीवन की सुरक्षा को महत्व दिया इसलिए,
तुम्हारे मन में मैत्री का भाव है, तुम जाओ तुम्ही  से कल्याण होगा, मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है..."

(एक छोटी सी घटना है ये, जिसमे मैत्री प्रकट होती है , साकार बनती है. सौ में  से निन्यानबे मौके पर कोई भी मूठ पकड़ेगा तो वह सहज होया , उसके लिए आत्मरक्षा सहज होगी... और मैत्री आत्मरक्ष से  ऊपर उठ जाती है.. मैत्री का अर्थ ही है 'सक्रीय करुना' एक्टिव कम्पेशन ...! अत: मैत्री सिर्फ मित्रता (फ्रेंडशिप) नहीं, बल्कि फ्रेंडलिनेस (मित्रत्व) है. मित्रता और मित्रत्व में सबसे बड़ा फर्क यही है कि मित्रता जब तक  है शत्रुता भी है यानी जिनके मित्र हैं शत्रु भी हैं, मित्रत्व यानी शत्रुता या बैर- भाव का तिरोहित हो जाना... बस)

Monday, April 29, 2013

प्रेम की परिभाषा

लड़का : सुख क्या है? शांति किसे कहती हो? और प्यार की परिभाषा क्या है?

लड़की : सब कुछ परिभाषा के दायरे में नहीं.....!

लड़का : जानती हो. मैंने इन सब को समझने के लिए कई किताबें घोट डाली... धर्म शास्त्र से ले कर काम शास्त्र तक.. मंदिर से वेश्यालय तक का सफर किया...शराब की बोतलें औरतों का बदन मुझे इन तक नहीं पहुंचा पाया..मेरा जीवन खत्म होने जा रहा है और अब तक सुख शांति प्रेम को ना समझ सका.. तुम समझा सकोगी? क्यों कि मेरे लिए सबसे ज्यादा मायने  तुम रखती हो भले ही ये दो दिन की पहचान है.... मदद करो!

लड़की: ...............................

लड़का: देखो............!

लड़की :ये क्या है? फिर से ...................... उफ्फ्फ ????????

लड़का :छोड़ नहीं पा रहा........ सुनो... देखो.... महसूस करो...

'आह... मीलों तक बर्फ ही बर्फ...उस पर चन्द्रमा की किरने...रात बढ़ रही है सब सो रहे हैं.... पेड़ पौधे नदी नाले... सब.. मैं.. तुम....आह!
देखो... सीमाहीन समुद्र... लहर पे लहेर डूबती लहरों की चीख के अलावा कुछ नहीं...
सुनो रात झुक रही है, ज़मीं शांत हो रही है... सिर्फ एक आवाज़ दूर से आ रही है.. तुम्हारा नाम!!
उफ्फ्फ....... '
मेरी मुहब्बत डूब गयी फिर से............ !!
अब सब खामोश हैं.... सब कुछ ... वक्त की धडकन बंद हो गयी फिर से.....!

- कल कोई और पूछेगा प्रेम की परिभाषा... पर उत्तर...........

Wednesday, October 3, 2012

तुम्हारी स्मृतियों में एक जकड़ीली टेर है....
एक आमंत्रण............
स्थिति के भवंर में थरथराती हर स्मृति...!
इनके सानिध्य में अकेले जा बैठने का लालच,
मन में लपलपाया करता है...!
इन्हें प्यास का पर्याय मान कर संजोया है...
दुलारते -मनुहारते हुए...
टेरते-सहलाते हुए...!
एक अदीन कामना का उत्ताप..
एक सिंकी सी आश्वस्ति कि, जो कुछ है वह तुम्ही से सम्बंधित है....!
"एक मुझ अकेली के मन की सुंदरता पर आसक्त है..........."

Tuesday, October 2, 2012

खंडहरों में दीप मेरा जल रहा है.....
विजनता की विषमता को छल रहा है.....!

कह रहा गुजरी कहानी आज रोकर,
भूल में ही प्यार का संगीत होकर...!
श्वास फूले जा रहे हैं मार्ग में ही,
हांफता है साधना का दंभ खोकर!
मिट गयी है क्या मेरी आराधना,
मुक्ति का यह दीप कैसा खल रहा है....?

खंडहरों में दीप मेरा जल रहा है......!
प्रतिपल पाना प्रतिपल खोना
कैसा हंसना कैसा रोना..?
मर-मर होता रोता , जीवन-
का यह कोना कोना....|
साथ जुटाया, मोह जगाया..
फिर भी रहा अकेला.....
हाथ झाडकर चला मुसाफिर,
पास ना कौड़ी -धेला.....|
मानव चला अकेला...............!!
एक गुड- गूंगा स्वाद............!
जिसमे से बार- बार गुज़रा जा सकता है...
रात-बेरात...... आगे-पीछे....
देशकाल की सीमाओं को अंगूठा दिखाकर...|
यह सुख 'अभी-अभी'... 'कभी-कभी'... 'कभी नहीं ' भी हो सकता है...|
.. या उदासी का कोई चीथड़ा उसे अपनी
फडफडाहट में बाँध देता है.....

"इस अनुभव से गाहे-बगाहे गुज़रती हूँ...
फिर अक्सर , स्मृतियों के सहारे अपनी निजता को लौटती हूँ..."
तुम्हे याद करते समय , मन में एक दर्पण सा जगमगाने लगता है.....|
यह एक दूसरा संसार है जो तरल होकर,
मेरे बंद दरवाज़ो की दरारों के नीचे से घुस जाता है..
और मेरे सजे-धजे घर को गीला-सीला कर जाता है....!
"और इनमे से गुज़रती मैं पस्त- ध्वस्त सी हो उठती हूँ......"!!
माँ से पिट कर आई उस लड़की के चेहरे पर 
दर्द का नामोनिशान ना देखा मैंने..
हांफती हुई वह कह रही थी,
" दीदी ..दीदी.. मेरी माँ तो पूरी पागल है 
मुझे पीटते वक्त जो उसका 'झोंटा' खुल जाता है ना,
तो एकदम चुड़ैलों जैसी लगती है- साक्षात!
-पिट रही हूँ इस बात का ध्यान भी नहीं होता.." 

वह रोज ही माँ से पिट कर आती...
बकौल उसके, उसकी माँ को उससे बैर है...|

जानते हैं क्यूँ.......?
-क्यूंकि जब वो पैदा हुई थी , उसके आगे वाला भाई
हैजे से मर गया था..
जिसके हिसाब से यह इसके अशुभ पदार्पण की छाया थी...|
शून्य के दुर्गम विलय में झाँक कर,
नियति विहंसी मूल्य उसका आंक कर..|
कांपती है ज्योति की नन्ही शिखा,
थक चुका है प्राण वैभव मांग कर....|
जगमगा के बुझ गयी दीपावली,
अब अभागा यह अकेला जल रहा है......|
खंडहरों में दीप मेरा जल रहा है.............!!!
सरकार....! सरकार.....! सरकार...............!
सरकार में रहें तो सरकार.....
सरकार के बाहर हैं तो सरकार...........
सरकार नहीं तो सरकार की आँख..............!!

बस्स............ सब फेर बदल की सहूलियत में हैं...............
तिस पर सुरक्षा का सनातन छाता ताने बैठा है.......!
सरकार कुछ कर नहीं सकती.. फिर भी बात मनवाए चली जाती है....
क्यु ना हो देश की ताकत जो साथ है........!!
ये क्या है जो मुझे जीते -जागते...
यहाँ बैठे -बिठाए, टेर ले जाता है...
खींच ले जाता है मेरी जीवनी-शक्ति....
क्षण भर में मैं निरीह- निस्तेज सी लगने लगती हूँ.........!
और चेहरा ऐसे धुआं -धुआं जैसे ,
'भाप की दीवार के पीछे का दर्पण...'.... !!!
अधर सूखे , किन्तु देखा सामने
सब दिशाओं में मिला 'मरुथल' असीम........
प्रेम ढूंढा तो मिले 'निर्गुण' पुजारी-
साध्य की ही साधना तो थी ससीम.....!
फिर कहो, यह नयन कैसे बरस लें?
जब विरह की ज्वाला जलती ही नहीं......
क्या करूँ के अब प्यास लगती ही नहीं...................!

साधना की राह में मैं थी बटोही,
देवता के चरण में चलकर गयी थी.....
पर ह्रदय की मान्यता ही थी अधूरी-
अर्चना के फूल सूखे ले गयी थी;
'मरुथलों ' की साधना भी स्वप्न होती,
स्वप्न की हर बात बनती ही नहीं....|
"क्या करूँ, के अब प्यास लगती ही नहीं......"

देवता के पास आई थी कभी,

आँख तक भी मिला मैं पायी ना थी...
थक गयी माथा झुकाकर सामने,
दर्द भी अपना सुना पायी ना थी ;
जबकि मंदिर के पुजारी ने कहा,
"देवता की नींद खुलती ही नहीं|"

क्या करूँ के अब प्यास लगती ही नहीं.............!
एक मर्सिया जैसा मन में कुछ बज रहा है...
कुछ यादें आग सी जाग रही हैं,
धधक रहीं हैं....
बुझ रही हैं...
चीथड़े हो रहीं हैं.....
घोल बन गयीं हैं और बह रही हैं.....
वह भी नालियों में,
..कीट...कृमि.... कीटाणुओं के साथ.........!
मन से सीधे खोह में....
जीवन से शुन्य में....!
मन अभी भी खाली न हुआ है....
पर तुम भी अभी वहाँ कहीं नहीं...
बस काले चीथड़े हवा में फडफडा रहे हैं..............!!

भोर होती है और डर व्यापता है,
डर..... एक सर्वग्रासी आवेग..!
कभी उघड़ने का डर..
कभी पकडे जाने का डर....
कभी अधूरे समर्पण का डर.....
शरीर के शरीर ना होने का डर...
मन के बेमन होने का डर...
बीती बातों के रिस आने का डर...
'जैसा होना चाहिए वैसा ना होने का डर'-
-और इसकी जवाबदेही मन को पंगु बना कर फेंक देती है...!
-और 'स्त्री' को कितना प्रतिबंधित कर देती है...............
- क्या 'पुरुष' को भी...............?


गुड मॉर्निंग है जी....................!!!

Thursday, September 6, 2012

रेशम के कुर्ते में उसकी ऐंठी हुई लाश.. और मुट्ठी में एक तुडा मुडा पत्र....
पत्र में जो तफ़सील दर्ज थी उसका मतलब कुछ यूँ था...
-'प्रेम की राह में रोडे अटकाने वाले पिता को दंड ,और हम दोनों को मुक्ति,
हमारी अर्थियां साथ -साथ निकाली जाएँ....'

यही आखिरी आरजू थी शेर सिंह चंदेल के इकलौते बेटे की..
अपनी खाल खिंचवाकर बेटे के जूते सिलवा सकते थे शेर सिंह...
पर बनिए की बेटी को सपूत ना सौंप सकते थे..|

सरेआ
म चीख रहे थे इसी चौराहे पे चंदेल कल....
'ठाकुरों का पुंसत्व पुश्तों से इसी तरह अपनी बीजों की रक्षा करता आया है...
किसी ने मूंछें नीची ना की..
बछड़े मुह मारते हैं - मारते रहें...
ये सब तो राजसी मिजाज के लक्षण हैं......'

-और आज एक उन्मादी आर्तनाद ने जगाया चौराहे को....
दहला देने वाला लहरदार चीत्कार रवां हुआ था...
बेटे की मृत्यु की दारुणता चौधरी पर गरजी और विक्षिप्तता बन कर बरसी थी....|
........ एक सिरकूट चीत्कार................!

-दूसरी और.... एक सुन्न सन्नाटा......
अटूट चुप्पी...........
ना चीख .. ना पुकार........ ना क्रंदन... ना विलाप.....|
'बनिए की छोरी की अर्थी आगे बढ़ी.. और टंटा खत्म...........!!

Wednesday, September 5, 2012

मन फिर हल्का हो आया है.... रुई जैसा...!
हाँ, रुई है सो हलकी लगे पर धुनक दो तो इतनी... इत ........नी..............
...कि कहाँ रखें......|
.. कुछ कुछ ऐसा ही आवेग....!
इतना उत्तेजन बरसों बाद जाना....
और इसे मैं अगर समझाना चाहूँ तुम्हे....
तो गले में एक गाँठ सी अड जाती है...
जैसे आगे बोलना पड़ा तो शर्मसारी की चादर उघड जायेगी....|
.. और मैं भीख मांगती लगूंगी.....!!

"मैं..... हाँ ... मैं.... मेरा कोई मन या मेरी इच्छा नहीं.....?"
ये शब्द भीतर ही भीतर बिलबिला जाते हैं.....
और उचारे नहीं जाते....|

फिर अपना चेहरा देखती हूँ मिटटी सा वर्णहीन.....
...और धुआंसी आँखें....!

मन में अब कोई कच्चापन नहीं.....
सालों से बंजर पसरापन है...और...
होंठो पे एक सुबकी उचकती है.......!

"लो, मुह फेर के बैठ गयी मैं..........."