Wednesday, January 18, 2012

खंड चित्त

तुमसे जो तरंगें निकलती थीं और सारी प्रकृति से उन तरंगों का जो तालमेल था वह टूट सा गया है....जो इनर हार्मोनी थीं वह भी टूट गयीं है... तुमने अपने हाथों से ही सब तालमेल तोड़ डाले हैं.. और अकेली खड़ी हो गयी हो आज -दुश्मन की तरह! तुम्हारा हठ ये कहता है की भावपूर्ण होना मूर्खता है...जबकि तुम ये जानती हो की भावहीन होना मूर्खता है..!!
न बादलों से दोस्ती न नदियों से प्रेम......!

"खंड खंड चित्त, स्व-विरोध में बंटा व्यक्तित्व ..डिस इंटिग्रेटेड व्यक्तित्व ...."
"कल तेरे वीणा के तार बहुत ढीले थे.... संगीत पैदा ही न हुआ ..." ' आज तूने तार बहुत कस लिए हैं.. टूट गया... और संगीत मर गया'!

"मूढ़"!!!!!!!!!!

उठो... जागो!! चौंको... और सजग हो जाओ! नए प्रेम की शुरुआत करो जो शाश्वत हो...!
देह से प्रेम तो बहुत किया .. अदेही से करो.. मृत्यु न होगी तेरे प्रेम की!!!

Wednesday, January 11, 2012

मुझे परतंत्रता में जिलाने की तुम्हारी कोशिश ऐसे ही है जैसे:
"तुम आकाश को  डिब्बों में बंद करना चाहो...
....किरणों को  संदूकों में भरना चाहो...
...........खुशबू को मुट्ठियों में भीचो...."
"यह नहीं हो सकता....."
अस्वाभाविक है....!!! .. मगर..
तुम ऐसा ही करते हो....
और प्रेम के नाम पर जंजीरें रह जाती हैं.... बोझिल!!!!
मुह में तिक्त और कड़वा   स्वाद रह जाता है...................!!!

Tuesday, January 10, 2012

दो  छोटे बच्चे एक ५ साल का एक तीन का.. बातें कर रहे थे धीरे धीरे..छोटे ने पूछा "भैया पढाई से बचने केलिए क्या करूँ" नया स्कूल शुरू हुआ था ...
बड़े भई ने कहा उसके कान में.."देख, तू ' सी ए टी 'कैट  से बचना बस. क्यूंकि अगर तुने इसे सीखा तो बहुत कुछ सीखना पड़ेगा..."! "तू अड़ जाना इसी पे...न सीखना मुझे...इसके  बाद बड़े बड़े शब्द आते हैं... सब सीखना होगा फिर.. मैं फंस गया तू मत फंसना "!!!!!!!

सच है न एक चीज़ को  पकड़ो  तो पकड़ शुरू होती है... फिर दूसरी को पकड़ना पड़े... तीसरी को.. सिलसिला  शुरू!!!
एक श्रंखला है....!!!!
 जीना गुजरना अनुभव से... पकड़ना अनुभव थोड़ी है...!!! और हमेशा अनुभव की संभावना क्यूँ....?? जल्दी क्या है ..किसे है पकड़ने की...? और पुनरुक्ति...आकांक्षा  ही मत करो..!!
क्यूंकि इस अभीप्सा के पीछे यही समझ विकसित होती है की हम बंधन में हैं....!!!
मुझे बंधन पसंद नहीं!!!!!!!!!!!!!!! न...... ना... नहीं!!!

Monday, January 2, 2012

आज अर्जुन की बात....  मैंने आज इसका खोजा/पढ़ा... बड़ा अर्थपूर्ण है "अर्जुन"!!!
ये शब्द है "ऋजु"... जिसका अर्थ होता है सीधा सादा...(straight ).. और  अ-ऋजु का मतलन- टेढ़ा मेढ़ा!!! डावांडोल...!!! इसका शाब्दिक अर्थ है डोलता हुआ...!!!
हमारा चित्त है ये अर्जुन की भांति है,..  डोलता हुआ.. कभी निश्चय नहीं कर पाता.. सारे कार्य अनिश्चय में होते हैं... हाँ सबके भीतर है अर्जुन!!
वही जो हमारे मन का प्रतीक है...!!!मन का एक ढंग है कि आप कितनी निश्चित बात करें वह उसमे से अनिश्चित निकाल ही लेता है.. जैन फिर इसका क्या होगा.. उसका क्या होगा....?
बातें निश्चित नहीं होतीं.. चित्त निश्चित होते हैं!!!सिद्धांत निश्चित नहीं होते, चेतना निश्चित होती है!
बड़ी कृपा अर्जुन की वरना गीता पैदा नहीं होती.. न वे उठाते प्रश्न न कृष्ण उत्तर देते.. न लिखी जाती गीता!!! कृष्ण जैसे लोग लिखते नहीं सिर्फ responce करते हैं..!! लिखते तो वे लोग हैं जो किसी पे कुछ थोपना चाहते हैं.... कृष्ण तो सिर्फ उत्तर देते हैं.. पुकारने पे आते हैं!!!कोई कुछ न पूछे तो कृष्ण शुन्य और मौन रह जायेंगे..!!!
कृष्ण से कुछ लिया न जा सकता है सिर्फ बुलवाया जा सकता है...प्रतिसंवेदित कर सकते  हैं! अर्जुन ने बुलवाने का काम किया है...उनकी जिज्ञासा उनके प्रश्न कृष्ण के भीतर से तब जन्म पाते हैं..!!!

Saturday, December 31, 2011

नश्तरे जुबां हमे वो इस खूबी से  चुभा गए,
ता उम्र  उसकी दवा को हम ढूंढते रहें या रोते रहें...

चादर हमारे ख्वाब की वो फटेहाल बना गए...
धागे  उनके ख्याल के हम पिरोते रहें या सीते रहें.....!!

नवयुग में युग धर्म का यह नूतन आकार
सरस्वती को अपमानित कर, लक्ष्मी का सत्कार
भय लज्जा को त्याग निरंकुश , खुलकर अत्याचार
चाहे जिस बल कौशल से, सत्ता पर अधिकार
सिर्फ युग-धर्म दुहाई देकर , लोक विरुद्ध सुधार
हरिभक्तों को फांसी देकर हरिजन का उद्धार
किया निरिक्षण इस युग का, यही रहा मेरा शोध..
नव युग है "भ्रष्टों" का युग , हुआ यही आत्मबोध!

Tuesday, December 27, 2011

जानते है आप प्रेम कोई सम्बन्ध (relationship) नहीं, मन की अवस्था (state of mind) है. जब हम सोचते हैं ऐसा कि हम फलां से प्रेम करते हैं तो वह गलत है होता यूँ हैं कि हम प्रेमपूर्ण होते हैं! मैं तो इसे अवस्था ही मानती हूँ, क्यूंकि प्रेम से भरे हुए चित्त से प्रेम ही झरता है रौशनी की तरह सुगंध कि तरह...और जो भी पास आता है अगर वो लेने में समर्थ है तो मिल ही जाता है अगर नहीं तो वो उसकी बात!!!
प्रेम मुक्ति है! वह किसी को बाँधने का प्रश्न ही नहीं उठता.जो पास है उसे मिलता है जो दूर गया... वह गया..!!जैसे दर्पण के सामने कोई रहता है तोउसकी तस्वीर बनती है हटने पर तस्वीर मिटी.. दर्पण फिर खाली! फिर किसी की तस्वीर बनाने को तैयार.!किसी की प्रतीक्षा बनी रहेगी फिर कोइलेने को तैयार!
अगर कोई बंधन है ,कोई रोक है, तो वो आसक्ति है.. न कि प्रेम! आसक्ति रोकती हैकि रुको! नहीं तो फिर  मैं किसे  प्रेम दूंगी ? आसक्ति कहती हैकि तुम ऐसा ऐसा करना तो ही मैं प्रेम करूँ.. तो ये कारागृह में डालना हुआ..  प्रेम तो बे शर्त दान(un conditional giving) है!! प्रेम स्वतंत्र करता है एक व्यक्ति को व्यक्ति बनने देता है वस्तु  नहीं!
आसक्ति प्रेमके मार्ग में एक झूठा सिक्का (hippocracy)है .. तब आदमी सिर्फ संबंधो में जीता है.. जिस दिन पता चले कि मैं प्रेमपूर्ण हूँ ..उस दिन हम आप्तकाम (self fulfilled)होंगे .. और आनंद को उपलब्ध होंगे!!

Wednesday, December 14, 2011

मन का खेल है सब... मन कभी लहर तो कभी सागर बनता जाता है. जब विचार उठें तो लहर... जब निर्विचार  हों तो सागर!!!    शायेद यही ध्यान है...
कभी तो यूँ लगता है कि हम हज़ार छिद्र वाले बाल्टी बन गए हैं... जब कुवें में डाले जाते हैं तो  बड़ा शोर होता है... हलचल होती है!
पर जब तक पानी में हैं तभी भरे हुए से प्रतीत हो रहे है... जैसे ऊपर उठते जायेंगे खाली होना शुरू... और वही शोर!! इसी में तो हम खुश हैं...खाली  होने के शोर में...   


हाँ यही हजारों छेद.. हमारे हजारों विचार है...इसी से हमारी उर्जा भी तो कम होती जा रही है. जिस समय निर्विचार  हुए , उर्जा खोने का मार्ग बंद हो जायेगा!
वही उर्जा वापिस  हममे गिरेगी.      मन से खोया है मन से मिलेगा... मन से भटके हैं, मन से पहुचेंगे.. मन ह् रुग्ण है स्वस्थ हो जाए तो मिल जाए जो खोया है...!!...

 फिर क्या, हम ब्रह्म!.. हम परम!! हम सागर....      सत्ता हमारी...!! पर यहाँ हमारे छिद्र, हमारे रंध्र ..हमे खो रहे हैं... चुका रहे हैं...!!!         

Tuesday, December 13, 2011

एक दिन कृष्ण ने राधा के नथ (नाक की मोती) से पूछा :-

'ओ री मोती सीप की तू कौन तपस्या कीन,
सुबरन के ढिग बैठ के.. अधरन को रस लीन'!

(सीप के मोती तुने ऐसी कौन सी तपस्या की है जो सोने के साथ मिल के राधा के अधरों का रसपान कर रहा)

इसपे मोती ने कहा...

"छेड़ छिदो परहित कियों, तजि कुटुंब की लाज...
ओते दुःख मैंने सहे इन अधरन के काज!!"

Monday, December 12, 2011

एक चुटकी नमक

वो रोज पूछते हैं कि कितनी अहमियत रखते हैं मेरी जिन्दगी में.... खैर उनकी बात रहने दीजिए, आदत जो है उनकी....!! अपनी बात करते हैं...

आज डिनर में मैंने अपने पसंद कि सब्जी बनायीं.... बहुत अच्छी रंगत,, बहुत अच्छी खुशबू,,.. मज़ा आया गया देख के... खाया तो उसमे नमक नहीं था.... बाकी सबकुछ बेहतरीन!!

हाँ याद आया!!! उनकी अहमियत तो वही नमक जैसी है.. जो मिसिंग थी !!
हुंह... क्या एक चुटकी नमक की भी कोई अहमियत होती है?

Thursday, December 8, 2011

बड़ी प्रतीक्षा की होगी तुमने, शहनाई बजती होगी... द्वार पे अतिथि आये होंगे.. सहेलियों ने सजाया होगा तुम्हे!...
..फिर नहीं आया दूल्हा... न आवाज़ आयीं घोड़े की टापों की...  फिर खबर आई कि भाग गया है दूल्हा.. लापता हो गया!!  तो तेरे तो सारे सपने धुल धूसरित हो गए होंगे... अहंकार को चोट लगी होगी!!!! बहुत दर्द हुआ होगा.. है न..?. लेकिन.....??
... लेकिन....दर्द से ही कोई जागता है.. पीड़ा चुनौती बनती  है!!

इसे एक अवसर समझो एक नयी यात्रा का... एक नए  सृजन का ... !!!

कसम लो कि हो गयी बात! एक खेल से छुटकारा मिला! समय रहते तुम बच गए...

नाचो क्यूंकि वह समय लापता हो गया है.. बाद में ऐसे व्यक्ति के साथ रहने में पछतावा ही होता...!!
मत लेना सांत्वना किसी की... सांत्वना लेना और देना...सिर्फ मरहम पट्टी है.... भरोसा रखो सर्जरी में..!!!!

Wednesday, December 7, 2011

इधर ख़ामोशी, उधर ख़ामोशी, गुफ्तगू फिर भी हो रही  है,
वो सुन रहे हैं ब-चश्म-ए खंदा, बचश्मे- नम हम सुना रहे हैं!
जो मुस्कराहट से उनकी उठती है नगमाए बेखुदी कि मौजें,
वही तो बनते हैं शेर मेरे जिन्हें वो खुद गुनगुना रहे हैं!!!!!

Tuesday, December 6, 2011

वही तो है आशकी सरुरे निशाते रहती हो जिसमे हरदम
हो गम का अहसास जिसमे पैदा, वह आशकी आशकी नहीं है...!!

वही तो है बंदगी फक़त जो तेरी खुशी के  लिए अदा हो...
तलब कि जिसमे हो लाग कुछ भी वो बंदगी बंदगी नहीं है....!!!

Wednesday, November 30, 2011

बख्शी है मुसलसल एक तड़प तो इतना एहसां और करो,
हम पर भी नज़र वो जाये, जो दोनों जहाँ गरमाती है...!!
ये हार हमारी हार है वो...
जो तेरी जीत को भी शरमाती है ...!!!!

Tuesday, November 29, 2011

मेरे भक्त वत्सल गोपाल !!
क्या तुमने समझा है इस 'वात्सल्य' को? जाना है अर्थ इसका? हाँ ये ऐसा प्रेम है जैसा माँ का छोटे बच्चे से. बच्चे में कोई योग्यता नहीं है.. न वो तुम्हे कुछ कमा के दे रहा है.. न यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडल है उसके पास! पर माँ उस से अथाह प्रेम करती है... ये प्रेम किसी योग्यता के कारण नहीं है! बच्चा तो अपात्र , अबोध, असहाय है. उस से कुछ उत्तर भी तो नहीं मिलता! इसलिए इस प्रेम में सौदा ही नहीं सिर्फ देना है.. एक बेशर्त दान... वो तो धन्यवाद भी नहीं कहता....!!
और जब मैं कहती हूँ "हरि मोरे जीवन प्राण अधार, और आसरो नहीं तुम बिन, तीनो लोक मझार".. तो ये कह रही हूँ तुमसे कि मैं अपात्र हूँ; असहाय हूँ; कोई योग्यता भी नहीं ;प्रत्युत्तर में देने को मेरे पास तो कुछ भी नहीं है उसी बच्चे कि भांति... फिर भी.... हाँ फिर भी तुम देते हो!!!
जय श्री कृष्ण...!

Friday, November 25, 2011

तुम जानते हो......? तुम्हारा स्वर मेरे स्वर से मिल गया है. तुम्हारे बावजूद तुम समस्वर हो आते हो मेरे साथ.. कभी कभार....!! हो सकता है कभी कभार.... क्यूंकि ये मिलन तभी सम्भव है जब तुम स्वयं को भूलते हो... और उस क्षण तुम पाते हो कि तुम्हारा स्थान खाली है... भले ही क्षणिक हो ये पर तुमने सत्य देख लिया है... जैसे बांस कि खोखली बांसुरी और उसके भीतर से बह रहे संगीत का चमत्कार देख लिया है...! 
ये आकाश कि भांति एक एहसास है समस्वर होने के बाद भी लगता है वह नहीं है.. तुम भयभीत होते हो घबराते हो.. होता है ऐसा...!!! 

एक बात और.. अब मेरी उपस्थिति भी अनुपस्थित हो रही है..मैं हूँ भी नहीं भी...!!!
तुम जितने सजग हो रहे हो.. समर्थ हो रहे हो.. सफल हो रहे हो.. मैं शुन्य हो रही!!
बस एक स्वाद एक आभास हूँ.....!!

Thursday, November 10, 2011

ज़िन्दगी तेरी इबादत के तरफदार रहे
लाजिमी था कि मेरी राह दुश्वार रहे.

रो सके आप से लिपट कर न गले मिल पाए
ऐसे तलवार सा खिच जाना तो बेकार रहे.

अब मेरे शहर कि रस्मो का तकाजा है ये
दिल हो नाशाद पर मुस्कान असरदार रहे.

बस इसी जुर्म पे छीनी गयीं मेरी नींदें,
क्यूँ अंधेरों में मेरे ख्वाब चमकदार रहे.

है तेरी याद कि पुरवाई मयस्सर मुझको,
और होंगे जो  बहारों के तलबगार रहे.

Saturday, November 5, 2011

सारे जहाँ को रौशन कर सकते थे जिस शमां से हम..
झुलसा दिया गुलशन को , और खुद भी झुलस गए...!!!!
मुस्कान के इरादे अश्कों में ढल गए
आये बहार बन के खिज़ा बन के ढल गए.

हकीकत न जान पाए गम और खुशी कि हम,
थे गुल गले लगाये काँटों में छल गए.

डूबे कभी यादों में खोये कभी ख्वाबों में,

दो कलों में आज के बर्बाद पल गए.

नज़रें तो टिकीं हुईं थी चाँद और तारों पे,
खुद अपनी आँगन के ज़मीन पे फिसल गए.

दूर दूर तक खोजा करती हैं जिन्हें निगाहें
अफ़सोस बहुत पास से मेरे वो निकल गए.

मालूम न चल सका कब मौत आ गयी,
यूँ हौले हौले हाथों से बरसों नकल गए.