Wednesday, May 11, 2011

कहते हो नफरत है तहरीर से मेरे ....
फिर क्यूँ सजा रखे हैं तुमने ,
किताबों  की तरह..........
....................खतों को मेरे??? 

Friday, May 6, 2011



 बह रहा है पूर्वजो का रक्त मुझमे वास्तव में,
मानती थी मैं
स्वयं औरों को मनाने के लिए जाती समय पर.
मैं पृथक हूँ सभी से!

रे! उन्होंने तो लखा संकीर्ण स्वार्थी दृष्टि से
और सब हो गया उल्टा!
उनके निकट कुछ भी-
धन मान  योवन नहीं रक्षित! 

आज मैं जब हो रही कुछ कुछ व्यवस्थित
उन्ही के स्थान पर, और ह्रदय प्रेरणा देती लुभाती , कंपकंपाती
वृत्तियाँ निज देखती हूँ
तब प्रतिक्षण प्रश्न बस यह उठता 
क्या प्रीथक हूँ सभी से ?
पूर्णतः और सत्य ही! 

चल रही क्या नहीं मैं भी उन्ही के चरण चिन्हों पे?
प्रश्न उठते ही निरंतर जागता है 
गहन विश्वास!
खोखले मम - प्रश्न को
प्रतिध्वनित करती
चल रही नहीं  क्या मैं भी चरण चिन्हों पे उन्ही के!
बह रहा है रक्त आज भी पूर्वजो का मेरे, मुझमे!

Wednesday, April 13, 2011

NAARI...

हाड मांस की मैं हूँ नारी, नहीं बनी पत्थर की मूरत,
नहीं प्रदर्शन की वस्तु मैं, क्यों तकते हो मेरी सूरत?
प्रतिपल व्यूह रचा करते हो, छल छद्म के रहे हैं घेरे,
हर पल द्वन्द मचा करता है,दुश्प्रपंच के लगते फेरे.
तरुनाई में सूख गयी मैं, अरुणाई की आभा भूली,
कितने स्वप्न दिखे थे मुझको , कितने झूलों में मैं झूली!
नहीं अलगनी तेरे घर की, नहीं दीवारों की हूँ खूंटी,
जो तुमने वादे कर डाले, क्या वादे थे तेरे झूठी ?
अब तो हाल यही हैमेरा प्रश्न चिन्ह बन गया है फेरा....
दुःख कष्टों ने तन मन को, अब संग तेरे है कैसा घेरा....

Monday, February 28, 2011

खोल मन के नयन देखो
मैं तुम्हारे साथ ही हूँ!
आस्था हूँ
साधना हूँ
अर्चना
आराधना हूँ,
खोल मन के नयन देखो 
मैं तुम्हारी आत्मा हूँ.
अनल हूँ मैं 
अनिल हूँ मैं
व्योम हूँ जल स्रोत हूँ मैं,
श्वास हूँ
उच्छ्वास हूँ मैं,
प्राण बनकर तुम में निहित हूँ!
रम रही मैं तुम में अहर्निश
मैं कहाँ
तुमसे अलग हूँ?
वेदना की चोट से तुम जब व्यथित हो क्षुब्ध होते,
सांत्वना की रागिनी
मन में तुम्हारी छेदती हूँ!
अंश हो तुम सर्व हूँ मैं,
भ्रान्ति पट,
है बीच में
उस और तुम हो 
इस और मैं हूँ.
गहन अंतर में तुम्हारी
जल रहा जो धीर गति से
मैं वही हूँ दीप उसकी
ज्योति भी हूँ! खोल मन कनयन देखो
मैं तुहारे साथ ही हूँ!

Wednesday, September 8, 2010

मैं जात पात में, उंच नीच में , और फिकरो में बटी हुई...
जो धुंधला दे सच्चाई को दिल ऐसी गर्द से अटी हुई....
शिकवा नहीं जिस्म की माटी से , पर रूह भी अब बेताब नहीं....
तेरे हुक्म पे चलना एक तरफ , तेरा नाम भी लेना याद नहीं.......

Wednesday, August 25, 2010

.प्रिय...
सारी मुहब्बत ,सारे एहसास , लफ़्ज़ों में समां गए,
जब उनके ख्याल में कुछ लिखा हमने,
हवाओं से पता पूछा था,
चाँद से रौशनी मांगी थी,
उस राह क लिए
जो उनके घर जाती है,
बंद दरवाज़े पे छोड़ आये हैं हम
पैगाम अपना
दरवाज़े की झिरी से आती रौशनी के हाथ में
सलाम छोड़ आये हैं.
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तुम मेरी सबसे बड़ी शक्ति
और कमजोरी भी हो।
अकेलेपन में तुम्हारी यादों की तीस
जब मथती हैं तो अपना जीवन कितना कष्टप्रद लगता है
सच कहूँ तो आदत सी पद गयी है
रोज़ आँखें धुला कर सुलाती है तुम्हारी स्मृति.


लम्बे सफ़र में जाने कब शाम हो जाये
इसलिए यादो की चिरागों को जलाये रखते हैं ।

दूर रहते हुए भी गजब एहसास है करीब होने का
चाँद हम तो आपको पलकों में छुपाये रखते हैं ।

साथ गुज़ारे लम्हात की जुस्तजू में हम,
जुदाई की ज़ुल्मत को भी मिटाए रखते हैं।

ये तो बड़ी तोहफगी हुई आपकी यादों की,
ये आपकी नुमाइंदगी कर हमे ही बहलाए रखते हैं।

हम तो शाएरी बन गए हैं शाएर चाँद के
जो हमे शामो सहर जेहन में बसाये रखते हैं।

नज़रें मिलेंगी आपसे तो ज़मीन पे जन्नत उतर आएगा,
फिल हकीक़त है ये , इसलिए तो नज़रें झुकाए रखते हैं.

Tuesday, August 24, 2010

मेरे सपने में वो आयी
इठलाती बलखाती लो मुझे देख मुस्काई,
चन्दन सा वह गौर बदन, सरस सुमधुर बांकी चितवन ,
चेहरे की छटा का क्या कहना जैसे दिव्य ज्योति का जलना,
बालों में घटा लहराई थी हर और खुमारी छाई थी।
सपने में उसे देखा मैंने , बस नयन खुले और बोल पड़े ...
" रे दुष्ट! तू चाहता है क्या?
क्यूँ मुग्ध मुझे देखा करता?
तू समझ मुझे नहीं पायेगा।
सब खो के यहीं रह जायेगा"....
विस्मित सा मैंने सब देखा, संकोच छोड़ मैं बोल पडा
"मैं नहीं मुग्ध तेरे नयनो पे , हैं वे ही मुझे छेड़ा करते".....
प्रेम नहीं होता परिभाषित
रहता मात्र नयन में ,
मन वंतर संवत्सर वत्सर
कब बंधते लघु क्षण में
रहते सभी अनाम - न कोई कभी पुकारा जाता ,
रह जाती अभिव्यक्ति अधूरी ,
जीवन शिशु तुतलाता !!!!!!!

Monday, July 26, 2010

गाय के कच्चे दूध जैसे सादा हम....
और हमारे नीले नीले रिश्तेदार!!!!
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सर्पदंश का नीलापन तो सह्य है , स्वीकार भी...
पर स्म्रितिदंश का पीलापन???????
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कितनी जल्दी ये मुलाक़ात गुज़र जाती है,
प्यास बुझती नहीं की बरसात गुज़र जाती है.......
अपनी यादों से कह दो की यूँ न आया करे,
नींद आती नहीं की रात गुज़र जाती है.....