Thursday, July 28, 2011
Monday, July 11, 2011
AAS!!
झलक भर क्या देखा उनको
अल्फाज़ खुद ब खुद ग़ज़ल बन गए,
इस कदर बहते चले गए हम उनकी रौ में,
न खुद की खबर रही
न फिक्र ज़माने की.
अब तो आलम ये है की,
इक झलक उनकी देख लेने की
आस बाकी है.
वो आयें न आयें-
उनके आने की आस बाकी है!
Tuesday, June 14, 2011
राजनीति..
राजनीति सम्प्रदाए मुक्त हो तो यह शुभ है. पर धर्म शुन्य हो तो शुभ नहीं. धर्म जीवन का प्राण है. राजनीति जीवन कि परिधि से ज्यादा नहीं. और परिधि जैसे केंद्र को खोकर नहीं हो सकती है, वैसे ही राजनीति धर्म को खोकर राजनीति नहीं रह जाती.. "राज - अनीति" बन जाती है. और यह धर्म के अभाव में भी संभव है. और आज राजनीति वही हो के रह गयी है,...
हमने सुना कि एक सफल राजनीतिज्ञ, एक सफल चोर, और एक सफल वकील एक साथ स्वर्ग पहुंचे. वैसे भी तीनो मित्र थे.. हैं... इसलिए मृत्यु में साथ आये...तो कोई आश्चर्य नहीं.. स्वर्ग के देवता ने पूछा, " सच सच कहना कितनी बार झूठ बोला है?"
"३ बार महाराज" ... चोर ने कहा.. भगवन ने उसे दंड के तौर पे स्वर्ग के ३ चक्कर काटने को कहे. वकील ने कहा, "३०० बार ". वकील को भी तीन सौ चक्कर लगाकर स्वर्ग में घुसने कि आज्ञा मिल गयी.
लेकिन जब भगवन राजनीतिज्ञ कि और मुड़े तो राजनीतिज्ञ नदारद!!!
पास खड़े द्वारपाल से पूछा तो उसने कहा," महाराज वे अपनी साइकिल लेने गए हैं......".
Thursday, June 9, 2011
कुछ बिखरे हुए से सपने थे..
कुछ टूटी हुई सी यादें थीं ....
एक छोटा सा आसमान था, उम्मीदों कि एक ज़मीन थी.
ज़िन्दगी के तस्सवुर में यूँ था तो बहुत कुछ,
फिर भी हसरतों के जहाँ में कुछ कमी थी....
चंद लम्हे मिले तो एक वक़्त बना,
कुछ सुर सजे तो गीत बना,
और आपकी यादों में में ज़िन्दगी यूँ कैद हो गयी कि....
शब् - ए- गम के इक इक पल में भी मुहब्बत का निशान बन गया....
आइये अपने ख्वाबों को यूँ सजाएँ कि,
चाहत के रंग प्यार कि खुशबू , रिश्तों कि महक से खिल उठे ज़िन्दगी हमारी !!
Friday, June 3, 2011
दिल के आईने में उभरा प्रतिबिम्ब....
"दिल सोचने को बारहा मजबूर हुआ है, भीड़ का हर चेहरा क्यूँ मुझसे दूर हुआ है"
एक समय से सुबह उठने पर ये ख्याल आता है की चिर निद्रा क्यूँ नहीं आई? मेरे बाद शायद दुनिया ही सुधर जाए.
मैं तो अनामे ढंग से दुनिया के जंगल में उग आई,. तपती धुप से बचने के लिए लोगों ने मेरी छाओं के तले विश्राम किया और दो चार कुल्हाड़िया भी मार के चले गए. मैं कल रहूँ या न रहूँ, मेरी आवाज़ ही पहचान है गर याद रहे....अब तो तन और मन दोनों ही थक गए हैं, मन की थकन ज्यादा खतरनाक होती है.
मैं तो सबके लिए एक खाज की तरह फालतू और निरर्थक व्यक्ति नहीं वस्तु हूँ. बाहर से जो भी मेरा सम्मान हो.... लेकिन सूर्य की जिन बाल किरणों का स्पर्श पा कर कमल खिलता है और सूर्य के डूबते ही जो मुंद जाता है , वे ही उसे झुलसा डालती हैं....जब..... जब कीचड में उसकी जड़ें कट जाती हैं. यह राम चरित मानस में कहीं तुलसीदास ने लिखा है, "सो जड़ विहीन मैं".....
ज़िन्दगी आंसुओं में बह गयी,कोई किनारा न मिला....
कह सकूँ जिसे अपना, वो सहारा न मिला....
Friday, May 6, 2011
बह रहा है पूर्वजो का रक्त मुझमे वास्तव में,
मानती थी मैं
स्वयं औरों को मनाने के लिए जाती समय पर.
मैं पृथक हूँ सभी से!
रे! उन्होंने तो लखा संकीर्ण स्वार्थी दृष्टि से
और सब हो गया उल्टा!
उनके निकट कुछ भी-
धन मान योवन नहीं रक्षित!
आज मैं जब हो रही कुछ कुछ व्यवस्थित
उन्ही के स्थान पर, और ह्रदय प्रेरणा देती लुभाती , कंपकंपाती
वृत्तियाँ निज देखती हूँ
तब प्रतिक्षण प्रश्न बस यह उठता
क्या प्रीथक हूँ सभी से ?
पूर्णतः और सत्य ही!
चल रही क्या नहीं मैं भी उन्ही के चरण चिन्हों पे?
प्रश्न उठते ही निरंतर जागता है
गहन विश्वास!
खोखले मम - प्रश्न को
प्रतिध्वनित करती
चल रही नहीं क्या मैं भी चरण चिन्हों पे उन्ही के!
बह रहा है रक्त आज भी पूर्वजो का मेरे, मुझमे!
Wednesday, April 13, 2011
NAARI...
हाड मांस की मैं हूँ नारी, नहीं बनी पत्थर की मूरत,
नहीं प्रदर्शन की वस्तु मैं, क्यों तकते हो मेरी सूरत?
प्रतिपल व्यूह रचा करते हो, छल छद्म के रहे हैं घेरे,
हर पल द्वन्द मचा करता है,दुश्प्रपंच के लगते फेरे.
तरुनाई में सूख गयी मैं, अरुणाई की आभा भूली,
कितने स्वप्न दिखे थे मुझको , कितने झूलों में मैं झूली!
नहीं अलगनी तेरे घर की, नहीं दीवारों की हूँ खूंटी,
जो तुमने वादे कर डाले, क्या वादे थे तेरे झूठी ?
अब तो हाल यही हैमेरा प्रश्न चिन्ह बन गया है फेरा....
दुःख कष्टों ने तन मन को, अब संग तेरे है कैसा घेरा....
Monday, March 14, 2011
Tuesday, March 1, 2011
Monday, February 28, 2011
खोल मन के नयन देखो
मैं तुम्हारे साथ ही हूँ!
आस्था हूँ
साधना हूँ
अर्चना
आराधना हूँ,
खोल मन के नयन देखो
मैं तुम्हारी आत्मा हूँ.
अनल हूँ मैं
अनिल हूँ मैं
व्योम हूँ जल स्रोत हूँ मैं,
श्वास हूँ
उच्छ्वास हूँ मैं,
प्राण बनकर तुम में निहित हूँ!
रम रही मैं तुम में अहर्निश
मैं कहाँ
तुमसे अलग हूँ?
वेदना की चोट से तुम जब व्यथित हो क्षुब्ध होते,
सांत्वना की रागिनी
मन में तुम्हारी छेदती हूँ!
अंश हो तुम सर्व हूँ मैं,
भ्रान्ति पट,
है बीच में
उस और तुम हो
इस और मैं हूँ.
गहन अंतर में तुम्हारी
जल रहा जो धीर गति से
मैं वही हूँ दीप उसकी
ज्योति भी हूँ! खोल मन कनयन देखो
मैं तुहारे साथ ही हूँ!
Wednesday, September 8, 2010
Wednesday, August 25, 2010
.प्रिय...
सारी मुहब्बत ,सारे एहसास , लफ़्ज़ों में समां गए,
जब उनके ख्याल में कुछ लिखा हमने,
हवाओं से पता पूछा था,
चाँद से रौशनी मांगी थी,
उस राह क लिए
जो उनके घर जाती है,
बंद दरवाज़े पे छोड़ आये हैं हम
पैगाम अपना
दरवाज़े की झिरी से आती रौशनी के हाथ में
सलाम छोड़ आये हैं.
*****************
तुम मेरी सबसे बड़ी शक्ति
और कमजोरी भी हो।
अकेलेपन में तुम्हारी यादों की तीस
जब मथती हैं तो अपना जीवन कितना कष्टप्रद लगता है
सच कहूँ तो आदत सी पद गयी है
रोज़ आँखें धुला कर सुलाती है तुम्हारी स्मृति.
सारी मुहब्बत ,सारे एहसास , लफ़्ज़ों में समां गए,
जब उनके ख्याल में कुछ लिखा हमने,
हवाओं से पता पूछा था,
चाँद से रौशनी मांगी थी,
उस राह क लिए
जो उनके घर जाती है,
बंद दरवाज़े पे छोड़ आये हैं हम
पैगाम अपना
दरवाज़े की झिरी से आती रौशनी के हाथ में
सलाम छोड़ आये हैं.
*****************
तुम मेरी सबसे बड़ी शक्ति
और कमजोरी भी हो।
अकेलेपन में तुम्हारी यादों की तीस
जब मथती हैं तो अपना जीवन कितना कष्टप्रद लगता है
सच कहूँ तो आदत सी पद गयी है
रोज़ आँखें धुला कर सुलाती है तुम्हारी स्मृति.
लम्बे सफ़र में जाने कब शाम हो जाये
इसलिए यादो की चिरागों को जलाये रखते हैं ।
दूर रहते हुए भी गजब एहसास है करीब होने का
चाँद हम तो आपको पलकों में छुपाये रखते हैं ।
साथ गुज़ारे लम्हात की जुस्तजू में हम,
जुदाई की ज़ुल्मत को भी मिटाए रखते हैं।
ये तो बड़ी तोहफगी हुई आपकी यादों की,
ये आपकी नुमाइंदगी कर हमे ही बहलाए रखते हैं।
हम तो शाएरी बन गए हैं शाएर चाँद के
जो हमे शामो सहर जेहन में बसाये रखते हैं।
नज़रें मिलेंगी आपसे तो ज़मीन पे जन्नत उतर आएगा,
फिल हकीक़त है ये , इसलिए तो नज़रें झुकाए रखते हैं.
इसलिए यादो की चिरागों को जलाये रखते हैं ।
दूर रहते हुए भी गजब एहसास है करीब होने का
चाँद हम तो आपको पलकों में छुपाये रखते हैं ।
साथ गुज़ारे लम्हात की जुस्तजू में हम,
जुदाई की ज़ुल्मत को भी मिटाए रखते हैं।
ये तो बड़ी तोहफगी हुई आपकी यादों की,
ये आपकी नुमाइंदगी कर हमे ही बहलाए रखते हैं।
हम तो शाएरी बन गए हैं शाएर चाँद के
जो हमे शामो सहर जेहन में बसाये रखते हैं।
नज़रें मिलेंगी आपसे तो ज़मीन पे जन्नत उतर आएगा,
फिल हकीक़त है ये , इसलिए तो नज़रें झुकाए रखते हैं.
Tuesday, August 24, 2010
मेरे सपने में वो आयी
इठलाती बलखाती लो मुझे देख मुस्काई,
चन्दन सा वह गौर बदन, सरस सुमधुर बांकी चितवन ,
चेहरे की छटा का क्या कहना जैसे दिव्य ज्योति का जलना,
बालों में घटा लहराई थी हर और खुमारी छाई थी।
सपने में उसे देखा मैंने , बस नयन खुले और बोल पड़े ...
" रे दुष्ट! तू चाहता है क्या?
क्यूँ मुग्ध मुझे देखा करता?
तू समझ मुझे नहीं पायेगा।
सब खो के यहीं रह जायेगा"....
विस्मित सा मैंने सब देखा, संकोच छोड़ मैं बोल पडा
"मैं नहीं मुग्ध तेरे नयनो पे , हैं वे ही मुझे छेड़ा करते".....
इठलाती बलखाती लो मुझे देख मुस्काई,
चन्दन सा वह गौर बदन, सरस सुमधुर बांकी चितवन ,
चेहरे की छटा का क्या कहना जैसे दिव्य ज्योति का जलना,
बालों में घटा लहराई थी हर और खुमारी छाई थी।
सपने में उसे देखा मैंने , बस नयन खुले और बोल पड़े ...
" रे दुष्ट! तू चाहता है क्या?
क्यूँ मुग्ध मुझे देखा करता?
तू समझ मुझे नहीं पायेगा।
सब खो के यहीं रह जायेगा"....
विस्मित सा मैंने सब देखा, संकोच छोड़ मैं बोल पडा
"मैं नहीं मुग्ध तेरे नयनो पे , हैं वे ही मुझे छेड़ा करते".....
Tuesday, July 27, 2010
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