Sunday, September 1, 2013

उम्र के इक मोड पर आपकी जिंदगी में सबकुछ बदल जाता है... सिर के बाल सफ़ेद होने लगते हैं.. रगें ढीली पड़ जाती है... वेस्ट -लाइन चौड़ी हो जाती है... आप पर औरों का और आपका अपने आप पर विश्वास घटने लगता है ..आप हार्ट अटैक से डरने लगते है और इस उम्र में एक ई. सी.जी. करवा ही लेते हैं... आपकी लड़की ने जवानी में कदम रख दिया है, और उसके कुवान्रेपन को लेकर आप सजग हो उठते हैं.. जीवन की जितनी अभिलाषाएं थीं और आप सोचते थे कि पूरी हो जाएँगी एकाएक आपको लगता है कि अब मुमकिन नहीं.. जैसे आपके जीवन में शाम शुरू हो गयी और अब रात का इन्तेज़ार है...

* (जिन्होंने इस उम्र को छुआ नहीं  वे इसकी भयानकता नहीं सोच सकते...)
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"हद है ... चच्चा जी.. इस उम्र में भी आपको आशिकी सूझ रही है वो भी 'टीन-एजर्स ' वाली..."

Monday, August 5, 2013

इंसान को प्रकृति का सबसे बड़ा उपहार है - दर्द! 
क्यूंकि दर्द ही व्यक्ति में स्नेह और करुणा को जाग्रत करता है... और यही स्नेह और करुणा मानवीय चेतना के द्वार खोलते हैं
चुप्पी, केवल शब्दों में नहीं, विचारों में भी ज़रूरी है...|
बाहर से शांत और भीतर 'जलते' रहने से कुछ भी हासिल नहीं....

'मौन' , अर्थात मौखिक और वैचारिक शांति.......!
सुबह हम जागते थे और, उसे हम याद करते थे ,
...............अकेले बैठ के वीरान दिल आबाद करते थे.....
अक्सर दिल प्यार में पड़ना चाहता है और दिमाग को इस बात का विश्वास दिला देता है कि वह प्यार में है... प्यार में पड़ने की अवधारणा इतनी लुभावनी होती है कि दिमाग भी दिल के आदेश को मानता है... पर अक्सर (सभी केसेज़ में नहीं) प्यार कुछ नहीं है बस 'दिमाग' की एक परिवर्तित स्थिति है, कारण सीधा है, जब दो लोग प्यार करते हैं ,घंटो बातें करते हैं ,साथ रहते है , सारी बातें शेयर करते हैं, लड़ते हैं झगड़ते है , तो धीरे धीरे दिमागी परिवर्तन फिर होता है और कभी -कभी तो ऐसा होता है कि उस व्यक्ति से नफरत सी हो जाती है..
अब सोचिये जिसके लिए दिल धडकता था उस व्यक्ति से घृणा कैसे हो सकती है? और केवल घृणा नहीं बल्कि व्यक्ति चाहता है कि 'उस' व्यक्ति को तरसता तडपता हुआ देखे.

उफ्फ्फ...... जो दिल प्रेम करता है उसके मन में दुर्भावनाओ का कोई स्थान नहीं होता...
समुद्र को जलाना संभव नहीं..... !
इसे जमा सकते हैं वाष्पीकृत कर सकते हैं, पानी का रूप बदल सकते हैं 'स्टेट' बदल सकते हैं... अस्तित्व नहीं मिटा सकते. प्यार करने वाले पे आप क्रोध कर सकते हैं पर घृणा नहीं...अप्रिय जगह के लिए कोई स्थान नहीं.

अक्सर प्यार दिमागी स्थिति है .. पर सच्चा प्रेम है तो आपको सिर्फ दिलो-दिमाग ही नहीं बल्कि प्रकृति की सारी शक्ति उसको पोषित करने में सहायता करती है...जहाँ प्रेम है वहाँ नकारात्मक भाव अपना ज़हर नहीं फैला सकते...!
बात-बेबात तेरी आँखें भर आती होंगी,
और तू अपना चेहरा बाजुओं में छुपाता होगा....
...........जब भी मेरा ज़िक्र कहीं आता होगा.......!

Sunday, July 7, 2013

अबके बरस भेज भईया को बाबुल

बीते रे जुग कोई चिट्ठिया ना  पाती
.............ना कोई नैहर से आये...!

इन दो सालों में हमे  पहली बार ऐसा लगा कि हमारा बचपन खो गया है..... संगी साथी , खेल-खिलोने सब बीते दिनों की बातें लगने लगीं... घर दूर दूर होता जा रहा है. दो सालों में हम डाल्टनगंज (मायका) सिर्फ शादी ब्याह में जा रहे हैं... वहाँ दस- पन्द्रह दिनों की मौज मस्ती होती है, नाच गाने , उत्सव-उत्सव-उत्सव... खूब काम होते हैं और  सब के सब बिजी.... ना तो अच्छे से माँ- चाची से बात-चीत हो पायी ना भाई बहनों के साथ गप-शप, ना सहेलियों दोस्तों का जमावड़ा रहा ना छत में धमाचौकड़ी हो पायी....  लड़ना झगडना , रूठना मनाना इन सब के बिना कुछ खाली खाली सा  लगा...
....बैरन जवानी ने छीने  खिलौने
और मेरी गुडिया चुराई.....

एक बार मन  हो रहा कि हम फुर्सत में घर जाएँ.. खूब बातें करें सबसे... अपनी पसंद की चीज़ें खाए... वहाँ की गलियों में  घूमे....  हमउम्र भाई- बहनों दोस्तों के साथ खेलें... अपने लगाये पौधों को सींचे... टायर के झूलों में झूलें, पड़ोस के बगीचे के अमरुद चुराए, उनके फूल तोड़ कर भाग जाएँ... अपने कमरे की सफाई करें... छुपाई चीज़ों को फिर से खोजें... सबको दिखाएँ.. पुराने ग्रीटिंग कार्ड और खतों को निकाल कर फिर से पढ़े... फिर से वही वही शरारतों को दुहरायें जिनसे खूब हमारी क्लास ली जाती थी... और फिर से मम्मी अपने हाथों से रोटियों के कौर मेरे मुह में डालती जब हम असाइनमेंट पूरा कर रहे होते...
घर जाना चाहते हैं....!

"अबके बरस भेज भईया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाये...."

Friday, June 28, 2013

आदमी के बदन पर दो गज कपडे की तरह है औरत...जिस दिन यह कपडा फटा आदमी क्या पूरा घर नंगा हो जाएगा...|
हर मोर्चे पे अकेले संघर्ष करती लडती औरत.... ! तकलीफ में भी होती हैं तो कभी चौराहे पे जा कर नहीं रोती... घर के उस कोने में जा के रोती है जहाँ कोई देख न पाए....!

.....औरत का छिप कर रोना, सिर्फ रोना नहीं , एक लोक गीत है जो ज़िन्दगी की तपिश, आवाज़ और लय से निकले आदमी को आदमी और घर को घर बनाये रखने का एक जज्बाती सलीका है.... हुनर है.... एक कला है.....!

Thursday, June 27, 2013



"रब दा की पाना....
एथों पुटिया ते एथे लाना...."
- बुल्लेशाह.

(परमात्मा को क्या पाना है? यहीं से उखाडना है यहीं लगाना है. मतलब, यहीं बैठा है यहीं लाना... रब नहीं खोया कहीं बस उसकी याद खो गयी है...इक बूँद की पहचान हो तो सब सागर की पहचान हो जाए.
क्या दुनिया...? क्या भीड़-भाड़..? बस प्यासों की कतारों पर कतारें....... यह संसार!!
अब झांको खुद में....)

Tuesday, June 25, 2013

मित्रत्व

रामकृष्ण की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी शारदा देवी से  विवेकानंद जी आज्ञा मांगन गए कि वे अमरीका  जाना चाहते हैं और उनसे आशीष मागने आये हैं. शारदा जी ग्रामीण महिला थीं, सो विवेकानंद जी ने सोचा भी नहीं कि आशीष/ आज्ञा देने में इतना सोच-विचार करेंगी.  शारदा जी ने उन्हें नीचे से ऊपर और से देखा और कहा, 'सोच के बताउंगी...' और खाना बनाने में तल्लीन हो गयीं.
"सिर्फ शुभाशीष चाहता हूँ, मंगलकामना तुम्हारी कि मैं जाऊं और सफल होऊ.." स्वामी जी बोले.
थोड़ी देर बाद शारदा जी ने उन्हें निरखा और कहा, "नरेन्द्र, वो छुरी देना......"
नरेंद्र छुरी उठा के शारदा के हाथ में पकडाते हैं,  शारदा प्रसन्न हो आशीष देती हैं और कहती हैं "हर क्षेत्र में सफल हो  नरेन्द्र.."

स्वामी जी अवाक, पूछते हैं कि," छुरी में और तुम्हारे आशीष में कोई सम्बन्ध था क्या?"
शारदा ने कहा ,"हाँ सम्बन्ध था , मैं देखना चाहती थी कि तुम छुरी कैसे पकडाते हो.. मूठ तुम पकड़ते हो या फलक पकड़ते हो? और जैसा मैंने सोचा तुमने फलक पकड़ के मूठ मुझे धराया , आमतौर पर लोग मूठ पकड़ते हैं. तुमने मेरी सुरक्षा की फिक्र करते हुए खुद को असुरक्षा में डाला. तुमने अपने चारों और के जीवन की सुरक्षा को महत्व दिया इसलिए,
तुम्हारे मन में मैत्री का भाव है, तुम जाओ तुम्ही  से कल्याण होगा, मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है..."

(एक छोटी सी घटना है ये, जिसमे मैत्री प्रकट होती है , साकार बनती है. सौ में  से निन्यानबे मौके पर कोई भी मूठ पकड़ेगा तो वह सहज होया , उसके लिए आत्मरक्षा सहज होगी... और मैत्री आत्मरक्ष से  ऊपर उठ जाती है.. मैत्री का अर्थ ही है 'सक्रीय करुना' एक्टिव कम्पेशन ...! अत: मैत्री सिर्फ मित्रता (फ्रेंडशिप) नहीं, बल्कि फ्रेंडलिनेस (मित्रत्व) है. मित्रता और मित्रत्व में सबसे बड़ा फर्क यही है कि मित्रता जब तक  है शत्रुता भी है यानी जिनके मित्र हैं शत्रु भी हैं, मित्रत्व यानी शत्रुता या बैर- भाव का तिरोहित हो जाना... बस)

Monday, April 29, 2013

प्रेम की परिभाषा

लड़का : सुख क्या है? शांति किसे कहती हो? और प्यार की परिभाषा क्या है?

लड़की : सब कुछ परिभाषा के दायरे में नहीं.....!

लड़का : जानती हो. मैंने इन सब को समझने के लिए कई किताबें घोट डाली... धर्म शास्त्र से ले कर काम शास्त्र तक.. मंदिर से वेश्यालय तक का सफर किया...शराब की बोतलें औरतों का बदन मुझे इन तक नहीं पहुंचा पाया..मेरा जीवन खत्म होने जा रहा है और अब तक सुख शांति प्रेम को ना समझ सका.. तुम समझा सकोगी? क्यों कि मेरे लिए सबसे ज्यादा मायने  तुम रखती हो भले ही ये दो दिन की पहचान है.... मदद करो!

लड़की: ...............................

लड़का: देखो............!

लड़की :ये क्या है? फिर से ...................... उफ्फ्फ ????????

लड़का :छोड़ नहीं पा रहा........ सुनो... देखो.... महसूस करो...

'आह... मीलों तक बर्फ ही बर्फ...उस पर चन्द्रमा की किरने...रात बढ़ रही है सब सो रहे हैं.... पेड़ पौधे नदी नाले... सब.. मैं.. तुम....आह!
देखो... सीमाहीन समुद्र... लहर पे लहेर डूबती लहरों की चीख के अलावा कुछ नहीं...
सुनो रात झुक रही है, ज़मीं शांत हो रही है... सिर्फ एक आवाज़ दूर से आ रही है.. तुम्हारा नाम!!
उफ्फ्फ....... '
मेरी मुहब्बत डूब गयी फिर से............ !!
अब सब खामोश हैं.... सब कुछ ... वक्त की धडकन बंद हो गयी फिर से.....!

- कल कोई और पूछेगा प्रेम की परिभाषा... पर उत्तर...........

Wednesday, October 3, 2012

तुम्हारी स्मृतियों में एक जकड़ीली टेर है....
एक आमंत्रण............
स्थिति के भवंर में थरथराती हर स्मृति...!
इनके सानिध्य में अकेले जा बैठने का लालच,
मन में लपलपाया करता है...!
इन्हें प्यास का पर्याय मान कर संजोया है...
दुलारते -मनुहारते हुए...
टेरते-सहलाते हुए...!
एक अदीन कामना का उत्ताप..
एक सिंकी सी आश्वस्ति कि, जो कुछ है वह तुम्ही से सम्बंधित है....!
"एक मुझ अकेली के मन की सुंदरता पर आसक्त है..........."

Tuesday, October 2, 2012

खंडहरों में दीप मेरा जल रहा है.....
विजनता की विषमता को छल रहा है.....!

कह रहा गुजरी कहानी आज रोकर,
भूल में ही प्यार का संगीत होकर...!
श्वास फूले जा रहे हैं मार्ग में ही,
हांफता है साधना का दंभ खोकर!
मिट गयी है क्या मेरी आराधना,
मुक्ति का यह दीप कैसा खल रहा है....?

खंडहरों में दीप मेरा जल रहा है......!
प्रतिपल पाना प्रतिपल खोना
कैसा हंसना कैसा रोना..?
मर-मर होता रोता , जीवन-
का यह कोना कोना....|
साथ जुटाया, मोह जगाया..
फिर भी रहा अकेला.....
हाथ झाडकर चला मुसाफिर,
पास ना कौड़ी -धेला.....|
मानव चला अकेला...............!!
एक गुड- गूंगा स्वाद............!
जिसमे से बार- बार गुज़रा जा सकता है...
रात-बेरात...... आगे-पीछे....
देशकाल की सीमाओं को अंगूठा दिखाकर...|
यह सुख 'अभी-अभी'... 'कभी-कभी'... 'कभी नहीं ' भी हो सकता है...|
.. या उदासी का कोई चीथड़ा उसे अपनी
फडफडाहट में बाँध देता है.....

"इस अनुभव से गाहे-बगाहे गुज़रती हूँ...
फिर अक्सर , स्मृतियों के सहारे अपनी निजता को लौटती हूँ..."
तुम्हे याद करते समय , मन में एक दर्पण सा जगमगाने लगता है.....|
यह एक दूसरा संसार है जो तरल होकर,
मेरे बंद दरवाज़ो की दरारों के नीचे से घुस जाता है..
और मेरे सजे-धजे घर को गीला-सीला कर जाता है....!
"और इनमे से गुज़रती मैं पस्त- ध्वस्त सी हो उठती हूँ......"!!
माँ से पिट कर आई उस लड़की के चेहरे पर 
दर्द का नामोनिशान ना देखा मैंने..
हांफती हुई वह कह रही थी,
" दीदी ..दीदी.. मेरी माँ तो पूरी पागल है 
मुझे पीटते वक्त जो उसका 'झोंटा' खुल जाता है ना,
तो एकदम चुड़ैलों जैसी लगती है- साक्षात!
-पिट रही हूँ इस बात का ध्यान भी नहीं होता.." 

वह रोज ही माँ से पिट कर आती...
बकौल उसके, उसकी माँ को उससे बैर है...|

जानते हैं क्यूँ.......?
-क्यूंकि जब वो पैदा हुई थी , उसके आगे वाला भाई
हैजे से मर गया था..
जिसके हिसाब से यह इसके अशुभ पदार्पण की छाया थी...|
शून्य के दुर्गम विलय में झाँक कर,
नियति विहंसी मूल्य उसका आंक कर..|
कांपती है ज्योति की नन्ही शिखा,
थक चुका है प्राण वैभव मांग कर....|
जगमगा के बुझ गयी दीपावली,
अब अभागा यह अकेला जल रहा है......|
खंडहरों में दीप मेरा जल रहा है.............!!!
सरकार....! सरकार.....! सरकार...............!
सरकार में रहें तो सरकार.....
सरकार के बाहर हैं तो सरकार...........
सरकार नहीं तो सरकार की आँख..............!!

बस्स............ सब फेर बदल की सहूलियत में हैं...............
तिस पर सुरक्षा का सनातन छाता ताने बैठा है.......!
सरकार कुछ कर नहीं सकती.. फिर भी बात मनवाए चली जाती है....
क्यु ना हो देश की ताकत जो साथ है........!!
ये क्या है जो मुझे जीते -जागते...
यहाँ बैठे -बिठाए, टेर ले जाता है...
खींच ले जाता है मेरी जीवनी-शक्ति....
क्षण भर में मैं निरीह- निस्तेज सी लगने लगती हूँ.........!
और चेहरा ऐसे धुआं -धुआं जैसे ,
'भाप की दीवार के पीछे का दर्पण...'.... !!!