Monday, January 15, 2018

नाम में क्या रखा है...!

नाम में क्या रखा है...?
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कई नाम समय सापेक्ष होते हैं अस्थाई। आगे चल कर बस ध्वस्त हो जाते हैं साहेब,  जैसे "सुंदरी.... मोहिनी,  शोभा, गुडिया, बेबी, डौली, सुन्दर,  मोहन, गुड्डू, सोनू आदि..।" ये सब नाम ऐसे ही श्रेणी में आते हैं, बस ज़ुबान पर चढ जाते हैं अपनी पूरी निरर्थकता के बावजूद। एक समय के बाद जब नाम वालियां/वाले  सूखने लगती हैं किसी बगिया की तरह, फिर ना मेक-अप मदद करता है ना फैशन। पहले  त्वचा मुरझाती है, फिर आँखे, फिर बाल, अंत में एक एक अवयव सिकुड कर कूच करता जाता है। फिर इस बुढापे में ना आप मोहिनी रहेंगे ना मोहित, ना गुडिया, ना गुड्डू।

फिर भी नाम में क्या रखा है....!

" हमने तो शादी भी कर डाली साहेब नाम के चक्कर में। नाम ही पसंद आ गया कि बिना देखे-सुने-गुने पढ़ाई लिखाई छोड़ ब्याह  ही कर लिया....।"😊

फिर भी..... नाम मे क्या रखा है!
अरे....
-नाम क्या है...?
-यही ज़ालिम तो सबकुछ है....!!

मकर संक्रांति

पिता के घर मे पुत्र तो अक्सर रहते ही हैं। मज़े की बात ये के गर्व से पिता जाए पुत्र के घर में रहने और पिछले एक महीने के सारे पेंडिंग शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाये। इससे शुभ क्या होगा भला..?
जी हाँ! सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मकर में आज रहने जाएंगे और खरमास से बंद पड़े शादी विवाह सहित अनेक शुभ कार्यों की शुरुआत कल से हो जाएगी। ये है मकर संक्रांति का महत्व, बिल्कुल प्रैक्टिकल सा..!
ये संक्रांति सब के लिए शुभ हो और जीवन में  खुशहाली, स्वास्थ, प्रेम और समृद्धि की बढ़ोत्तरी हो!
बड़ो को आदर, छोटों को स्नेह के साथ मकर संक्रांति की शुभकामनाएं!

Tuesday, October 10, 2017

पटाखे

मैं 5 साल की थी उस दीवाली में। अन्य बच्चों के साथ फुलझड़ी और चरखी का मज़ा लेते हुए चहक रही थी। बड़े बच्चे 'बीड़ी बम', 'मिर्ची बम' आदि फोड़ रहे थे। चाचा को बम का पैकेट पास करते हुए मेरे हाथ की फुलझड़ी लगी और एक बम हाथ मे फट गया। मेरी हथेली देखने लायक नही बची थी। दूसरे साल मेरे भाई ने अधजले पटाखे को हाथ लगाया ही था फट पड़ा। फिर वो दीवाली भी गयी।उस दिन से आज तक मैंने दीवाली में फुलझड़ी तक को हाथ न लगाया। पटाखों की आवाज़ से ही डरती हूँ। मैं आसपास नही फटकती। रॉकेट अनार इत्यादि भी नही देख पाती। लोग मुझे डरपोक कहते हैं, कहते रहें। मैंने झेला है, मैं जानती हूँ! पटाखों पर बैन कभी कभी सुकून देता है।
ये फेसबुक पर जो पटाखों को लेकर '***रोना' चल रहा न, उन्हें एक ऑफर देना चाहती हूँ। कम्पनी की तरफ से और एक दोस्त की तरफ़ से पटाखों के दो तीन बड़े बड़े गिफ्ट पैक मिले हैं। और यहां के पटाखे तो फेमस हैं ही। जिन्हें चाहिए मैं उन्हें शुभकामनाओं के साथ भेज दूंगी। वरना हर साल मैं पानी में डाल देती हूँ।

हैप्पी दीवाली इन एडवांस!!

Wednesday, October 4, 2017

नागपंचमी

कहते हैं रावण ने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए नागों को परास्त किया था जिनमे तक्षक और वासुकि भी थे। बाद में नागवंश की स्थापना हुई जो उस समय केरल , तमिल नाडु और श्रीलंका तक थी। ये वंश भी चार उपवंशों में है। जहां अलग अलग नागों की पूजा होती है। और इसी के बाद श्रावण शुक्ल पक्ष पंचमी को नाग पूजा का प्रचलन शुरू हुआ।
हनुमानजी ने लंका जाने की जो उड़ान भरी थी वो नागप्रदेश से होकर ही था। वहां उनकी मुलाकात नागमाता सुरसा से हुई थी। नाग को कुल देवता बना पूजने वाले नागवंशी वैसे तो पूरे भारत मे हैं पर सबसे ज़्यादा केरल, कर्नाटकके कुछ भाग और तमिल नाडू में हैं।
आप दक्षिणभारत में कहीं भी घूम लीजिये, पीपल के नीचे नाग नागिन की मूर्तियां ज़रूर दिखेंगी। ये वस्तुतः कालसर्प दोष निवारण के लिए ये मूर्तियां स्थापित कराई जाती हैं। दक्षिण भारतीय सामान्यतः सांप नही मारते। आज कई जगह नाग पंचमी पूजा देखने का अवसर मिला। कई मंदिरों में सांप की बाम्बी तथा मैदान बगीचों में सांप की बांबी के पास पूजन हुए थे। भोग प्रसाद में अधिकतर दूध, अंडे, लावा, और लड्डू थे।

एक दिलचस्प वाक़या मैं बताती हूँ। सोमवार को कहीं जा रही थी रास्ते में बहुत से लोग लाठी डंडे के साथ हो हल्ला करते दिखे। मैं आगे जाकर एक आदमी से पूछी कि क्या हुआ तो उसने एक सर्प को दिखाया जो किसी गाड़ी के नीचे आ कर मर गया था और वे लोग उसकी बॉडी लेने के लिए झगड़ रहे थे। ये नागवंश से जुड़ी हुई जाति थी और इनका मानना है कि श्रावण में मरे सर्प का अंतिम संस्कार करना पुण्यदायी होता है और वहभी सोमवार को और कालसर्प दोष हो या अकाल मृत्यु इनसब से उबर जाते हैं।
ख़ैर अपनी मान्यताएं और अपना महोत्सव!
उत्सवों और शुभकामनाओं के लिए जितने भी दिन हों कम हैं।

Wednesday, May 17, 2017

अंग्रेज़ियत

हॉस्पिटल कैंटीन में दो जूनियर डॉक्टर्स बड़ी मासूम टाइप एक सीरियस टॉपिक पे बतिया रहे थे। उनका कहना ये था के फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलने वाली लड़कियां स्मार्ट लगती हैं लेकिन एक्सेंट इंडियन न हो तब। अपने स्टेट्स और रीजनल भाषा बोलने वाली इम्प्रेस नहीं कर पातीं। और अंग्रेज़ी बोलने के बाद जवाब अगर उनकी लोकल लैंग्वेज में आए तो वे महा गंवार लगती हैं।
मुझसे रहा नही गया और मैंने इंटरप्ट करने की सोची। मैं पास जाकर बोली, " एक्सक्यूज़ मी, कैन आई आस्क यू समथिंग...?"
उसने कहा, " यस मैम, हाऊ कैन आई हेल्प यू..?"
तभी उसके एप्रन पर मेरी नज़र गयी। उसका नाम था बी. के. झा। मेरे दिमाग मे आया 'झा' सरनेम मतलब बिहारी!
मैं थोड़ा करीब गयी और धीरे से कहा, " हई दुवार से बाएं जाइब त बहरी निकल जाइब न बाबू.."
उनका चेहरा  सरप्राइज़्ड था, मुँह खुला। मैं तेज़ी से आगे बढ़ गयी। दरवाज़े के पास जाकर पलटी, वे दोनों मुझे ही झेंपकर देख रहे थे। मैं बहुत ज़ोर से हंसी और कहा, ' कल मिलती हूँ इसी जगह इसी टाइम पे...' 😊
अबकी हंसी में दोनों डॉक्टर्स भी शामिल थे।

Monday, April 10, 2017

दादी

बचपन को याद करें तो अक्सर  हमारे घर में मीठी चीज़ें बनायीं जाती थीं..... जिनमे गुड के पुए भी बनते थे भोग लगाने को, दादी बनाती या बनवातीं थीं. आज के दिन हम जब भी घर से बाहर रहे दादी को खूब याद किया है बल्कि इन दिनों हफ्ते भर से दादी याद रही सोते जागते... :(

एक वाकया बताते हैं बचपन का, जो कई दिनो से शेयर करना चाहते थे... Daltonganj  में दादी हमे  लेकर छे-मुहान वाला काली मंदिर जाया करती थीं रोज़ शाम की आरती में.... वो पूजा पाठ करतीं हम खेलते रहते .. नारियल और पेडे खाते.....  उस दिन भी शाम की आरती में गए, दादी व्यस्त रहीं पूजा में , बहुत देर भी हो रही थी मंदिर में कम लोग बचे थे .. पूजा समाप्ति पर दादी जैसे ही माथा टेकने झुकीं हम उनके ऊपर बैठ गए, हाथ में छड़ी थी उठा के चिल्लाये "मैं बारूद के गोले पे बैठ कर आग लगा लुंगी, मगर अपने जीते जी अपनी झाँसी छोड़ कर नहीं जाउंगी...." ..
उसके बाद न पूछिए क्या हुआ, दादी झटके से उठीं और उस वक़्त साक्षात काली का अवतार लग रही थीं... बहुत पिटाई हुई.... बहुत!
छेमुहान से जेलहाता कुटाते पिटाते पहुंचे थे.... आज भी इस घटना को याद करने में पीठ में दर्द  होता है.. आंसू आते हैं हंसी आती है... अच्छा लगता है .. फिर से वो दर्द महसूस करना चाहते हैं.. बुजुर्गों का प्यार याद आता है.. ...!
"फिर से बीते वक़्त में जाने की इच्छा है.... दादी आज हमारे बीच नहीं हैं... जी करता है २-४  घंटे के लिए ही सही.. एक बार आतीं तो फिर से जीते... प्लीज़ दादी ... प्लीज़... मिस यू...."

11 अप्रैल 2013

Sunday, April 2, 2017

BPMA

यही कोई हम आठ -नौ साल के रहे होंगे उस वक़्त. हमारे  बुआ-चाचा सब कॉलेज जाते थे और हम स्कूल . उनकी कलरफुल कापियां /किताबें हमे खूब अट्रैक्ट करती थीं क्यूँकि हमारी कॉपियां स्कूल की छपी होती थीं सब एक जैसी भूरे रंग की और DAV public school लिखा होता था.
हमे याद है बुआ की एक ऐसी ही कॉपी थी जिसके पीछे बड़े बड़े अक्षरों में BPMA लिखा हुआ था., जिसका फुल फॉर्म था 'बिहार पेपर मिल्स असोसिएशन '. हमने वहीँ रंगीन अक्षरों में BPMA का नया फुल फॉर्म लिख डाला ' बीडी पीये मज़ा आवे' :D. कॉलेज में उनकी साइकोलोजी की लेक्चरार ने देखा तो पूरी क्लास के सामने ही उनकी  बैंड बजाई थी . ;)
शाम को जब हम खेल कर घर  वापिस आये  तब मेन गेट से ही खतरे का आभास हुआ, दादा-दादी, मम्मी- पापा ,चाचा बुआ सब वहीँ थे और एक साथ सबने  क्लास लगा दी :) . कौन पहले बोला और कौन  बाद तक याद नहीं, पर मेरी जो आरती उतारी गयी थी उसकी रौशनी अब तक रौशन है और धूप अगरबत्ती की खुशबू, आहा -' वो कभी भुलाई न जा सकेगी.....' !
;) :P

Saturday, March 18, 2017

मोदी दादा- मोदी नाना

हम्मर मतारी बड़का वाला मोदी फैन हैं। सौ काम पेंडिंग छोड़ कर घंटों मोदी भाषण सुनने को तैयार। फ़ोन करो तो 'मोदीआइल' रहती है। सब सीरियल और शो छोड़ कर सिर्फ मोदी रिलेटेड न्यूज़ देखती हैं, यहाँ तक कि सारा अख़बार तक चाट डालती हैं। 'मन की बात' सुनने के लिए दिमागे में अलार्म सेट है। इनसे भी चार हाथ आगे हमार पतिदेव हैं। मोदी के इंच इंच डेग का खबर इनके पास मिलता है। मजाल है कि कोई इंटरनेट न्यूज़ इनके आँख के आगे से बिन देखे गुजर जाए। बुझा रहा दुनो सास दामाद कोई रिसर्च करिए के छोड़ेंगे।
घर में सबसे नालायक, निकम्मे, टेढ़- ऐंठाइल, मुर्ख, मुँहफट हम हैं, कारण मोदी जी हमको फुटलो आँखि नहीं सोहाते....। 😂😂अब निमन नही लगते तो नहीं लगते।
सबसे मज़ेदार बात भी सुन लीजिये। हमार बेटा जो अभी पैदा हो के ज़मीन पे खड़ा ही हुआ है सो कल पूछ रहा, ' मम्मी नरेंद्र मोदी नाना लगेंगे कि दादा लगेंगे...?'
बताइये का जवाब दें....?

Thursday, March 2, 2017

क्या करना रंग गोरा जो पिया न रिझाए

फेयरनेस क्रीम और एंटी एजिंग क्रीम का बहिष्कार कीजिये सखियों।
गोरापन सुंदरता का पैमाना नहीं, और ना ही बढ़ती उम्र कोई अभिशाप!
कुदरत ने जो रूप रंग बख्शा है उसे स्वीकारिये और गर्व कीजिए। आपकी पर्सनालिटी और पॉजिटिव attitude ही आपकी ख़ूबसूरती है। सलोना रंग और चन्द झुर्रियां कोई दाग नहीं। हर उम्र अपने आप में ख़ूबसूरत है। एकाध वर्ष पीछे दिखने के चक्कर में इनर ब्यूटी भी कभी कभी पीछे चली जाती है। सो बढ़ने दीजिये उम्र को नैचुरली, खिलखिलाते हुए आप भी बढ़िए और खूब बढ़िए...!

Monday, January 30, 2017

दुश्मनों को माफ़ करने वाला attitude ही उन्ही उनकी औक़ात में रखता है।
जवाब देने, react करने से वे अपने आपको आपके बराबर या फिर खुद को बड़ा समझने लगते हैं।

Tuesday, January 10, 2017

मेरा शहर

बिना मेरी हाँ-हूँ सुने उसने अपनी बात जारी रखी, "यार रश्मि,  कुछ दिनों पहले ऐसा लग रहा था मानो शहर की सारी  खूबसूरत लड़कियों की शादी हो गयी.... सब की सब आई ए एस अफसरों, इंजिनीअर्स   और डॉक्टर्स  की बीवियां हो गयीं हैं........... रह गयी सिर्फ सरफिरी चंद  शोध छात्राएं और 'धैर्य-कुमारियाँ'!
सारे सपने ब्लैक एंड वाइट हो गए थे । शहर धीरे -धीरे मरता जा रहा था ,नौकरी विकास और 'प्रेम; की गुंजाईश कम हो गयीं  थीं... मुझे शहर छोड़ जाना पडा फिर भटकता ही रहा। काफी दिनों बाद जब मेरा थक हार के  खाली हाथ लौटना हुआ यहाँ तो स्टेशन पर पांव  रखते ही अपने शहर  की बत्तियां  दिखी तो लगा सारा  शहर बाहों में आ गया,टिम -टिम , दिप -दिप  जैसे जादुई चिराग, जैसे चूल्हे की आग जैसे गर्म अलाव, फिर बत्तियां अपनेपन के गर्मी से भर गयीं दिल में सच ....आई मिस्ड माय टाउन , रियली!"

-फिर मुझे भी अच्छा लगा उस से बतियाना!

तुम्हारा होना ..मुझे मेरे होने का अहसास करवाता है |
संवाद रोटी नहीं है ...कि तुम भी रोज़ खाओ ,मैं भी रोज़ खाऊं |बस इतना जाना भर काफी से अधिक है...कि तुम हो ,...मेरे लिए हो !!!!

Monday, January 9, 2017

क्राइम

क्रिमिनल सुल्तान हैं,
कानून मेहरबान हैं
जनता को सिर्फ सुनना है...
वादों को निगलना, नारों को उगलना है!
कहीं पे दर्द रहता है
मन अकेले में रोता है
नेताओं के भाषणों से कानों को बचाओ
चाहो तो एक और क्राइम कर के सुर्ख़ियों में आओ

स्त्री

पुरुष जब किसी स्त्री के शरीर को गलत नज़र से देखता है/छूता है तो उसे सिर्फ इतना याद रखना चाहिए कि वह सिर्फ अपनी माँ की ही नहीं, बल्कि अपने पूरे खानदान की जीवित और मृत हर स्त्री की कोख पर थूकता है.....!

Friday, January 6, 2017

भाषा

संसार की बड़ी से बड़ी भाषा हर विधा के लिए उपयुक्त नहीं हो सकती। अंग्रेजी या उर्दू में घनाक्षरी लिखें तो वो खूबसूरती नहीं आएगी जो ब्रजभाषा में आएगी। ग़ज़ल के लिए हिंदी साहित्य ज़रा धीमा पड़ जाता है वहीँ उर्दू में बात कुछ और होती है। उर्दू की मिठास भले चाशनी जैसे मुँह में घुली हो लेकिन उर्दू शहरों में पली बढ़ी है। जबकि हिंदी और इसकी उपभाषाएं या बोलियाँ गांवों में जवान हुई हैं। खेत की मेढ़, अमराई, पनघट , नदियां, तालाब, बड़, पीपल ,  लहलहाती फसलों का जो सौंदर्य हिंदी में आया वह शायद उर्दू में फीका रहा है।

'विधिना करो देह को हमरी
तोहरे घर की देहरी
आवत जात तोरे चरण के धूरा
लगत जात हर बेरी....'

यह भारतीय नारी ही अपने प्रियतम से ऐसा कह सकती है। बोलियों में लोकगीत किसी बड़े साहित्यकार के नहीं रचे होते। जाने क्या सोचकर लिखते हैं के अनपढ़ गांव वाले रचनाकार की अभिव्यक्ति का चमत्कार भी दंग कर देता है....

तैने ले लई प्राण अहिरिया
तिरछी मार नज़रिया
एक पुरा एक ही बखरी एक ही चलत डगरिया
एकई उठन एक ही बैठन, एकइ परत सेजरिया
अब तो छुरी तुम्हारे हाथन, घीच करे गिरधरिया....'

[अहिरन (राधा) ने तिरछी नज़र मार कर प्राण ले लिए। एक गाँव एक मोहल्ला और एक ही रास्ता है। साथ उठना बैठना और सेज भी एक है। अब छुरी तुम्हारे हाथ में है और हमने गर्दन आगे कर दी है।]

Thursday, January 5, 2017

प्रोपोज़

यार , प्रपोज न करने का एक अपना मज़ा है......। सुन, मैं उन में से नहीं  जो इस बात का इंतज़ार करें की प्रपोज़ करना सिर्फ लड़कों की ड्यूटी है।
देखो, जिस दिन मैं प्रपोज करुँगी न उस दिन फूलों की बारिश होगी , झरने गायेंगे , हवा नाचेगी और मेरे लम्बे बालों में मेरा और मेरे महबूब का चेहरा छिपा होगा। बैक ग्राउंड में एक रोमांटिक ओल्ड सौंग बजेगा. ..

"आजा सनम मधुर चांदनी में हम-तुम मिले तो वीराने में भी आ जायेगी बहार
झूमने लगेगा आसमान . ..."

Tuesday, December 20, 2016

कुपोषण

"भारत मे हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है..." जी हाँ ऐसा एक विज्ञापन मे आमिर खान कहते हैं.

हम एक ऐसे युग से गुजर रहे हैं, जहां बड़ी-बड़ी समस्याएं ग्लैमर की चकाचौंध में छिप जाती हैं। जैसे कुपोषण। हम जब जीडीपी ग्रोथ की बात करते हैं, तब यह भूल जाते हैं कि जिन बच्चों पर देश का भविष्य टिका है, अगर उनकी प्रॉडक्टिविटी ही कम रहेगी, तो यह एक बड़ी समस्या है। और कड़वा सच यह है कि आज देश का हर दूसरा बच्चा इससे ग्रस्त है।

हम्म ....ये हो गयी भाषणबाजी टाइप बात. इसी बात पे  एक मजेदार बात कहती हूँ आपसे| मेरे हसबंड की कजिन आठ वर्षीय प्यारी सी समृद्धी ने अचानक एक दिन मुझसे कहा, 'भाभी , मैं कुपोषण की शिकार हूँ, और लोग मुझ पर ध्यान नहीं देते.."
मैं बोली, "किसने कहा तुमसे...?"
उसने कहा , "टी. वी. नहीं देखते.. आमिर खान कहता है कि हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है.. और मैं दूसरी बेटी हूँ "
जी हाँ, वो दूसरी संतान है अपने माँ-बाप की. और उसने ऐसे ही  इस विज्ञापन का अर्थ लगाया.
मैंने कई तरह से समझाने  की  कोशिश की. पर वह कहती रह गयी, 'नहीं.. नहीं.. नहीं.. आप सब मुझे बहलाने  की कोशिश करते हैं बस्स.....'
खूब हंसी  आई थी उसकी मासूमियत पर.... :) :)

मुझ बताइए कैसे उसे समझाया  जाए...?

- कुपोषण, भारत छोड़ो का नारा हम बाद मे लगा लेंगे... !

Sunday, December 11, 2016

लफ़्ज़ों के दीवार

मैं - कौन कहता है मैं बोलती बहोत हूँ? मैं तो बस लफ़्ज़ों के दीवार बनाती हूँ के तुम मुझ तक न पंहुच सको....!

वो- कौन कहता है के तुम बोल कर लफ़्ज़ों के दीवार बनाती हो? तुम बोलते हुए कई दीवारों में दरवाज़े खोल जाती हो....!

Thursday, November 24, 2016

संस्मरण/बचपन

तरह तरह के दोस्त होते हैं लाइफ के हरेक स्टेज में। स्कूल के, मोहल्ले के, कॉलेज के, वर्चुअल etc.
मुझे भी खूब सारे फ्रेंड्स मिले और लगभग सबके साथ वैसा ही रिलेशन कायम है जैसा पहले था।
मेरी मोहल्ले की एक सहेली थी। हम अलग अलग स्कूल में थे तो शाम को खेल के मैदान में ही मुलाक़ात होती थी। गजब कॉम्पिटिटिव लड़की थी वो... बचपन की उस छोटी उम्र में ही अजीब सी प्रतिस्पर्धा भर गयी थी उसके मन में, खास कर मुझसे और मेरी एक और सहेली से। जैसे गेम्स में हम किस ग्रुप में हैं, उसे उसी ग्रुप में जाना है। लूडो में कौन से कलर की गोटी हमने सेलेक्ट की उसे वही चाहिए वरना वो वहां से चली जाती थी या रोने लगती थी। मेरी एक और सहेली जो थी वो अपने पेरेंट्स के ट्रान्सफर होने से शहर छोड़ कर चली गयी। बची मैं... वो.. कुछ लड़के और हमसे जूनियर बच्चे। अब कम्पटीशन की 1st पोजीशन पे मैं थी। मैंने अगर लाल फ्रॉक पहना है तो वो भी अपने डैड से लाल मंगवाती, भले ही अंकल नीली फ्राक पहले से ला चुके हों।

'दरअसल हम कॉपी उसकी करना चाहते हैं जिसे आदर्श मानते हैं या फिर ईर्ष्यावश प्रतिस्पर्धा में अड़ जाते हैं कि जैसे भी हो मुझे उससे सुपीरियर दिखना है...।'

धीरे धीरे हम स्कूल से निकल कॉलेज में आए, मैंने लाइफ साइंस चुना। अब मैंने ये सब्जेक्ट लिया था तो उसे भी लेना ही था जबकि उसकी मैथमेटिक्स कमाल की थी। उसके घरवालों ने कहा भी मैथ्स ले लो, हम सब फ्रेंड्स ने भी समझाया। पर उसका जवाब था कि' " तुमलोग मुझे सक्सेसफुल नहीं देखना चाहते हो..." अब बात खत्म.... खैर आगे समय चलता ही जा रहा था, उसके और मेरे मोबाइल कांटेक्ट लिस्ट में same फ्रेंड्स थे। जो मेरे वो उसके। प्यार इत्ता था के जो मुझे अच्छे नही लगते वो उसे भी नही लगते थे... मेरी हर पसंद अब उसकी पसन्द बन चुकी थी वो खाने का टेस्ट हो या रंगों का चुनाव या मेरे बोले जाने वाले तकिया कलाम, phrase, डायलॉग्स यहाँ तक की हाव भाव भी.... 😂

कॉलेज के फाइनल इयर में समोसे खाते हुए एक दिन दोस्तों ने शादी/लव/अफेयर्स और मनपसंद लाइफ पार्टनर्स पे गर्मा गर्म टॉपिक छेड़ी थी। कोई अपने क्रश की बात करता कोई शरमाते हुए छुपा रहा था, कइयों की शादी की बात फाइनल हो रही थी  और कुछ लोग अपने क्लास फेलो से ही इम्प्रेस थे। सबकी कहते सुनते ठहाके लगाते फाइनली मैंने कहा, 'मैं तो शादी करने जा रही अमिताभ से... बाकी तुमलोग अपनी बताते रहना...'
इस पर मेरी सहेली ने कहा, ' तू अमिताभ से कर मैं एक बार try करुँगी फिक्स नहीं हुआ तो सलमान से करुँगी फिर, मुझे भी बॉलीवुड स्टार ही चाहिए..'
मैंने कहा, ' येड़ी है क्या बे, मैं बच्चन से नहीं Amitabh Mishra से शादी करने जा रही। मेरी सगाई भी तय हुई है अगले हफ्ते.....'😂😂😂😂
फिर कैंटीन में जो ठहाके गूंजे थे उसकी खनक कभी कम तो नही होगी, पर सहेली का इस बात पर उदास होना अच्छा मुझे नही लगा था।
खैर समय फिर भी चल रहा..... चलता रहेगा आगे आगे और हम पीछे की स्मृतियों के साथ फ्लैशबैक में कभी कभी ....

ऐसे ही छोटे छोटे तमाम किस्से हैं, मैं शेयर करती रहूंगी।

Tuesday, November 22, 2016

खाकी वर्दी के किस्से

रिटायर्ड फौजी और पुलिस अफसर किस्सों को दिलचस्प तरीके से सुनाने में पारंगत होते हैं।  मोस्टली ' कई साल पहले जब मैं फलाने जगह पर पोस्टेड था....' की लाइन से शुरू होने वाले किस्से आपको बाँध ही लेते हैं। ऐसा ही एक वाक़या मैं शेयर करती हूँ एक बुज़ुर्ग पुलिस अफसर जो अपने कई साल सीनियर अफसर का किस्सा सुनाया करते थे। मैं शायद उस अंदाज़ में न सुना पाऊं पर पढ़ियेगा ज़रूर, थोड़ा लम्बा हो सकता है।

'.... उस वक़्त आज़मगढ़ में दो विरोधी सांप्रदायिक जुलूसों को 144 ज़ाब्ता फ़ौजदारी लगाये बिना उन अफसर ने अपना कमाल दिखाया था।
आप पाबन्दी लगाएंगे तो हम उल्लंघन करेंगे, ऐसा दोनों पक्ष ने स्पष्ट कर दिया था। ज़ाहिर था जुलुस निकले तो सांप्रदायिक झगड़ा हो कर रहेगा। इसलिए एक दिन पहले वे दिन दहाड़े कई छोटी बड़ी गाड़ियां और तमाम फ़ौज- फाटा लेकर जुलुस के रास्ते पर एक बाज़ार में पहुँचे और लगे फीतों से नाप-जोख करवाने। खुले आम अपने अफसरों से राय -मश्विरा भी करने लगे के यहाँ से गोली चली तो कहाँ तक जायेगी और वहां से चली तब कहाँ तक पंहुचेगी।
फिर उसी ताम-झाम के साथ सिविल हॉस्पिटल गए और सर्जन को बाहर बुला कर घोषणा की कि कल के लिए कोई सौ एक एक्स्ट्रा बेड्स क इंतेज़ाम कर लें क्योंकि दोनों जुलुस निकलेंगे और पुलिस तो गोली चलाएगी ही....!
नतीजा, बाज़ार  तो उसी वक़्त बन्द हुआ और अगले दिन भी बन्द रहा। एक भी जुलुस नही निकला...।'

पुलिसिया सूझ बुझ का ये छोटा सा किस्सा काफी शार्ट एंड सेंसर कर के यहाँ पोस्ट किया है तो बातों की वो खुशबु थोड़ी कम आएगी।
इसी तरह कठिन परिस्थितियों में काबू पाने के अनेक किस्से मैंने सुने हैं। शायद शेयर भी करूँ, पर उनकी ज़ुबानी के बिना वो मिर्च मसाला थोडा स्टोरी को बेस्वाद रखेंगे लेकिन बेफायदा नहीं।

- एक सल्यूट खाकी वर्दी को!!💐👲